पालीघाट नाइट स्टे योजना का सबसे सीधा सवाल यही है कि डेढ़ करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी पर्यटकों को रात गुजारने की सुविधा क्यों नहीं मिल रही है। सवाई माधोपुर स्थित राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य के पालीघाट में तीन वातानुकूलित टेंट लगाए गए थे, लेकिन करीब तीन साल बीत जाने के बाद भी यह योजना जमीन पर शुरू नहीं हो सकी है। मौके पर हालत यह है कि टेंट दिखाई तक नहीं देते, जबकि वन विभाग का कहना है कि इसी पर्यटन सीजन में उनकी मरम्मत कराकर सुविधा शुरू की जाएगी। यह सवाल योजना के क्रियान्वयन और जवाबदेही से जुड़ा है।
पालीघाट नाइट स्टे योजना के आंकड़े: डेढ़ करोड़ और तीन टेंट
वन विभाग ने करीब डेढ़ करोड़ रुपये की लागत से तीन वातानुकूलित टेंट तैयार कराए थे। सीधे हिसाब से एक टेंट पर औसतन करीब 50 लाख रुपये खर्च हुए। पर्यटकों के लिए एक रात ठहरने का किराया करीब 5 हजार रुपये रखने की तैयारी थी। इस हिसाब से तीनों टेंट भरने पर हर रात करीब 15 हजार रुपये की आय बन सकती थी, लेकिन सुविधा कभी शुरू ही नहीं हुई, इसलिए यह गणना कागज पर ही रह गई।
| स्थान | पालीघाट, राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य, सवाई माधोपुर |
| टेंटों की संख्या | 3 वातानुकूलित टेंट |
| कुल लागत | करीब डेढ़ करोड़ रुपये |
| एक रात का प्रस्तावित किराया | करीब 5,000 रुपये |
| योजना की स्थिति | करीब तीन साल से शुरू नहीं हुई |
| नुकसान का कारण (विभाग के अनुसार) | तेज बारिश और चंबल नदी का बढ़ा जलस्तर |
| विभाग का ताजा आश्वासन | इसी पर्यटन सीजन में मरम्मत कराकर शुरू करना |
| निश्चित शुरू होने की तारीख | अभी घोषित नहीं |
यानी ढांचा तैयार था, फिर भी सुविधा नहीं खुली — यही जवाबदेही का सबसे बड़ा बिंदु है।
पर्यटकों को क्या मिलने वाला था
पालीघाट नाइट स्टे योजना का मकसद सिर्फ टेंट लगाना नहीं था। इसका उद्देश्य पर्यटकों को चंबल के प्राकृतिक वातावरण में रात गुजारने का अनुभव देना था। यह क्षेत्र घड़ियालों के लिए प्रसिद्ध है। रात रुकने की सुविधा से पर्यटक सुबह-शाम नदी और वन्यजीवन को करीब से देख सकते थे, और ठहराव बढ़ने से स्थानीय रोजगार और वन विभाग की आय भी बढ़ती।
सवाई माधोपुर पहले से ही पर्यटन के नक्शे पर मजबूत जिला है, जहां दशहरा जैसे बड़े आयोजन होते हैं और वन्यजीवन पर्यटन की पहचान है। ऐसे में चंबल किनारे रात रुकने की सुविधा एक अलग अनुभव जोड़ सकती थी। यह सुविधा सवाई माधोपुर के पर्यटन को एक दिन की सैर से आगे बढ़ाकर ठहराव वाले पर्यटन में बदल सकती थी, लेकिन अभी यह संभावना सिर्फ कागजों में दर्ज है।
पालीघाट नाइट स्टे योजना क्यों अटकी
विभाग के अनुसार टेंटों को नुकसान तेज बारिश और चंबल नदी के जलस्तर बढ़ने से हुआ। नदी किनारे स्थित किसी भी ढांचे के लिए यह एक वास्तविक चुनौती है, लेकिन सवाल यह है कि नुकसान के बाद मरम्मत और संचालन की प्रक्रिया इतने लंबे समय तक क्यों आगे नहीं बढ़ी। रिपोर्ट के अनुसार अधिकारियों के बदलने के बाद भी इस परियोजना पर ध्यान कम हुआ, जबकि योजना की निरंतरता की जिम्मेदारी व्यक्ति पर नहीं, व्यवस्था पर होती है।
