राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अलवर मामले में 4 की उम्रकैद निरस्त, आवारा श्वानों पर ACS से मांगा शपथपत्र

राजस्थान हाईकोर्ट उम्रकैद निरस्त के फैसले ने बुधवार की शाम प्रदेश की न्यायिक चर्चा का रुख बदल दिया। जयपुर पीठ ने अलवर के एक पुराने मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे चारों याचिकाकर्ताओं को दोषमुक्त करते हुए उनकी सजा रद्द कर दी। खंडपीठ का कहना था कि अभियोजन पक्ष इस मामले की सबसे बुनियादी बात ही साबित नहीं कर पाया — कि घटना के समय शिकायतकर्ता की उम्र क्या थी। अदालत ने जांच पर भी तीखी टिप्पणी की और कहा कि इतने संवेदनशील मामले की जांच बेहद गैर-जिम्मेदार तरीके से की गई।

उसी दिन हाईकोर्ट से दो और अहम आदेश भी सामने आए — आवारा श्वानों पर सरकार से 5 नवंबर तक शपथपत्र, और चिकित्सा शिक्षा की असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती-2021 (337 पद) का रास्ता साफ।

तथ्य विवरण
अदालत राजस्थान हाईकोर्ट, जयपुर पीठ
मुख्य फैसला अलवर मामले में चारों की उम्रकैद निरस्त, सभी दोषमुक्त
खंडपीठ जस्टिस महेन्द्र गोयल और जस्टिस भुवन गोयल
निचली अदालत का फैसला अलवर की विशेष पॉक्सो अदालत, 2 जून 2023
घटना की तारीख (आरोप के अनुसार) 27 सितंबर 2019 की रात
आवारा श्वान मामला ACS को 5 नवंबर तक शपथपत्र देना होगा
भर्ती मामला असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती-2021, कुल 337 पद

राजस्थान हाईकोर्ट उम्रकैद निरस्त: उम्र साबित क्यों नहीं हुई?

इस फैसले की धुरी एक ही बिंदु पर टिकी है — उम्र का सबूत। पॉक्सो अधिनियम के तहत मामला तभी उस धारा में टिकता है, जब यह पक्के तौर पर साबित हो कि घटना के समय शिकायतकर्ता नाबालिग था। अभियोजन पक्ष ने दसवीं कक्षा की मार्कशीट और स्कूल रिकॉर्ड पेश किए थे, जिनमें जन्मतिथि 3 जनवरी 2003 बताई गई थी। शिकायत में उम्र 16 वर्ष कही गई थी।

लेकिन बचाव पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव सुराणा ने इस कड़ी को ही तोड़ दिया। उनकी दलील थी कि मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि स्कूल में प्रवेश के आवेदन पत्र से ली गई थी, और उस मूल आवेदन पत्र में जन्मतिथि का आधार ही प्रमाणित नहीं हुआ। खंडपीठ ने इसी तर्क को वजन दिया और माना कि उम्र संदेह से परे साबित नहीं हुई।

अदालत ने जांच और बयानों पर क्या कहा

उम्र के अलावा अदालत ने साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल उठाए। खंडपीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता के बयानों में विरोधाभास था — लिखित शिकायत, शुरुआती बयान और अदालत में दिया गया बयान एक-दूसरे से पूरी तरह मेल नहीं खाते थे। डीएनए रिपोर्ट को लेकर भी अदालत ने संदेह जताया, और चिकित्सकीय साक्ष्यों की राय को भी निर्णायक नहीं माना।

यह फैसला किसी पक्ष की जीत-हार का जश्न नहीं है। अदालत ने यह नहीं कहा कि घटना हुई ही नहीं — उसने यह कहा कि पेश किए गए सबूत दोषसिद्धि को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे। आपराधिक न्याय का यही सिद्धांत है: संदेह का लाभ आरोपी को मिलता है।

आवारा श्वानों पर सरकार को 5 नवंबर तक का समय

उसी दिन हाईकोर्ट की एक और खंडपीठ ने आवारा श्वानों के मुद्दे पर राज्य सरकार को सख्त संदेश दिया। मुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की पालना में स्वतः संज्ञान वाले मामले की सुनवाई की और पूछा कि उन निर्देशों पर अमल के लिए सरकार ने अब तक क्या कदम उठाए हैं।

