एसएमएस नशा मुक्ति वार्ड आज राजस्थान के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की सबसे अजीब पहेली बना हुआ है। डॉक्टर मरीज को देखेंगे, इलाज की सलाह देंगे, भर्ती की जरूरत भी बताएंगे — लेकिन भर्ती करने के लिए बेड नहीं मिलेगा। बेड के लिए मरीज को चार किलोमीटर दूर दूसरे अस्पताल तक जाना होगा। यही हकीकत रोजाना 150 से 180 मरीजों के साथ दोहराई जा रही है, और ये सिलसिला किसी एक-दो दिन का नहीं, पूरे छह साल से चल रहा है।
जयपुर के सवाई मानसिंह (SMS) अस्पताल के बांगड़ परिसर में कभी 20 बेड का नशा मुक्ति वार्ड चलता था। सितंबर 2020 में कोरोना काल के दौरान इसे अस्थायी तौर पर सेठी कॉलोनी स्थित मनोचिकित्सालय शिफ्ट किया गया। “अस्थायी” शब्द के साथ शुरू हुआ ये इंतजाम आज छह साल बाद भी वापस नहीं लौटा। नतीजा ये है कि नशे की लत से जूझ रहे गंभीर मरीजों को आज भी भर्ती की सुविधा के लिए शहर के दूसरे कोने का चक्कर लगाना पड़ रहा है।
रोज 180 मरीज, एक भी बेड नहीं — आज की हकीकत
वर्तमान में धनवंतरि ब्लॉक स्थित नशा मुक्ति एवं मानसिक स्वास्थ्य ओपीडी में रोजाना 150 से 180 मरीज पहुंचते हैं। ये आंकड़ा किसी छोटे अस्पताल का नहीं, प्रदेश के सबसे बड़े रेफरल अस्पताल का है। इन मरीजों में से रोज 5 से 8 ऐसे होते हैं जिनकी हालत को देखकर डॉक्टर तत्काल भर्ती करने की सलाह देते हैं। लेकिन सलाह देने के बाद डॉक्टर के हाथ भी बंध जाते हैं, क्योंकि एसएमएस नशा मुक्ति वार्ड में भर्ती की सुविधा ही मौजूद नहीं है।
ऐसे मरीजों को सेठी कॉलोनी स्थित मनोचिकित्सालय जाने के लिए कहा जाता है, जो यहां से करीब चार किलोमीटर दूर है। गंभीर हालत में पहुंचा मरीज और उसके परिजन — जिनके लिए अस्पताल आना ही अपने आप में बड़ी हिम्मत का काम होता है — अब नए अस्पताल की तलाश, नया रेफरल और नई कतार के चक्कर में फंस जाते हैं। इलाज कम, चक्कर ज्यादा — यही इस व्यवस्था की सबसे दर्दनाक सच्चाई बन गई है।
सबसे चिंताजनक बात ये है कि कई मरीज मनोचिकित्सालय में भर्ती होने से हिचकते भी हैं। नशे की लत से जुड़े सामाजिक कलंक (स्टिग्मा) की वजह से कई परिवार “मानसिक अस्पताल” के नाम से ही पीछे हट जाते हैं। ऐसे में उनका इलाज बीच में ही छूट जाने की आशंका बढ़ जाती है, और लत से उबरने की उनकी लड़ाई और मुश्किल हो जाती है।
छह साल पहले क्या हुआ था: कोरोना काल का अस्थायी फैसला जो स्थायी बन गया
इस पूरे मामले की जड़ सितंबर 2020 में है। कोरोना महामारी के चरम के दौरान अस्पताल प्रशासन ने बांगड़ परिसर में चल रहे 20 बेड के नशा मुक्ति वार्ड को अस्थायी तौर पर मनोचिकित्सालय शिफ्ट करने का फैसला लिया था। उस वक्त ये फैसला समझ में भी आता था — महामारी के दौरान अस्पतालों में जगह और संसाधनों का प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती थी, और कई वार्डों को अस्थायी रूप से इधर-उधर किया गया था।
लेकिन महामारी गुजरी, हालात सामान्य हुए, और दूसरी सेवाएं धीरे-धीरे अपनी जगह लौट आईं। सिर्फ एसएमएस नशा मुक्ति वार्ड ही ऐसा रहा जो अपने पुराने पते पर वापस नहीं आ सका। छह साल का लंबा वक्त बीत चुका है, सरकारें बदलीं, अस्पताल प्रशासन बदला, लेकिन ये वार्ड आज भी “अस्थायी” इंतजाम के भरोसे चल रहा है। सवाल ये है कि जिस फैसले को अस्थायी कहकर लिया गया था, उसे स्थायी बनने से रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी — और वो निभाई क्यों नहीं गई?
