दीपावली से ठीक पहले जयपुर की किसी गुलाबी दीवार पर नजर ठहर जाए, तो चौंकिएगा मत। शहर के 13 जोन में अब तक 617 दीवारों को संवारा जा चुका है, और उन पर अब सिर्फ गुलाबी रंग नहीं, बल्कि राजस्थान की अपनी लोककला मांडणा भी नजर आ रही है। इस बार कॉलेज और स्कूल के युवा खुद ब्रश उठाकर मैदान में उतर आए हैं, और शहर से अपील कर रहे हैं कि इन दीवारों को सजाना जितना जरूरी था, इन्हें बचाकर रखना उससे भी ज्यादा जरूरी है।
जयपुर मांडणा आर्ट की यह पहल नगर निगम के रंग दे गुलाबी 2.0 अभियान का अगला पड़ाव है। पहले चरण में दीवारों पर गुलाबी रंग चढ़ा, अब उन पर पारंपरिक मांडणे उकेरे जा रहे हैं। मंगलवार को महारानी कॉलेज के बाहर अशोक मार्ग पर भी यही नजारा दिखा, जहां युवतियां दीवारों पर मांडणे बनाती नजर आईं।
617 दीवारों का आंकड़ा क्या कहता है
किसी अभियान की गंभीरता उसके आंकड़ों से पता चलती है, और यहां आंकड़े साफ बता रहे हैं कि यह काम कुछ चुनिंदा जगहों तक सीमित नहीं रहा। रंग दे गुलाबी 2.0 के तहत शहर के अलग-अलग हिस्सों में एक साथ काम हुआ है, ताकि गुलाबी नगरी की पहचान सिर्फ परकोटे तक सिमटकर न रह जाए।
| विवरण | आंकड़ा |
|---|---|
| संवारी गई दीवारें | 617 |
| कवर किए गए जोन | 13 |
| अभियान | रंग दे गुलाबी 2.0 |
| संचालक | जयपुर नगर निगम |
| कला | पारंपरिक मांडणा आर्ट |
| ताजा गतिविधि | मंगलवार, महारानी कॉलेज के बाहर, अशोक मार्ग |
| युवाओं की अपील | दीवारों पर गुटखा न थूकें, पोस्टर न चिपकाएं, कचरा निर्धारित जगह पर डालें |
617 दीवारों का मतलब है कि बदलाव शहर के बड़े हिस्से में एक साथ दिख रहा है। एक-दो दीवारों पर पेंटिंग फोटो खिंचवाने जैसा लगती है, लेकिन 13 जोन तक फैला काम बताता है कि निगम ने इसे शहरव्यापी मुहिम के तौर पर लिया है, जिसे अब युवा आगे बढ़ा रहे हैं।
मांडणा क्या है, और यह दीवारों पर क्यों खास लग रहा है
मांडणा राजस्थान की पारंपरिक लोककला है, जिसमें घरों के आंगन, दीवारों और दरवाजों पर ज्यामितीय आकृतियां, फूल-पत्तियां, मोर और शुभ प्रतीक बनाए जाते हैं। लाल गेरू की पृष्ठभूमि पर सफेद खड़िया या चूने से ये आकृतियां उकेरी जाती हैं। दीपावली और शादी-विवाह जैसे मांगलिक मौकों पर मांडणा बनाने की परंपरा सदियों पुरानी है, और इसे शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
अब यही कला घरों के आंगन से निकलकर सार्वजनिक दीवारों पर पहुंच गई है। इससे दीवारें सांस्कृतिक पहचान वाली नजर आती हैं, और नई पीढ़ी अपनी लोकसंस्कृति से सीधे जुड़ रही है।
महारानी कॉलेज के बाहर मंगलवार का नजारा
मंगलवार को महारानी कॉलेज के बाहर अशोक मार्ग पर दीवारों पर मांडणे बनाती छात्राओं का दृश्य इस मुहिम की जीवंत तस्वीर थी। छात्राओं ने बताया कि वे शहर को स्वच्छ बनाने की मुहिम में शामिल हुई हैं — दीपावली पर घरों में रंग-रोगन होता है, और शहर भी उनका घर ही है।
एक छात्रा ने स्वच्छता रैंकिंग का उदाहरण देते हुए कहा कि जब कोई दूसरा शहर हर बार स्वच्छता में अव्वल आ सकता है, तो जयपुर क्यों नहीं। युवा यह मानने को तैयार नहीं हैं कि गंदगी शहर की नियति है — थोड़ी सी जिम्मेदारी और निरंतरता से गुलाबी नगरी भी साफ-सुथरी नजर आ सकती है।
जयपुर मांडणा आर्ट: सुंदर दीवारें बचाना सबसे बड़ी चुनौती
