सीकर ऑनर किलिंग हाईकोर्ट फैसला राजस्थान की न्याय व्यवस्था के लिए एक बड़ा मोड़ है। हाईकोर्ट ने सीकर डबल मर्डर मामले में निचली अदालत का पूरा फैसला पलट दिया है — पिता रामगोपाल की फांसी रद्द हो गई है और सभी 11 आरोपी बरी हो गए हैं। न्यायमूर्ति महेंद्र कुमार गोयल और न्यायमूर्ति भुवन गोयल की खंडपीठ ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 को डेथ रेफरेंस नामंजूर करते हुए यह फैसला सुनाया।
यह फैसला सिर्फ 11 लोगों की रिहाई तक सीमित नहीं है। हाईकोर्ट ने पुलिस जांच को “लापरवाह, सतही और ढीली” कहा है — सीसीटीवी फुटेज और डीवीआर बिना सील जब्त हुए, मालखाने में उनका पक्का रिकॉर्ड नहीं रहा और बिना फॉरेंसिक जांच के वे अदालत में पेश हुए। टूटी सबूत-श्रृंखला पर फांसी जैसी सजा कायम नहीं रह सकती, यही अदालत का साफ संदेश है।
सीकर ऑनर किलिंग हाईकोर्ट फैसला: सजा पलटने की वजह
इस मामले में कोई चश्मदीद गवाह नहीं था — अभियोजन का केस सीसीटीवी की “लास्ट सीन” फुटेज और खुलासे पर हुई बरामदगियों पर टिका था। खंडपीठ ने पाया कि दोनों खंभे कमजोर निकले और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला स्थापित नहीं हो सकी, जिसके बिना फांसी जैसी सजा नहीं टिक सकती।
फुटेज में चेहरे साफ नहीं दिख रहे थे, और पहचान करने वाला जांच अधिकारी आरोपियों को पहले से जानता ही नहीं था। बरामदगियों में भी अधिकारी ने आरोपियों के खुलासे के सटीक शब्द अदालत में दोहराए नहीं, जो धारा 27 के तहत अनिवार्य है — इसलिए शवों, केबल, मोटरसाइकिल, पर्स और कार की बरामदगी आरोपियों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं हो सकी।
खंडपीठ ने “ऑनर किलिंग” के निष्कर्ष से भी सहमति नहीं जताई — इस बात का कोई कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत नहीं मिला कि युवती और युवक के बीच प्रेम संबंध थे या उस रात दोनों को एक साथ देखा गया था।
सीसीटीवी और डीवीआर में जांच की सबसे बड़ी चूक
रामगोपाल के घर और पेट्रोल पंप से जब्त डीवीआर और पेन ड्राइव बिना सील उठाए गए। मालखाने में उन्हें सही तरीके से जमा नहीं कराया गया — रजिस्टरों में प्रविष्टियों का अभाव था और यह तक दर्ज नहीं था कि डीवीआर कब बाहर निकला और किसने इस्तेमाल किया। घर का रिकॉर्डर घटना के चार दिन बाद, बिना सील, जब्त हुआ था।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का प्रमाण पत्र भी मानकों पर खरा नहीं उतरा — गवाह उमेश कुमार ने माना कि पुलिस ने टाइप पत्र लाकर दिया था, उसने सिर्फ हस्ताक्षर किए थे। गिरफ्तारी मेमो की तस्वीरें भी बाद में अलग से विकसित करके जोड़ी गई थीं, इसलिए पहचान का आधार नहीं बनीं। केबल के टुकड़ों पर खून नहीं था और वे कभी फॉरेंसिक जांच को भेजे ही नहीं गए।
शुरुआती शिकायत पर भी अदालत सख्त है — समय पर एफआईआर नहीं हुई और खाटूश्यामजी थाने की शुरुआती रिपोर्ट दबा दी गई। असली शुरुआती शिकायत छिपने पर पूरी जांच और एफआईआर संदिग्ध बन जाती है।
2019 की वह रात और ट्रायल कोर्ट का फैसला
मामला अक्टूबर 2019 का है। सीकर के आलोदा गांव की युवती प्रेम और उसके प्रेमी गणपत लाल की 21 अक्टूबर 2019 की रात हत्या हुई थी। आरोप था कि पिता रामगोपाल को बेटी के प्रेम प्रसंग की भनक लगी थी, जिसके बाद दोनों की हत्या कर शव जीणमाता-मांडोली की पहाड़ियों में फेंक दिए गए। गणपत के भाई बलदेव गोदारा ने 23 अक्टूबर 2019 को रानोली थाने में रिपोर्ट दी थी।