एसएमएस में भर्ती होते तो क्या फर्क पड़ता? डॉक्टरों की दलील
डॉक्टरों का कहना है कि नशा मुक्ति का इलाज सिर्फ एक वार्ड का मामला नहीं है। नशे की लत से ग्रस्त मरीजों में अक्सर लिवर, किडनी, हार्ट और पेट से जुड़ी गंभीर बीमारियां भी पाई जाती हैं। ऐसे मरीज को अगर एसएमएस अस्पताल में भर्ती किया जाए, तो गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, यूरोलॉजी और मेडिसिन जैसे विभागों की मदद तुरंत मिल सकती है। यहां सोनोग्राफी, सीटी स्कैन, एमआरआई जैसी जांचें और जरूरत पड़ने पर आईसीयू की सुविधा भी एक ही छत के नीचे उपलब्ध है।
इसके उलट, जब मरीज को चार किलोमीटर दूर मनोचिकित्सालय भेजा जाता है, तो ये पूरी मल्टी-स्पेशलिटी मदद उससे छूट जाती है। मनोचिकित्सालय अपने काम में विशेषज्ञ जरूर है, लेकिन गंभीर शारीरिक बीमारियों से जूझ रहे नशा मुक्ति के मरीज के लिए ये दूरी जानलेवा भी साबित हो सकती है। डॉक्टरों की ये दलील सिर्फ सुविधा की नहीं, मरीज की जान की है।
हाल ही में प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की समीक्षा बैठक में भी इस बात पर जोर दिया गया था कि आमजन को समय पर गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधाएं मिलें और किसी भी स्तर पर लापरवाही न हो। राजस्थान स्वास्थ्य समीक्षा: गायत्री राठौड़ की सख्त हिदायतों पर हमारी ये रिपोर्ट बताती है कि सरकार खुद इस दिशा में गंभीर है — लेकिन एसएमएस नशा मुक्ति वार्ड का छह साल से बंद रहना इसी गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है।
प्रशासन का जवाब और दिवाली के बाद की उम्मीद
अस्पताल प्रशासन अब तक जगह की कमी को इस वार्ड के न खुलने की सबसे बड़ी वजह बताता रहा है। एसएमएस मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. दीपक माहेश्वरी का कहना है कि अस्पताल में नशा मुक्ति वार्ड की जरूरत को वे समझते हैं, लेकिन जगह की कमी के कारण दिक्कत आ रही है। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि जल्द ही इसके लिए जगह तलाशकर वार्ड दोबारा शुरू किया जाएगा।
अब एक नई उम्मीद दिवाली के बाद की व्यवस्था से जुड़ी है। कार्डियक टावर में आईपीडी शुरू होने के बाद बांगड़ परिसर में वार्ड खाली होने की संभावना जताई जा रही है। अगर ऐसा होता है, तो वहां एसएमएस नशा मुक्ति वार्ड को दोबारा शुरू किया जा सकता है। लेकिन ये “संभावना” और “हो सकता है” जैसे शब्द मरीजों के लिए अब नए नहीं हैं — छह साल में ऐसे कितने ही आश्वासन आकर चले गए। असली सवाल ये है कि क्या इस बार वाकई जमीन पर कुछ बदलेगा, या ये भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
गौरतलब है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों की परेशानी का ये कोई अकेला मामला नहीं है। हाल ही में निजी अस्पतालों में RGHS लाभार्थियों से अतिरिक्त वसूली के आरोप सामने आए थे, और होम बेस्ड पेलिएटिव केयर योजना भले ही तीन लाख से ज्यादा मरीजों तक पहुंची हो, लेकिन अस्पताल के अंदर की ये बुनियादी खामियां बताती हैं कि सिस्टम में अभी बहुत कुछ ठीक करना बाकी है।
