आपके गांव की दूध डेयरी समिति अब सिर्फ दूध खरीदने का केंद्र नहीं रहेगी। वहीं से पशुओं का चारा मिलेगा, पशु चिकित्सक की सुविधा मिलेगी, फसल के लिए बीज-खाद मिलेगा, और जरूरत पड़ी तो ऋण और बीमा भी। इतना ही नहीं, उसी समिति के परिसर में किराना स्टोर, गैस एजेंसी या पेट्रोल पंप भी खुल सकता है।
ये कोई चुनावी वादा नहीं, बल्कि सहकारिता विभाग का ताजा फैसला है। विभाग ने बहुउद्देशीय ग्राम डेयरी सहकारी सोसाइटियों (M-VDCS) के लिए नई आदर्श डेयरी समिति उपविधियां जारी कर दी हैं। नई डेयरी समिति उपविधियां लागू होते ही प्रदेश की हजारों दुग्ध समितियां बहुउद्देशीय केंद्रों में बदल जाएंगी। इसका सबसे बड़ा असर गांव के दूध उत्पादक किसानों पर पड़ेगा — आय के स्रोत बढ़ेंगे और दूध का पैसा डिजिटल तरीके से सीधे बैंक खाते में आएगा।
सिर्फ दूध नहीं: डेयरी समिति उपविधियां लाईं ऋण, बीमा और कृषि इनपुट
नई व्यवस्था में दुग्ध डेयरी समिति के जरिए दूध उत्पादक सिर्फ दूध बेचकर ही नहीं, बल्कि कई और कामों से भी कमाई कर सकेंगे। नई डेयरी समिति उपविधियां कहती हैं कि समितियां अब पशुपालन, चारा, प्रजनन (ब्रीडिंग), पशु चिकित्सा, बीमा, ऋण, कृषि इनपुट, बागबानी, मधुमक्खी पालन, मुर्गीपालन और डिजिटल सेवाओं जैसी गतिविधियां चला सकेंगी।
यानी एक ही छत के नीचे पशुओं का इलाज, प्रजनन सुविधा, गुणवत्तापूर्ण चारा और फसल के लिए खाद-बीज मिल सकेगा। मधुमक्खी पालन या मुर्गीपालन जैसी सहायक गतिविधियों से अतिरिक्त आय का रास्ता भी खुलेगा।
उपभोक्ता स्टोर, किराना स्टोर, गैस एजेंसी और पेट्रोल पंप जैसी व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति भी डेयरी समिति उपविधियां देती हैं। ये काम संबंधित लाइसेंस और कानूनों के दायरे में ही होंगे — समिति को जरूरी अनुमतियां लेनी होंगी। लेकिन रास्ता साफ है: गांव की डेयरी अब गांव का मिनी व्यावसायिक केंद्र बन सकती है।
सहकारिता क्षेत्र में बहुउद्देशीय समितियों का यह पहला प्रयोग नहीं है। एम-पैक्स साख सीमा को लेकर सहकारिता विभाग ने हाल ही में नए दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिनसे कृषि ऋण समितियों को खाद-बीज व्यापार के लिए बैंक कर्ज का रास्ता खुला था।
डेयरी समिति उपविधियां: दूध का भुगतान 10 दिन में सीधे खाते में
आम दूध उत्पादक पर सबसे सीधा असर भुगतान प्रणाली पर पड़ेगा। नई डेयरी समिति उपविधियां तय करती हैं कि सदस्यों को दूध का भुगतान डिजिटल माध्यम से किया जाएगा, और दूध मिलने के 10 दिन के भीतर राशि सीधे उनके बैंक खाते में डाल दी जाएगी।
आज भी कई जगह दूध का भुगतान नकद या अनियमित अंतराल पर होता है। डिजिटल भुगतान और तय समय-सीमा से पारदर्शिता बढ़ेगी, बिचौलियों की गुंजाइश घटेगी। बैंक खाते में सीधा पैसा आने से उत्पादक का वित्तीय रिकॉर्ड भी बनेगा, जो भविष्य में ऋण लेने में काम आएगा।
सदस्यता की नई शर्तें: 180 दिन दूध, साल में 300 लीटर
नई डेयरी समिति उपविधियां सुविधाएं बढ़ाने के साथ-साथ सदस्यता के नियम भी स्पष्ट करती हैं। सक्रिय दुग्ध उत्पादक सदस्य बनने के लिए अब कम से कम 180 दिन दूध की आपूर्ति करनी होगी और साल भर में कम से कम 300 लीटर दूध देना होगा।
फ्लश और लीन सीजन में आपूर्ति का अनुपात 3:1 रखा गया है — सदस्य को साल भर नियमित दूध देना होगा। नई समितियों पर यह शर्त पंजीकरण के दो साल बाद से लागू होगी, ताकि उन्हें पैर जमाने का समय मिल सके। एक परिवार से केवल एक ही व्यक्ति सदस्य बन सकेगा, जिससे कुछ परिवारों का वर्चस्व रुकेगा और ज्यादा परिवार जुड़ सकेंगे।