सीकर एडीजे कोर्ट ने 30 नवंबर 2024 को रामगोपाल को फांसी, 9 को उम्रकैद और 1 को साक्ष्य नष्ट करने पर तीन साल की सजा दी थी। अपील पर अब खंडपीठ ने सभी को बरी कर दिया है।
| पड़ाव | विवरण |
|---|---|
| घटना की रात | 21 अक्टूबर 2019, आलोदा (सीकर) — प्रेम, गणपत की हत्या |
| एफआईआर | 23 अक्टूबर 2019, रानोली थाना — बलदेव गोदारा |
| ट्रायल कोर्ट | 30 नवंबर 2024 — रामगोपाल को फांसी, 9 को उम्रकैद, 1 को 3 साल |
| हाईकोर्ट | 30 अक्टूबर 2026 — सभी 11 आरोपी बरी, डेथ रेफरेंस नामंजूर |
| रिहाई की शर्त | 25,000 रुपये का बॉन्ड व जमानतदार, 6 महीने वैध |
| डीजीपी को निर्देश | 2 महीने में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की एसओपी, 3 महीने में अनुपालना रिपोर्ट |
कोर्ट के निर्देश: अब हर जांच पर लागू होंगे नए नियम
अदालत ने साक्ष्य को धर्म की आंख बताते हुए डीजीपी को निर्देश दिया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 के अनुरूप इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों (सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल रिकॉर्ड) के संकलन, जब्ती, संरक्षण और प्रमाणन के लिए दो महीने में एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) प्रसारित की जाए।
एसओपी में सीसीटीवी स्रोतों की तुरंत पहचान, फुटेज के लिए लिखित मांग पत्र, मूल डिवाइस की जब्ती या मौके पर फॉरेंसिक कॉपी व हैश वैल्यू का रिकॉर्ड, समय-अंतर का नोट, सीडीआर व सीलबंद प्रमाण पत्र, धारा 63 का प्रमाण पत्र और चेन ऑफ कस्टडी रजिस्टर शामिल होगा। जांच अधिकारियों और अभियोजकों का प्रशिक्षण भी अनिवार्य है।
आगे क्या होगा: राज्य सुप्रीम कोर्ट जा सकता है
रिहाई के साथ एक सुरक्षा उपाय भी है — आरोपी तभी रिहा होंगे, जब वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों, और प्रत्येक को 25,000 रुपये का बॉन्ड व जमानतदार देना होगा, जो छह महीने वैध रहेगा, ताकि राज्य सुप्रीम कोर्ट जाए तो वे दायरे में बने रहें।
यह फैसला एक असहज सवाल भी छोड़ जाता है: अगर ये 11 दोषी नहीं, तो प्रेम और गणपत की हत्या किसने की? हाईकोर्ट ने हत्या से इनकार नहीं किया — सिर्फ यह कहा कि अभियोजन इन्हीं लोगों का दोष साबित नहीं कर सका।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सीकर ऑनर किलिंग केस में हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया?
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पूरी तरह रद्द करते हुए फांसी पाए पिता रामगोपाल समेत सभी 11 आरोपियों को बरी कर दिया है; डेथ रेफरेंस नामंजूर हुआ है।
हाईकोर्ट ने सजा पलटने की सबसे बड़ी वजह क्या बताई?
अभियोजन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला स्थापित नहीं कर सका। सीसीटीवी-डीवीआर बिना सील जब्त हुए, चेन ऑफ कस्टडी साबित नहीं हुई और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का प्रमाण पत्र मानकों पर खरा नहीं उतरा।
ट्रायल कोर्ट ने पहले क्या सजा सुनाई थी?
30 नवंबर 2024 को सीकर एडीजे कोर्ट ने रामगोपाल को फांसी, 9 को उम्रकैद और 1 को साक्ष्य नष्ट करने पर तीन साल की सजा दी थी।
क्या बरी हुए आरोपी पूरी तरह आजाद हो गए हैं?
नहीं। प्रत्येक को 25,000 रुपये का बॉन्ड व जमानतदार देना होगा, जो छह महीने वैध रहेगा, ताकि राज्य सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सके।