शनिवार को राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग ने एक और बड़ा प्रशासनिक आदेश जारी कर दिया। वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी डॉ. प्रशाखा माथुर को एपीओ कर दिया गया है, यानी उन्हें तत्काल प्रभाव से अपने वर्तमान पद से मुक्त करके पदस्थापन आदेशों की प्रतीक्षा में रखा गया है। प्रशाखा माथुर अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (पुलिस आयोजना एवं आधुनिकीकरण) के पद पर तैनात थीं। यह कार्रवाई इसलिए सुर्खियों में है क्योंकि महज दो दिन पहले ही उनके पति, वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल को भी इसी मामले में एपीओ किया जा चुका है। पति-पत्नी दोनों शीर्ष अधिकारी एक ही विवाद में पद से हटाए गए हैं, जिसे बेहद दुर्लभ घटनाक्रम बताया जा रहा है।
प्रशाखा माथुर APO आदेश में क्या है
कार्मिक विभाग के ताजा आदेश के बाद डॉ. प्रशाखा माथुर को पुलिस मुख्यालय में उनके दायित्वों से मुक्त कर दिया गया है। रिपोर्टों के अनुसार आदेश कार्मिक विभाग के शासन सचिव स्तर से जारी हुआ है। प्रशाखा माथुर 1995 बैच की आईपीएस अधिकारी हैं।
एपीओ का मतलब यह नहीं है कि अधिकारी को सेवा से हटा दिया गया है। एपीओ का पूरा नाम अवेटिंग पोस्टिंग ऑर्डर है। इसमें अधिकारी का वर्तमान पद छिन जाता है, लेकिन वह सेवा में बना रहता है और सरकार के अगले आदेश तक नई पोस्टिंग की प्रतीक्षा करता है। इस मामले में भी अब तक प्रशाखा माथुर की नई पोस्टिंग का कोई आदेश सामने नहीं आया है। यानी फिलहाल वह बिना किसी दायित्व के, नई तैनाती की प्रतीक्षा में हैं।
सूत्रों के अनुसार जांच की निष्पक्षता और विभागीय समीक्षा को ध्यान में रखकर यह कदम उठाया गया है। जिन संपत्तियों पर सवाल हैं, उनमें से कुछ प्रशाखा माथुर के नाम पर भी दर्ज बताई जाती हैं, इसलिए जांच का दायरा उन तक भी पहुंच सकता है।
पति-पत्नी दोनों पर कार्रवाई क्यों दुर्लभ मानी जा रही है
राजस्थान के प्रशासनिक इतिहास में ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के दो वरिष्ठ अधिकारी, जो पति-पत्नी भी हों, एक ही मामले में कुछ ही दिनों के अंतराल में एपीओ कर दिए जाएं। पहले शिखर अग्रवाल को एपीओ किया गया और अब उनकी पत्नी प्रशाखा माथुर पर भी वही कार्रवाई हुई है।
इससे यह संकेत भी मिलता है कि सरकार इस मामले को एक अधिकारी तक सीमित नहीं मान रही। भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत वरिष्ठता के बावजूद कार्रवाई का संदेश दिया गया है।
40 विला-कॉटेज का मामला: आंकड़ों में पूरी तस्वीर
इस पूरे विवाद की जड़ करीब ढाई साल के भीतर खरीदी गईं संपत्तियां हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार आईएएस शिखर अग्रवाल, आईपीएस प्रशाखा माथुर और उनके परिवार के सदस्यों के नाम पर उदयपुर और अलवर में कुल करीब 40 विला-कॉटेज खरीदे गए। इनकी कुल कीमत 6 करोड़ 16 लाख 50 हजार रुपये बताई गई है।
| ब्योरा | उदयपुर | अलवर |
|---|---|---|
| खरीद का समय | सितंबर 2023 | मार्च 2026 |
| स्थान | बुझड़ा, अनंता रिसॉर्ट | अजबगढ़, अनंता रिसॉर्ट |
| संपत्तियों की संख्या | 20 कॉटेज | 20 विला |
| विक्रेता कंपनी | गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड | गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड |
| सालाना लीज आय का दावा | 80 लाख रुपये | 1 करोड़ रुपये |
