राजस्थान की सभी जेलों में अगले तीन महीने के भीतर बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। राजस्थान हाईकोर्ट जेल सुधार आदेश के तहत राज्य सरकार को जेलों में सीसीटीवी व्यवस्था दुरुस्त करने, जिला स्तर पर स्थायी निगरानी समितियां बनाने और हिरासत में मौत के मामलों में राहत देने वाली योजना को औपचारिक रूप से अधिसूचित करने का निर्देश दिया गया है। यह आदेश 29 अक्टूबर 2026 को आया है।
सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने सिर्फ निर्देश देकर मामला खत्म नहीं किया है। निगरानी के लिए स्थायी ढांचा बनेगा, हर तीन महीने में समीक्षा होगी और कैमरों की मरम्मत व भंडारण की जिम्मेदारी भी तय की गई है।
राजस्थान हाईकोर्ट जेल सुधार आदेश: तीन महीने में क्या-क्या पूरा करना होगा
| काम | समय-सीमा | जिम्मेदार विभाग |
| राजस्थान कस्टोडियन डेथ रिलीफ स्कीम, 2025 को अंतिम रूप देकर अधिसूचित करना | 3 महीने | राज्य सरकार |
| बीकानेर सेंट्रल जेल में 275 और जयपुर जिला जेल में 60 सीसीटीवी कैमरे लगाना, खराब कैमरे ठीक करना | 3 महीने | सूचना प्रौद्योगिकी विभाग और राजकॉम्प |
| जेलों में चालानी गार्ड की जरूरत का आकलन और समयबद्ध भर्ती शुरू करना | 3 महीने | राज्य सरकार / कारागार विभाग |
| निकट संबंधी बंदियों (पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चों) के बीच नियमित मुलाकात की नीति तय करना | 2 महीने | राज्य सरकार |
| जिला निगरानी समितियों की तिमाही समीक्षा | हर तीन महीने | राज्य स्तरीय निगरानी समिति |
इसके अलावा जेल विभाग को मोबाइल फोन की तलाश के लिए नियमित, गहन और आकस्मिक जांच की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनानी होगी, जिसमें हर संस्थान में बरामदगी का अलग रिकॉर्ड रखा जाएगा। कैदियों के पारिश्रमिक में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन और महिला कारागारों में सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनों की कार्यशील उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी।
अजमेर जेल की घटना: जिसने अदालत को सख्त रुख अपनाने पर मजबूर किया
इस आदेश की पृष्ठभूमि में अजमेर की हाई सिक्योरिटी जेल की एक घटना है। 29 जून 2026 को वहां विचाराधीन बंदी जगन गुर्जर की मौत हो गई थी। स्थिति रिपोर्ट में बताया गया कि जिस कोठरी में यह घटना हुई, वहां लगा सीसीटीवी कैमरा तकनीकी खराबी के कारण काम नहीं कर रहा था। अदालत ने इस तथ्य को गंभीरता से लिया और कहा कि वर्षों से चल रहे सुधारों के बावजूद अगर निगरानी व्यवस्था ही ठप हो जाए, तो सुधार का मतलब नहीं रह जाता।
अदालत का रुख साफ था — जेल सुधार के लिए कभी-कभार की कार्रवाई काफी नहीं है। स्थायी सतर्कता, पर्याप्त तकनीकी सहयोग और निरंतर निगरानी जरूरी है। इसी वजह से कैमरों की मरम्मत, भंडारण और बैकअप को भी आदेश का हिस्सा बनाया गया है।
2008 से चली लंबी सुनवाई: जनहित याचिकाओं का सफर
यह आदेश एक दिन की सुनवाई का नतीजा नहीं है। अदालत ने कहा है कि 2008 से अब तक की लंबी प्रक्रिया में संस्थागत सुधार हुए हैं, कारागार नियम अद्यतन किए गए हैं और जेलों के बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर सुधार हुआ है। 2012 से 2026 के बीच अदालत ने जेलों में सुरक्षा खामियों से जुड़ी अखबारों की खबरों के आधार पर स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की थी, जिनका दायरा धीरे-धीरे बंदियों के अधिकारों और जेल की दशा से जुड़े प्रतिवेदनों तक फैल गया।
मुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति समीर जैन की खंडपीठ ने जनहित याचिकाओं के इस समूह का निपटारा करते हुए ये निर्देश जारी किए हैं। याचिकाओं का मूल विषय बंदियों के अधिकार, कल्याण और गरिमा के साथ-साथ जेलों की सुरक्षा, बुनियादी ढांचा और रहन-सहन की दशा रहा है।
कैदियों और उनके परिजनों पर सीधा असर क्या होगा
इस आदेश का सबसे सीधा फायदा उन परिवारों को होगा, जिनके अपने जेल में हैं। सीसीटीवी व्यवस्था दुरुस्त होने से जेल के अंदर की घटनाओं पर नजर रखना आसान होगा और किसी विवाद में तथ्य सामने आ सकेंगे। हिरासत में मौत की स्थिति में राहत योजना के अधिसूचित होने से पीड़ित परिवारों को राहत पाने का एक स्पष्ट और औपचारिक रास्ता मिलेगा।
चालानी गार्ड की कमी दूर होने से जेलों की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होगी। निकट संबंधी बंदियों के बीच मुलाकात की नीति तय होने से पति-पत्नी या माता-पिता और बच्चों जैसे रिश्तों में बंदियों को नियमित मुलाकात का तय ढांचा मिलेगा।
राजस्थान हाईकोर्ट जेल सुधार आदेश की निगरानी कैसे होगी
आदेश की सबसे मजबूत कड़ी निगरानी का ढांचा है। हर जिले में संबंधित जिला न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली स्थायी निगरानी समिति बनेगी, जिसमें कारागार महानिदेशक, राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के निदेशक शामिल होंगे। यह समिति जेल सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और बंदियों के कल्याण से जुड़े न्यायिक निर्देशों के पालन की समीक्षा करेगी।
राज्य स्तर पर हर तीन महीने में इन निर्देशों के पालन की समीक्षा होगी, जिसमें इस फैसले के साथ-साथ पहले के आदेशों का पालन भी परखा जाएगा। सूचना प्रौद्योगिकी विभाग और राजकॉम्प इन्फो सर्विसेज लिमिटेड को जेलों में सीसीटीवी कैमरों से जुड़े लंबित रखरखाव अनुरोधों पर तुरंत कार्रवाई का निर्देश दिया गया है — कैमरा लगाना ही काफी नहीं होगा, उसे चालू हालत में बनाए रखना भी जिम्मेदारी होगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: राजस्थान हाईकोर्ट जेल सुधार आदेश में सबसे बड़ी बात क्या है?
उत्तर: सबसे बड़ी बात यह है कि राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर राजस्थान कस्टोडियन डेथ रिलीफ स्कीम, 2025 को अंतिम रूप देकर अधिसूचित करना होगा। साथ ही सभी जेलों में सीसीटीवी व्यवस्था दुरुस्त करनी होगी और जिला स्तर पर स्थायी निगरानी समितियां बनानी होंगी।
प्रश्न 2: सीसीटीवी कैमरों को लेकर अदालत ने क्या-क्या कहा है?
उत्तर: अदालत ने बीकानेर सेंट्रल जेल में 275 और जयपुर जिला जेल में 60 कैमरे लगाने सहित सभी प्रस्तावित कैमरे तीन महीने में लगाने का निर्देश दिया है। खराब कैमरों की मरम्मत और भंडारण व बैकअप सिस्टम को कार्यशील रखना भी इसमें शामिल है।
प्रश्न 3: जिला निगरानी समिति में कौन-कौन शामिल होगा और वह क्या करेगी?
उत्तर: समिति की अध्यक्षता संबंधित जिले के जिला न्यायाधीश करेंगे। इसमें कारागार महानिदेशक, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के निदेशक शामिल होंगे। यह समिति जेल सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और बंदियों के कल्याण से जुड़े निर्देशों के पालन की निगरानी करेगी और हर तीन महीने में राज्य स्तर पर समीक्षा होगी।
प्रश्न 4: हिरासत में मौत की राहत योजना से परिजनों को क्या फायदा होगा?
उत्तर: योजना के अधिसूचित होने के बाद हिरासत में मौत के मामलों में राहत पाने का एक औपचारिक और स्पष्ट ढांचा बनेगा। योजना की विस्तृत शर्तें अधिसूचना के बाद ही सामने आएंगी।
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