राजस्थान में 678 डॉक्टरों पर कानूनी कार्रवाई की तलवार: ड्यूटी से नदारद, अंतिम नोटिस के बाद सेवा समाप्ति की तैयारी

सोचिए, आप सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचे हैं और वहां का डॉक्टर महीनों — यहां तक कि वर्षों से ड्यूटी पर ही नहीं आया। यह किसी काल्पनिक कहानी की पटकथा नहीं, बल्कि राजस्थान की सरकारी चिकित्सा व्यवस्था की जमीनी हकीकत है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं निदेशालय ने अब ऐसे 678 चिकित्सकों की सूची जारी की है, जो स्थानांतरण या पदस्थापन के आदेश के बाद भी कार्यग्रहण नहीं किया या लंबे समय से ड्यूटी से अनुपस्थित हैं। विभाग ने इन्हें अपना पक्ष रखने का अंतिम अवसर दिया है — निर्धारित अवधि में जवाब नहीं आया तो सेवा समाप्ति की कार्रवाई शुरू हो जाएगी।

678 का अंक क्यों मायने रखता है

पहली नजर में 678 सिर्फ एक संख्या लग सकती है, लेकिन असलियत में यह राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी के संकट का आईना है। इन चिकित्सकों के नाम पर पोस्टें भरी हुई हैं, वेतन और पदोन्नति की व्यवस्था उन्हीं के नाम पर चल रही है, लेकिन अस्पतालों में ये डॉक्टर मौजूद ही नहीं हैं। नतीजा — मरीजों को या तो घंटों इंतजार करना पड़ता है या फिर प्राइवेट अस्पतालों का महंगा रास्ता अपनाना पड़ता है।

निदेशालय के नोटिस के साथ संलग्न सूची में हर चिकित्सक का नाम, पद, योग्यता, जन्मतिथि और आरपीएससी से जुड़ा विवरण दर्ज है। यानी अब यह कोई अनाम चेतावनी नहीं, बल्कि नाम-दर-नाम जवाबदेही तय करने की तैयारी है।

कौन-कौन शामिल है इस सूची में

विभाग के अनुसार, सूची में शामिल चिकित्सक मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बंटे हैं:

  • ट्रांसफर के बाद जॉइन न करने वाले: जिनका एक स्थान से दूसरे स्थान पर तबादला हुआ, लेकिन नई पोस्टिंग पर उन्होंने कार्यभार ही नहीं संभाला।
  • पदस्थापन के बाद कार्यग्रहण न करने वाले: जिनके नाम पर नियुक्ति का आदेश जारी हुआ, मगर वे ड्यूटी पर आए ही नहीं।
  • लंबे समय से अनुपस्थित रहने वाले: जो कागजों में सरकारी सेवा में हैं, लेकिन महीनों से ड्यूटी से बाहर हैं।

निदेशालय का कहना है कि इनमें से अधिकांश चिकित्सक वे हैं जिन्हें बार-बार निर्देश दिए गए, मगर वे ड्यूटी पर लौटने को तैयार नहीं हुए।

अप्रैल से अब तक: चेतावनी का पूरा क्रम

यह कार्रवाई अचानक नहीं हुई है। चिकित्सा विभाग ने अप्रैल महीने से अब तक ऐसे चिकित्सकों को तीन बार चेतावनी जारी की है। हर बार मौका दिया गया कि या तो ड्यूटी पर लौट आएं या अपना पक्ष स्पष्ट करें। लेकिन करीब 678 चिकित्सकों ने अब तक न तो कार्यग्रहण किया और न ही संतोषजनक जवाब दिया।

चरण समय विभाग की कार्रवाई
पहली चेतावनी अप्रैल 2026 ड्यूटी पर लौटने का निर्देश
दूसरी चेतावनी बीच का दौर पुनः नोटिस, पक्ष रखने का अवसर
तीसरी चेतावनी हाल ही में अंतिम अवसर, सूची सार्वजनिक
वर्तमान स्थिति अक्टूबर 2026 विधिक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू

विभाग ने स्पष्ट किया है कि जो चिकित्सक निर्धारित समय में अपना अभ्यावेदन प्रस्तुत नहीं करेंगे, उनके खिलाफ राजस्थान सेवा नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगी — जिसमें सेवा समाप्ति तक का प्रावधान शामिल है।