रिपोर्टों के अनुसार इन संपत्तियों को खरीदने के बाद उसी कंपनी को लीज पर दे दिया गया, जिससे हर साल कुल 1 करोड़ 80 लाख रुपये की लीज आय मिलने का दावा सामने आया है। उदयपुर में प्रति कॉटेज 4 लाख रुपये सालाना और अलवर में प्रति विला 5 लाख रुपये सालाना लीज दर बताई गई है। पति-पत्नी के नाम पर कुल 28 विला-कॉटेज दर्ज बताए गए हैं। बाकी संपत्तियां परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर हैं।
रजिस्ट्री, पावर ऑफ अटॉर्नी और आईपीआर पर उठे सवाल
इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा रजिस्ट्री और संपत्ति विवरण को लेकर हो रही है। रिपोर्टों के अनुसार रजिस्ट्री शिखर अग्रवाल, प्रशाखा माथुर, उनकी सास मंजुला और ससुर रघुवंश नारायण माथुर के नाम पर हुई। दोनों बेटों की रजिस्ट्री प्रशाखा माथुर के जरिए पावर ऑफ अटॉर्नी से कराए जाने की बात भी सामने आई है।
दूसरा बड़ा सवाल वार्षिक संपत्ति विवरण यानी आईपीआर को लेकर है। रिपोर्टों के अनुसार शिखर अग्रवाल ने 7 जनवरी 2026 के अपने आईपीआर में 14 संपत्तियों का उल्लेख किया था, जबकि प्रशाखा माथुर ने 8 जनवरी 2026 के अपने आईपीआर में संपत्ति संबंधी जानकारी शून्य बताई थी। आईपीआर और रजिस्ट्री रिकॉर्ड के बीच का यह फर्क जांच का विषय है, अपराध का सबूत नहीं।
एसीबी जांच में अब तक क्या हुआ
भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो यानी एसीबी इस मामले की जांच कर रहा है। रिपोर्टों के अनुसार एसीबी ने प्राथमिक जांच दर्ज की है और संपत्तियों की खरीद, उनकी कीमत, लीज समझौतों तथा आय के स्रोतों की पड़ताल की जा रही है। इससे पहले शिखर अग्रवाल के खिलाफ जांच की मंजूरी मिलने की भी खबरें आई थीं।
साफ रहे: अब तक किसी के खिलाफ अंतिम आरोप तय नहीं हुए हैं, न ही किसी गिरफ्तारी की पुष्टि हुई है। संबंधित अधिकारियों की ओर से आरोपों पर कोई विस्तृत सार्वजनिक सफाई भी अभी सामने नहीं आई है, इसलिए यह मामला फिलहाल कथित अनियमितता ही माना जाना चाहिए।
आगे क्या होगा
अब एसीबी की प्राथमिक जांच के बाद तय होगा कि आगे विस्तृत जांच या विभागीय कार्रवाई होगी या नहीं। प्रशाखा माथुर की नई पोस्टिंग भी सरकार के अगले आदेश पर निर्भर करेगी। विपक्ष इस मामले पर पहले से सवाल उठाता रहा है, जबकि सरकार का रुख है कि जांच एजेंसियों को अपना काम करने दिया जाए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रशाखा माथुर APO का मतलब क्या है?
एपीओ यानी अवेटिंग पोस्टिंग ऑर्डर में अधिकारी वर्तमान पद से हट जाता है, पर सेवा में बना रहता है और नई पोस्टिंग की प्रतीक्षा करता है।
क्या एपीओ किसी सजा के बराबर है?
नहीं, एपीओ सजा या बर्खास्तगी नहीं है। यह जांच या विभागीय समीक्षा के दौरान अपनाई जाने वाली प्रशासनिक व्यवस्था है; अंतिम कार्रवाई जांच के निष्कर्ष पर निर्भर करती है।
40 विला-कॉटेज का मामला क्या है?
कथित तौर पर ढाई साल में उदयपुर और अलवर में एक ही कंपनी से करीब 40 विला-कॉटेज (6.16 करोड़ रुपये) खरीदे गए। इन्हें उसी कंपनी को लीज पर देने और सालाना 1.80 करोड़ रुपये की लीज आय का दावा भी जांच के दायरे में है।
क्या इस मामले में किसी को दोषी ठहराया जा चुका है?
नहीं, एसीबी की जांच जारी है और कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं आया है, इसलिए सभी आरोप फिलहाल कथित ही माने जाने चाहिए।
कुल मिलाकर, पति के बाद पत्नी पर कार्रवाई इस हाई-प्रोफाइल मामले का नया मोड़ है। अब सबकी नजर एसीबी की जांच की अगली प्रगति पर रहेगी।