कोटा की सरकारी प्रसूति व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। महज नौ दिन के भीतर तीन प्रसूताओं की मौत ने पीड़ित परिवारों को तोड़ दिया है और चिकित्सा तंत्र की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। ताजा मामला बारां जिले के छबड़ा की रहने वाली 26 वर्षीय शबनम बानो का है, जिनकी शनिवार रात कोटा के जेके लोन अस्पताल में मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि समय पर ऑपरेशन न होने और देर से रेफर करने से उनकी जान गई, जबकि अस्पताल प्रशासन का कहना है कि महिला को बेहद गंभीर हालत में कोटा लाया गया था।
इस कोटा प्रसूता मौत की खबर का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। 16 अक्टूबर से 24 अक्टूबर के बीच कोटा में तीन प्रसूताओं की मौत हो चुकी है और तीनों ही मामलों में सीजेरियन ऑपरेशन के बाद तबीयत बिगड़ने की बात सामने आई है। सवाल अब सिर्फ एक अस्पताल तक सीमित नहीं है — प्रसव के बाद महिलाओं की निगरानी और गंभीर स्थिति में त्वरित रेफरल की व्यवस्था कहां कमजोर पड़ रही है, यही असली सवाल है।
यह भी साफ करना जरूरी है कि परिजनों के आरोप अभी आरोप ही हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है और अस्पताल प्रशासन ने अपना पक्ष भी रखा है।
ताजा मामला: छबड़ा की शबनम बानो के साथ क्या हुआ
परिजनों के अनुसार शबनम बानो को 22 अक्टूबर को बारां के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिवार का कहना है कि चिकित्सकों ने अगले दिन ऑपरेशन से प्रसव कराने की बात कही थी और इसके लिए रात से ही उनका खाना-पीना बंद करवा दिया गया था। लेकिन मृतका के भाई सरफराज के आरोप के मुताबिक, करीब 12 घंटे गुजरने के बावजूद ऑपरेशन नहीं किया गया और इसी दौरान शबनम की तबीयत बिगड़ने लगी। 23 अक्टूबर की शाम करीब 7 बजे शबनम को आरएल-500 ड्रिप चढ़ाई गई, जिसके कुछ ही देर बाद उन्हें दौरे पड़ने लगे और हालत नाजुक हो गई। इसके बाद आनन-फानन में उन्हें कोटा के जेके लोन अस्पताल रेफर किया गया, जहां तमाम कोशिशों के बावजूद शबनम की जान नहीं बच सकी। शनिवार रात करीब 10 बजे उनकी मौत हो गई।
परिवार का सीधा सवाल है कि अगर ऑपरेशन पहले कर दिया जाता और रेफरल में देर न होती, तो क्या शबनम बच सकती थीं? इसका जवाब सिर्फ मेडिकल रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच से ही मिल सकता है।
अस्पताल प्रशासन का पक्ष: महिला कोमा की हालत में पहुंची थीं
जेके लोन अस्पताल की अधीक्षक डॉ. निर्मला के अनुसार, शबनम को बारां के अस्पताल में ही दौरे पड़ने लगे थे। वहां उन्हें दो दिन से भर्ती रखा गया था, लेकिन ऑपरेशन नहीं हो पाया। 23 अक्टूबर की रात जब महिला को कोटा लाया गया, तब वह कोमा की हालत में थीं। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, परिजनों को महिला की गंभीर स्थिति से अवगत कराने के बाद नवजात को बचाने के लिए उपचार संबंधी निर्णय लिया गया।
अस्पताल का यह पक्ष इसलिए अहम है क्योंकि यह समस्या को सिर्फ कोटा के अस्पताल तक सीमित नहीं रखता — शुरुआती इलाज और रेफरल की पूरी श्रृंखला में कहां देर हुई, यही जांच का मुख्य बिंदु है।
9 दिन, 3 मौतें: तीनों मामलों की टाइमलाइन
| तारीख | मामला | अस्पताल | सामने आई वजह |
|---|---|---|---|
| 16 अक्टूबर 2026 | 40 वर्षीय रेशमा की मौत | न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल, कोटा | सीजेरियन के बाद किडनी फेल होना बताया गया |
| 17 अक्टूबर 2026 | रोशन बैरवा की मौत | कोटा | सीजेरियन के बाद अत्यधिक रक्तस्राव |
| 24 अक्टूबर 2026 (शनिवार रात) | 26 वर्षीय शबनम बानो की मौत | जेके लोन अस्पताल, कोटा (बारां से रेफर) | दौरे पड़ने के बाद हालत बिगड़ी, कोमा में पहुंचीं |
तीनों मामलों में प्रसव के बाद तबीयत का अचानक बिगड़ना समान है — किडनी फेल, रक्तस्राव और दौरे, जिनमें शुरुआती पहचान और तुरंत इलाज ही जान बचा सकता है।