पीजी करने गए डॉक्टरों से बांड की वसूली भी होगी

मामले का एक और पहलू सेवारत कोटे से पीजी (स्नातकोत्तर) करने गए चिकित्सक हैं। कई डॉक्टर सरकारी सेवा में रहते हुए पीजी की पढ़ाई के लिए ब्रेक लेते हैं और इस दौरान सरकार से बांड की शर्तों पर सुविधाएं प्राप्त करते हैं। बांड की शर्त होती है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद वे निर्धारित अवधि तक सरकारी सेवा में काम करेंगे।

विभाग ने संकेत दिया है कि ऐसे मामलों में बांड की शर्तों के अनुसार राशि की वसूली की जाएगी। इतना ही नहीं, राजस्थान मेडिकल काउंसिल से इन डॉक्टरों का पंजीयन निरस्त करने की कार्रवाई भी हो सकती है। मेडिकल काउंसिल का पंजीयन रद्द होना किसी डॉक्टर के करियर के लिए सबसे बड़ा झटका होता है, क्योंकि इसके बिना प्रैक्टिस संभव नहीं है।

मरीजों की व्यवस्था किसके भरोसे?

यहां सबसे बड़ा सवाल मरीजों का है। बड़ी संख्या में चिकित्सकों के लंबे समय से ड्यूटी से बाहर रहने के बाद भी अस्पतालों का काम तो चलता रहा — आखिर इलाज किसके भरोसे हुआ? या तो शेष बचे डॉक्टरों पर दोगुना-तिगुना बोझ पड़ा, या फिर कई जगहों पर मरीजों को समुचित इलाज ही नहीं मिला।

निदेशक जनस्वास्थ्य, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग डॉ. रविप्रकाश शर्मा के अनुसार, कई नोटिस जारी करने के बाद भी करीब 678 चिकित्सकों ने कार्यग्रहण नहीं किया है। अब विभाग ने इनके खिलाफ विधिक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी है। विभाग का रुख स्पष्ट है — कागजों पर डॉक्टर और अस्पताल में खाली ओपीडी, यह स्थिति अब और बर्दाश्त नहीं होगी।

अब इन डॉक्टरों के पास क्या विकल्प हैं

विभाग ने सभी 678 चिकित्सकों को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का अंतिम अवसर दिया है। उनके पास यह बताने का मौका है कि वे ड्यूटी पर क्यों नहीं लौट सके — कोई वैध कारण, चिकित्सकीय आपात स्थिति या प्रशासनिक अड़चन, जो भी हो, उसे अभ्यावेदन के माध्यम से प्रस्तुत करना होगा।

निर्धारित अवधि में जवाब न देने या असंतोषजनक जवाब मिलने की स्थिति में विभाग राजस्थान सेवा नियमों के तहत कदम बढ़ाएगा। सेवा समाप्ति के अलावा, बांड की राशि की वसूली और मेडिकल काउंसिल के पंजीयन पर भी असर पड़ सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या इन 678 डॉक्टरों की नौकरी तुरंत चली जाएगी?

नहीं। पहले सभी को नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का अंतिम अवसर दिया गया है। निर्धारित अवधि में जवाब न देने या असंतोषजनक जवाब पर ही राजस्थान सेवा नियमों के तहत कार्रवाई होगी।

तीसरी चेतावनी के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई अब तक?

विभाग ने अप्रैल से अब तक तीन बार चेतावनी दी है। हर बार औपचारिक अवसर देना नियमानुसार जरूरी था। अब विभाग का कहना है कि विधिक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

पीजी करने गए डॉक्टरों का क्या होगा?

सेवारत कोटे से पीजी करने वाले डॉक्टरों से बांड की शर्तों के अनुसार राशि की वसूली की जाएगी और राजस्थान मेडिकल काउंसिल से पंजीयन निरस्त करने की कार्रवाई भी हो सकती है।

क्या मरीजों की इलाज व्यवस्था पर कोई तत्काल असर पड़ेगा?

इन डॉक्टरों के नाम पर जो पद भरे हुए थे, उनके खाली होने पर विभाग को नई भर्ती या समायोजन करना होगा। मरीजों के लिए यह दीर्घकालिक राहत का रास्ता है, क्योंकि खाली पद भरने से अस्पतालों में असल डॉक्टर उपलब्ध होंगे।

अस्वीकरण: यह लेख प्रकाशित समाचार रिपोर्टों पर आधारित है। किसी भी निर्णय से पहले चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की आधिकारिक अधिसूचना की पुष्टि अवश्य करें।

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