मरीजों और परिजनों के लिए काम की जानकारी
अगर आप या आपका कोई परिचित नशा मुक्ति के इलाज के लिए एसएमएस अस्पताल जा रहे हैं, तो ये जानकारी आपके काम आएगी:
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| ओपीडी कहां लगती है | धनवंतरि ब्लॉक, नशा मुक्ति एवं मानसिक स्वास्थ्य ओपीडी, एसएमएस अस्पताल, जयपुर |
| रोज कितने मरीज आते हैं | 150 से 180 |
| भर्ती की सुविधा | एसएमएस में नहीं — सेठी कॉलोनी स्थित मनोचिकित्सालय (करीब 4 किमी दूर) जाना होगा |
| वार्ड कब से बंद है | सितंबर 2020 से (कोरोना काल में अस्थायी शिफ्ट) |
| मूल क्षमता | 20 बेड, बांगड़ परिसर |
| दोबारा खुलने की उम्मीद | कार्डियक टावर में आईपीडी शुरू होने के बाद बांगड़ परिसर में जगह मिलने पर |
याद रखें: नशा मुक्ति का इलाज लंबी प्रक्रिया है, और इसमें परिवार का साथ सबसे बड़ी दवा है। भर्ती में देरी या दूरी की वजह से इलाज बीच में न छोड़ें। मनोचिकित्सालय में भर्ती होने से हिचकिचाने के बजाय डॉक्टरों से खुलकर बात करें — इलाज का हक हर मरीज को है, चाहे वो किसी भी अस्पताल में मिले। सरकारी योजनाओं और सुविधाओं की आधिकारिक जानकारी के लिए चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग, राजस्थान सरकार के सेक्टोरल पोर्टल पर भी नजर डाल सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: एसएमएस अस्पताल का नशा मुक्ति वार्ड कब से बंद है?
उत्तर: ये वार्ड सितंबर 2020 से बंद है। कोरोना काल में इसे अस्थायी तौर पर सेठी कॉलोनी स्थित मनोचिकित्सालय शिफ्ट किया गया था, जो छह साल बाद भी वापस नहीं लौटा है।
प्रश्न 2: अभी नशा मुक्ति के मरीज कहां भर्ती होते हैं?
उत्तर: एसएमएस अस्पताल में भर्ती की सुविधा नहीं है। मरीजों को करीब चार किलोमीटर दूर सेठी कॉलोनी स्थित मनोचिकित्सालय में भर्ती के लिए जाना पड़ता है।
प्रश्न 3: रोज कितने मरीज नशा मुक्ति ओपीडी में आते हैं?
उत्तर: धनवंतरि ब्लॉक स्थित नशा मुक्ति एवं मानसिक स्वास्थ्य ओपीडी में रोजाना 150 से 180 मरीज आते हैं, जिनमें से 5 से 8 को तत्काल भर्ती की जरूरत होती है।
प्रश्न 4: वार्ड दोबारा कब शुरू हो सकता है?
उत्तर: अस्पताल प्रशासन के मुताबिक कार्डियक टावर में आईपीडी शुरू होने के बाद बांगड़ परिसर में वार्ड खाली होगा, जहां नशा मुक्ति वार्ड दोबारा शुरू किया जा सकता है। हालांकि इसकी कोई तय तारीख अभी घोषित नहीं हुई है।
छह साल लंबा वक्त होता है। एसएमएस नशा मुक्ति वार्ड की कहानी सिर्फ एक वार्ड के बंद होने की नहीं, उस सिस्टम की है जो “अस्थायी” फैसलों को बिना समीक्षा के स्थायी बना देता है। प्रशासन अब जगह तलाशकर वार्ड शुरू करने का वादा कर रहा है — देखना है कि इस बार फाइल आगे बढ़ती है या एक और “जल्द ही” में दबकर रह जाएगा?