न्यायमित्र अधिवक्ता प्रतीक कासलीवाल ने अदालत को बताया कि पहले अदालत ने आवारा कुत्तों को बस स्टैंड, सड़क और अन्य सार्वजनिक जगहों से हटाने, एंटी-रेबीज टीके लगाने और कुत्तों के काटने की घटनाओं को रोकने के कदम उठाने को कहा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की प्रभावी पालना नहीं हुई है। इस पर अदालत ने विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव से 5 नवंबर तक शपथपत्र मांगा है।

चिकित्सा शिक्षा में 337 असिस्टेंट प्रोफेसर पदों का रास्ता साफ

तीसरा बड़ा आदेश चिकित्सा शिक्षा विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती-2021 से जुड़ा था। जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने एकलपीठ के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसने इस भर्ती के परिणाम पर रोक लगा दी थी। इसके साथ ही 337 पदों वाली इस भर्ती का रास्ता साफ हो गया है। सरकार और आरपीएससी की दलील थी कि 2021 में शुरू हुई इस भर्ती पर 2022 की नई अधिसूचना के नियम लागू नहीं हो सकते, और याचिकाकर्ता ने जोधपुर मुख्यपीठ में पहले से दायर याचिका का तथ्य एकलपीठ से छिपाया था।

2019 की रात से 2023 की सजा तक — पूरा घटनाक्रम

आरोप के अनुसार, 27 सितंबर 2019 की रात करीब साढ़े दस बजे चार आरोपी शिकायतकर्ता को उसके घर से वाहन में ले गए थे, और बाद में पुलिस थाने में शिकायत दर्ज हुई। मामले की सुनवाई अलवर की विशेष पॉक्सो अदालत में हुई।

2 जून 2023 को अदालत ने चारों को धारा 363 (7 वर्ष), 366 (10 वर्ष), 366ए (10 वर्ष), तथा धारा 376डी व पॉक्सो की धाराओं 5(जी)/6 के तहत प्राकृतिक जीवन के अंत तक कठोर कारावास सुनाया था। इसी फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिस पर अब दोषसिद्धि और सजा दोनों निरस्त हो गई हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट उम्रकैद निरस्त फैसले का मतलब क्या है

पहली बात तो यह कि यह फैसला जांच एजेंसियों के लिए एक चेतावनी है। उम्र निर्धारण, बयान दर्ज करने की प्रक्रिया, डीएनए जैसे वैज्ञानिक साक्ष्यों की संभाल और मेडिकल जांच — इनमें से किसी एक कड़ी में भी लापरवाही हुई, तो गंभीर से गंभीर मामला भी अपील में गिर सकता है। दूसरी बात, राज्य सरकार के पास इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का विकल्प खुला है, इसलिए इसे अंतिम शब्द मानना जल्दबाजी होगी। तीसरी बात, आवारा श्वानों वाले आदेश से साफ है कि हाईकोर्ट अब शपथपत्र और व्यक्तिगत हाजिरी जैसी सख्त शर्तों के जरिए अमल भी सुनिश्चित कर रहा है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1: राजस्थान हाईकोर्ट ने अलवर मामले में क्या फैसला दिया?

उत्तर: हाईकोर्ट ने चारों को दोषमुक्त करते हुए उनकी उम्रकैद की सजा निरस्त कर दी।

प्रश्न 2: उम्र का मुद्दा इतना अहम क्यों था?

उत्तर: पॉक्सो तभी लागू होता है, जब यह साबित हो कि घटना के समय शिकायतकर्ता नाबालिग था। मार्कशीट की जन्मतिथि का मूल आधार प्रमाणित नहीं हुआ।

प्रश्न 3: आवारा श्वानों वाले मामले में सरकार को क्या करना होगा?

उत्तर: अतिरिक्त मुख्य सचिव को 5 नवंबर तक शपथपत्र देना होगा, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की पालना के कदमों की जानकारी हो।

प्रश्न 4: असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती-2021 पर फैसले का क्या असर होगा?

उत्तर: एकलपीठ की रोक हटने से 337 पदों वाली भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी।

स्रोत: ETV Bharat की हाईकोर्ट फैसलों की रिपोर्ट।

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