दीवारें सजाना एक काम है, और उन्हें सजाकर रखना दूसरा, कहीं ज्यादा मुश्किल काम है। एक अन्य छात्रा ने इस कड़वी सच्चाई की ओर ध्यान दिलाया कि दीवारों को सुंदर बनाने में लाखों रुपये और कलाकारों की महीनों की मेहनत लगती है, लेकिन पोस्टर चिपकाने, गुटखा थूकने और कचरा जमा होने से कुछ ही समय में उनकी खूबसूरती बिगड़ जाती है।
वहां मौजूद वॉलंटियर्स और शिक्षकों ने साफ कहा कि लोग अपने ही शहर को गंदा करके कलाकारों की मेहनत पर पानी फेर देते हैं। उनकी मांग है कि सजी हुई दीवारों को गंदा करने वालों पर सख्ती बढ़ाई जाए और जुर्माना लगाया जाए — जब तक गंदगी फैलाने की कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी, तब तक सिर्फ अपील से बदलाव नहीं आएगा।
रेड स्पॉट और येलो स्पॉट न बनाने की अपील
युवाओं ने शहरवासियों से एक सीधी और याद रखने लायक अपील की है — दीवारों पर गुटखा थूककर लाल धब्बे, यानी रेड स्पॉट, न बनाएं, सार्वजनिक स्थानों पर पेशाब करके पीले धब्बे, यानी येलो स्पॉट, न बनाएं, कचरा निर्धारित स्थान पर डालें और दीवारों पर पोस्टर चिपकाने से बचें।
यह अपील रोजमर्रा की आदतों की भाषा में की गई है। शहर को सुंदर बनाने में जितनी मेहनत लगती है, उसे बनाए रखने के लिए उतनी ही नागरिक भागीदारी जरूरी है।
दीपावली और गुलाबी नगरी की पहचान
दीपावली जयपुर के लिए सबसे बड़ा त्योहार है, और इस मौके पर शहर की तैयारी सिर्फ घरों तक सीमित नहीं रहती। परकोटे के बाजार, पुरानी हवेलियां और गुलाबी दीवारें मिलकर ही जयपुर की पहचान बनाते हैं। इसलिए दीवारों पर मांडणा का असर सिर्फ सुंदरता तक नहीं, पर्यटन और शहर की छवि पर भी पड़ता है।
जयपुर नगर निगम का रंग दे गुलाबी 2.0 अभियान पहले भी शहर की दीवारों को सजा चुका है, और दीपावली से पहले परकोटे की रोशनी भी तैयारी का हिस्सा रही है। मांडणा वाली दीवारें इसी तैयारी को सांस्कृतिक गहराई दे रही हैं, जबकि अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई से साफ है कि सुंदरता और व्यवस्था को एक साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।
अंत में बात इतनी सी है कि दीवारें सज गई हैं, अब बारी शहरवासियों की है। दीपावली पर घर को साफ-सुथरा बनाने की परंपरा को शहर तक पहुंचाने की जरूरत है — लोग अपने घरों की तरह सार्वजनिक स्थानों को भी साफ रखें, तो गुलाबी नगरी की पहचान और मजबूत होगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
जयपुर मांडणा आर्ट क्या है?
जयपुर मांडणा आर्ट राजस्थान की पारंपरिक लोककला मांडणा को शहर की दीवारों पर उकेरने की पहल है, जिसमें ज्यामितीय आकृतियां, फूल-पत्तियां, मोर और शुभ प्रतीक बनाए जाते हैं।
रंग दे गुलाबी 2.0 के तहत कितनी दीवारें संवारी गई हैं?
रंग दे गुलाबी 2.0 के तहत जयपुर के 13 जोन में अब तक 617 दीवारों को संवारा गया है, और अब उन पर युवा मांडणा आर्ट भी बना रहे हैं।
युवाओं ने शहरवासियों से क्या अपील की है?
युवाओं ने अपील की है कि दीवारों पर गुटखा थूककर रेड स्पॉट और पेशाब करके येलो स्पॉट न बनाएं, पोस्टर न चिपकाएं और कचरा निर्धारित स्थान पर डालें, ताकि सजी दीवारें लंबे समय तक सुंदर रहें।
मांडणा वाली दीवारें कहां देखी जा सकती हैं?
ताजा गतिविधि महारानी कॉलेज के बाहर अशोक मार्ग पर देखी गई है, और 13 जोन की 617 दीवारों पर यह काम फैला हुआ है। दीपावली के दौरान परकोटे और प्रमुख मार्गों पर भी यह सजावट नजर आएगी।
स्रोत: इस खबर की मूल जानकारी ETV Bharat की 27 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट पर आधारित है।