मई 2026 का मामला क्यों फिर याद आ रहा है
कोटा में प्रसूताओं की मौत का यह पहला सिलसिला नहीं है। मई 2026 में भी कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज और जेके लोन अस्पताल में 12 प्रसूताओं की किडनी प्रभावित होने का मामला सामने आया था, जिनमें पांच महिलाओं की मौत हो गई थी। उस मामले में तीन डॉक्टरों को निलंबित किया गया था, लेकिन बाद में चार जांच कमेटियों की रिपोर्ट में उन्हें लापरवाही का दोषी नहीं माना गया और अक्टूबर 2026 में तीनों बहाल कर दिए गए। इस पूरे प्रकरण की विस्तृत टाइमलाइन आप कोटा प्रसूता मौत मामले में डॉक्टरों की बहाली वाली हमारी पिछली रिपोर्ट में पढ़ सकते हैं; डायलिसिस पर चल रही पीड़िताओं की मांगों पर यह रिपोर्ट भी देखें।
मई के मामले से एक सबक साफ है — जल्दबाजी में दोष तय करने से न तो सच सामने आता है और न ही व्यवस्था सुधरती है। ताजा तीन मौतों के मामले में भी यही धैर्य और यही निष्पक्ष जांच चाहिए।
गर्भवती महिलाओं और परिजनों के लिए क्या ध्यान रखें
इस घटना से हर गर्भवती महिला के परिवार को कुछ व्यावहारिक बातें समझनी चाहिए। प्रसव के दौरान और उसके बाद इन लक्षणों पर तुरंत ध्यान दें:
- तेज सिरदर्द, धुंधली नजर या अचानक दौरे पड़ना — प्री-एक्लेम्पसिया के संकेत हो सकते हैं, तुरंत डॉक्टर को बताएं।
- प्रसव के बाद असामान्य रक्तस्राव, तेज बुखार या पेशाब में तेज कमी — खतरे के लक्षण हैं, नजरअंदाज न करें।
- उच्च रक्तचाप, एनीमिया या मधुमेह वाली गर्भवती महिलाओं को हाई रिस्क श्रेणी में रखा जाता है — प्रसव-पूर्व जांच नियमित होनी चाहिए।
- एमसीएचएन दिवस पर रक्तचाप, हीमोग्लोबिन, वजन और ब्लड शुगर की जांच कराना न छोड़ें।
- तबीयत बिगड़ने पर जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज रेफर करने में देर न करें — हर घंटे की देर जानलेवा हो सकती है।
राजस्थान में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की ओर से गर्भवती महिलाओं में हाई रिस्क प्रेग्नेंसी की समय पर पहचान के लिए स्क्रीनिंग अभियान भी चलाया जा रहा है, ताकि मातृ एवं शिशु मृत्यु दर कम हो सके।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: कोटा में 9 दिन में कितनी प्रसूताओं की मौत हुई है?
उत्तर: 16 से 24 अक्टूबर 2026 के बीच कोटा में तीन प्रसूताओं की मौत हुई है — 16 अक्टूबर को रेशमा, 17 अक्टूबर को रोशन बैरवा और 24 अक्टूबर की रात शबनम बानो।
प्रश्न 2: शबनम बानो के मामले में परिजनों का क्या आरोप है?
उत्तर: परिजनों का आरोप है कि बारां के सरकारी अस्पताल में करीब 12 घंटे तक ऑपरेशन नहीं किया गया, जिसके बाद तबीयत बिगड़ी और कोटा रेफर करने में देर हुई। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है।
प्रश्न 3: जेके लोन अस्पताल प्रशासन का क्या कहना है?
उत्तर: अधीक्षक डॉ. निर्मला के अनुसार शबनम को बारां में ही दौरे पड़ने लगे थे और कोटा लाए जाने पर वह कोमा की हालत में थीं। गंभीर स्थिति से परिजनों को अवगत कराकर नवजात को बचाने के लिए उपचार का निर्णय लिया गया।
प्रश्न 4: क्या मई 2026 के मामले से इसका कोई संबंध है?
उत्तर: सीधा संबंध स्थापित नहीं हुआ है, लेकिन दोनों मामले कोटा के सरकारी अस्पतालों में प्रसव के बाद महिलाओं की मौत से जुड़े हैं। मई के मामले में चार जांच कमेटियों ने डॉक्टरों को क्लीनचिट दी थी।
निष्कर्ष
कोटा में नौ दिन में तीन प्रसूताओं की मौत एक चेतावनी है — रेफरल व्यवस्था, प्रसवोत्तर निगरानी और हाई रिस्क गर्भावस्था की पहचान, तीनों मोर्चों पर सुधार की मांग करती हुई। परिजनों के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो और भविष्य में ऐसी मौतों को रोकने के लिए ठोस कदम उठें — यही इस दुखद घटना से निकलने वाली सबसे जरूरी मांग है।