आंकड़ों में राजस्थान की डेयरी ताकत
डेयरी समिति उपविधियां कितनी अहम हैं, यह प्रदेश के डेयरी क्षेत्र के आंकड़े बताते हैं:
| मद | आंकड़ा |
|---|---|
| जयपुर डेयरी के सदस्य (जयपुर व दौसा जिले) | 2.2 लाख से अधिक |
| जयपुर डेयरी की सक्रिय दुग्ध समितियां | 2,800 से अधिक |
| सहकारी दुग्ध संकलन (दिसंबर 2025 तक औसत) | 30.29 लाख लीटर प्रतिदिन |
| स्थापित दुग्ध प्रसंस्करण क्षमता | 51.40 लाख लीटर प्रतिदिन |
| प्रदेश का रोजाना दूध उत्पादन (अनुमानित) | लगभग 1000 लाख लीटर |
| देश के कुल दूध उत्पादन में हिस्सेदारी (2024-25) | 14.82 प्रतिशत |
| सहकारी व्यवस्था से जुड़े दुग्ध उत्पादक (दिसंबर 2024 तक) | 9.25 लाख |
राजस्थान देश के प्रमुख दुग्ध उत्पादक राज्यों में है, लेकिन सहकारी डेयरियां रोजाना सिर्फ 30.29 लाख लीटर दूध ही खरीद पा रही हैं, जबकि प्रसंस्करण क्षमता 51.40 लाख लीटर प्रतिदिन की है। क्षमता और वास्तविक संकलन के बीच यह बड़ा अंतर है — नई बहुउद्देशीय समितियां इसे पाटने में मदद कर सकती हैं।
गांव के दूध उत्पादक के लिए इसका क्या मतलब है
अगर आप दूध उत्पादक हैं, तो नई उपविधियों का व्यावहारिक मतलब चार बातों में है। पहला — समिति अब एक ही जगह कई सेवाएं देगी: पशु चिकित्सा, प्रजनन सुविधा, चारा और कृषि सामग्री के लिए शहर के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। दूसरा — 10 दिन के भीतर डिजिटल भुगतान सीधे खाते में आएगा, तो नकदी की अनिश्चितता खत्म होगी। तीसरा — बागबानी, मधुमक्खी पालन, मुर्गीपालन या डिजिटल सेवा केंद्र से दूध के अलावा भी कमाई हो सकेगी। कृषि विभाग की आत्मा योजना के तहत डेयरी में नवाचार करने वाले किसानों को पुरस्कार भी मिल रहे हैं। चौथा — सदस्यता अब “नाम के लिए” नहीं चलेगी: 180 दिन की आपूर्ति और साल में 300 लीटर दूध की शर्त का मतलब है नियमित दूध देना ही होगा।
कुल मिलाकर, सहकारिता विभाग का यह कदम गांव की डेयरी को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाने का बड़ा प्रयोग है — अब देखना है कि उपविधियां गांव-गांव में कितनी जल्दी असर दिखाती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: M-VDCS क्या है?
उत्तर: M-VDCS यानी बहुउद्देशीय ग्राम डेयरी सहकारी सोसाइटी — गांव स्तर की दुग्ध सहकारी समिति। नई डेयरी समिति उपविधियां लागू होने के बाद यह सिर्फ दूध खरीदने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पशुपालन, ऋण, बीमा, कृषि इनपुट और डिजिटल सेवाओं समेत कई काम कर सकेगी।
प्रश्न 2: डेयरी समिति उपविधियां सदस्यता के लिए क्या शर्तें रखती हैं?
उत्तर: सक्रिय दुग्ध उत्पादक सदस्य के लिए कम से कम 180 दिन दूध की आपूर्ति और साल में 300 लीटर दूध जरूरी होगा। फ्लश और लीन सीजन में आपूर्ति का अनुपात 3:1 रहेगा। नई समितियों पर यह शर्त पंजीकरण के दो साल बाद लागू होगी, और एक परिवार से सिर्फ एक व्यक्ति सदस्य बन सकेगा।
प्रश्न 3: दूध के पैसे का भुगतान कैसे होगा?
उत्तर: दूध का भुगतान डिजिटल माध्यम से होगा और दूध मिलने के 10 दिन के भीतर राशि सीधे सदस्य के बैंक खाते में डाल दी जाएगी।
प्रश्न 4: डेयरी समिति अब कौन-कौन से नए काम कर सकती है?
उत्तर: पशुपालन, चारा, प्रजनन, पशु चिकित्सा, बीमा, ऋण, कृषि इनपुट, बागबानी, मधुमक्खी पालन, मुर्गीपालन और डिजिटल सेवाएं — साथ ही लाइसेंस व कानूनों के दायरे में उपभोक्ता स्टोर, किराना स्टोर, गैस एजेंसी और पेट्रोल पंप जैसी गतिविधियां भी।
स्रोत: दैनिक नवज्योति