यह स्थिति एक और गंभीर सवाल खड़ी करती है। अगर टेंट मौके पर दिखाई नहीं दे रहे, तो मरम्मत किस चीज की होगी? विभाग का कहना है कि फाउंडेशन की राशि से मरम्मत कराई जाएगी, लेकिन जब तक यह स्पष्ट नहीं होता कि टेंट कहां हैं, किस हालत में हैं और मरम्मत पर कितना खर्च आएगा, तब तक यह आश्वासन अधूरा ही रहेगा।
वन विभाग का ताजा रुख और आगे की राह
पालीघाट के रेंजर किशन कुमार सांखला के अनुसार पहले तेज बारिश और चंबल नदी का जलस्तर बढ़ने के कारण टेंट क्षतिग्रस्त हो गए थे। उन्होंने कहा है कि जल्द ही टेंट की मरम्मत कराकर उन्हें शुरू किया जाएगा। यह बयान इस लिहाज से अहम है कि विभाग ने समस्या को स्वीकार किया है, लेकिन इसमें कोई निश्चित तारीख सामने नहीं आई है। मरम्मत, सुरक्षा जांच और किराया-बुकिंग की स्पष्ट व्यवस्था सामने आना जरूरी है।
इस मामले से एक सबक भी निकलता है। नदी किनारे पर्यटन सुविधाएं बनाते समय सिर्फ निर्माण पर ध्यान देना काफी नहीं है। रखरखाव, मानसून से सुरक्षा और नियमित निरीक्षण की व्यवस्था पहले से तय होनी चाहिए। चंबल नदी से जुड़ी खबरें अक्सर सिंचाई से जुड़ी होती हैं, जैसे हाल में चंबल जल बंटवारा को लेकर फैसला सामने आया था, लेकिन नदी का दूसरा चेहरा पर्यटन और वन्यजीवन से जुड़ा है। जयपुर में शेखावाटी हेरिटेज समिट जैसे आयोजनों से विरासत पर्यटन को बढ़ावा मिला है, और पालीघाट का मामला दिखाता है कि छोटी सुविधाओं का जमीन पर चलना भी उतना ही जरूरी है।
पर्यटकों के लिए व्यावहारिक जानकारी
पालीघाट जाने की योजना बना रहे पर्यटकों के लिए इस समय सबसे जरूरी सलाह यही है कि सुविधा शुरू होने की पुष्टि किए बिना सिर्फ टेंट के भरोसे यात्रा की योजना न बनाएं। विभाग ने अभी कोई निश्चित तारीख घोषित नहीं की है, इसलिए बुकिंग या किराये को लेकर जानकारी सामने आने से पहले स्थानीय वन विभाग कार्यालय या अधिकृत स्रोत से पुष्टि करना समझदारी होगी। चंबल अभयारण्य वन्यजीव क्षेत्र है, इसलिए भ्रमण के नियम और सुरक्षा निर्देशों का पालन भी जरूरी है।
आगे के घटनाक्रम में चार बातों पर नजर रहेगी: टेंटों की वास्तविक स्थिति, मरम्मत की राशि और समय, सुविधा शुरू होने की निश्चित तारीख और बुकिंग व्यवस्था, और भविष्य में सुविधा को मानसून से बचाने की स्थायी व्यवस्था। तब तक पालीघाट की कहानी एक सीधी सीख देती है: योजना बनाना आसान है, बजट खर्च करना भी संभव है, लेकिन सुविधा को जनता तक पहुंचाना ही असली परीक्षा है। अब सबकी नजर इसी बात पर है कि वन विभाग का ताजा आश्वासन इस सीजन में जमीन पर उतरता है या कागजों में ही रह जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पालीघाट नाइट स्टे योजना पर कितना खर्च हुआ?
इस योजना पर करीब डेढ़ करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, जिससे तीन एसी टेंट बनाए गए थे।
पालीघाट में एक रात का किराया कितना तय था?
योजना के तहत एक रात ठहरने के लिए करीब 5 हजार रुपये किराया रखने की तैयारी थी।
पालीघाट नाइट स्टे योजना क्यों शुरू नहीं हुई?
वन विभाग के अनुसार तेज बारिश और चंबल नदी का जलस्तर बढ़ने से टेंट क्षतिग्रस्त हो गए, जिसके बाद मरम्मत और संचालन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
पालीघाट के टेंट कब शुरू होंगे?
वन विभाग ने इसी पर्यटन सीजन में मरम्मत कराकर सुविधा शुरू करने की बात कही है, लेकिन अभी कोई निश्चित तारीख घोषित नहीं हुई है।