राजस्थान के किसानों के पानी पर फिर छिड़ी तकरार
राजस्थान के खेतों तक पहुंचने वाले सतलज के पानी को लेकर दो राज्यों के बीच तकरार एक बार फिर तेज हो गई है। सतलज पानी रॉयल्टी विवाद में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने राजस्थान से पानी के बदले 1.44 लाख करोड़ रुपये की रॉयल्टी की मांग दोहराई है, और राजस्थान सरकार ने उसी साफगोई से इसे खारिज कर दिया है। जल संसाधन मंत्री सुरेश रावत का कहना है कि राजस्थान पानी के बदले कोई पैसा नहीं देगा, क्योंकि ऐसी किसी रॉयल्टी का कोई कानूनी आधार ही नहीं है।
यह मुद्दा पंजाब विधानसभा के विशेष सत्र से फिर उठा, जहां भगवंत मान ने एक दिन पहले सतलज का मुद्दा उठाया। राजस्थान ने मांग को राजनीतिक साजिश करार दिया और भरोसा दिलाया कि पेयजल की कोई दिक्कत नहीं होगी।
सतलज पानी रॉयल्टी विवाद में राजस्थान का दो टूक जवाब
जल संसाधन मंत्री सुरेश रावत ने साफ कहा है कि एक राज्य दूसरे राज्य से पानी के बदले पैसे नहीं ले सकता। उनके मुताबिक सतलज के पानी पर रॉयल्टी की कोई रकम बनती ही नहीं है, इसलिए राजस्थान किसी भी तरह का भुगतान नहीं करेगा। मंत्री ने मांग को असंवैधानिक बताया है — उनका तर्क है कि अंतरराज्यीय नदियों का पानी बेचने-खरीदने की चीज नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय संसाधन है, जिस पर संसद का अधिकार होता है। इसी दलील के लिए उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 262 का भी हवाला दिया है।
रावत ने यह भी कहा कि राजस्थान इस विवाद को सुलझाने के लिए बैठक और बातचीत करने को तैयार है। यानी बातचीत का दरवाजा खुला है, लेकिन रॉयल्टी पर बात नहीं होगी — सिद्धांत एक बार मान लिया गया तो हर बार नया दबाव बनेगा।
पंजाब का ताजा दावा: विधानसभा में फिर उठा मुद्दा
भगवंत मान का कहना है कि साल 1960 तक राजस्थान पंजाब को पानी की रॉयल्टी देता रहा है, लेकिन अब वह मुफ्त पानी लेकर आगे बेच रहा है। उन्होंने इसे ‘बिजनेस’ बताया — कि हमसे कच्चा माल मुफ्त ले लिया और प्रोडक्ट बनाकर बेच दिया। मान ने विधानसभा में इस मुद्दे पर प्रस्ताव भी पेश किया और सोशल मीडिया पर लिखा कि पंजाब के पानी पर सिर्फ पंजाब का हक है। उन्होंने एसवाईएल की जगह वाईएसएल नहर बनाने की बात भी उठाई है।
राजस्थान इसे चुनावी माहौल बनाने की कोशिश मानता है।
यह पहली बार नहीं: मार्च 2026 में भी यही मांग खारिज हो चुकी है
यह मांग बिल्कुल नई नहीं है। इसी साल 19 मार्च को भगवंत मान ने यही रॉयल्टी मांगते हुए पानी रोकने की चेतावनी दी थी, और अगले ही दिन 20 मार्च को मंत्री सुरेश सिंह रावत ने इसे खारिज कर दिया था। इस बार फर्क सिर्फ इतना है कि मांग पंजाब विधानसभा के विशेष सत्र में फिर उठाई गई है और राजस्थान ने फिर उसी मजबूती से जवाब दिया है — यानी यह एक पुराने विवाद का नया दौर है।
1920 से 1981 तक: सतलज पानी के समझौतों का पूरा हिसाब
पंजाब की दलील 1920 के एक समझौते पर टिकी है, जो ब्रिटिश सरकार, बीकानेर रियासत और बहावलपुर (अब पाकिस्तान में) के बीच हुआ था। राजस्थान का कहना है कि उस समझौते के तहत कोई शुल्क ब्रिटिश सरकार को देय था, न कि पंजाब प्रांत को। आजादी के बाद रावी, ब्यास और सतलज के बंटवारे पर 1955, 1959 और 1981 में समझौते हुए — राजस्थान का कहना है कि इनमें से किसी में भी रॉयल्टी का कोई प्रावधान नहीं है।
| साल | समझौता / व्यवस्था | राजस्थान के लिए क्या तय हुआ |
|---|---|---|
| 1920 | ब्रिटिश सरकार, बीकानेर रियासत, बहावलपुर समझौता | शुल्क ब्रिटिश सरकार को देय था, पंजाब को नहीं |
| 1955 | आजादी के बाद पानी बंटवारा समझौता | राजस्थान को 8.00 एमएएफ पानी |
| 1959 | रावी-ब्यास-सतलज उपयोग समझौता | रॉयल्टी का कोई प्रावधान नहीं |
| 1981 | पानी बंटवारा समझौता | राजस्थान को 8.60 एमएएफ पानी, रॉयल्टी का प्रावधान नहीं |
राजस्थान को पानी बीकानेर नहर, राजस्थान फीडर, भाखड़ा मेन लाइन और सरहिंद फीडर के जरिए मिलता है, जिनका नियमन भारत सरकार के अधीन भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) करता है। राजस्थान का कहना है कि पानी देना या रोकना किसी एक राज्य के हाथ में नहीं है, बल्कि इसमें केंद्र सरकार की अहम भूमिका है।
किसानों और आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस तकरार का असर जमीन पर क्या होगा। राजस्थान सरकार ने साफ कहा है कि प्रदेश के लोगों को पेयजल की कोई दिक्कत नहीं होगी और राज्य के पास पर्याप्त पानी है।
किसानों के लिहाज से भी यह विवाद सीधा असर रखता है। राजस्थान के उत्तरी जिलों की सिंचाई नहरी पानी से जुड़ी है, और अगर बंटवारे पर अनिश्चितता बढ़ती है तो फसल चक्र और बुवाई के फैसले प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि अभी तक पानी की आपूर्ति में किसी कटौती की खबर नहीं है — विवाद बयानबाजी और कानूनी दावों के स्तर पर है। पानी की कमी की हकीकत जानने के लिए डीडवाना-कुचामन में जल संकट और 31 जिलों में चारा-पानी का संकट पढ़ें, और सिंचाई की लागत कम करने वाली 1,575 कृषि यंत्र किराया केंद्रों की योजना भी देखें।
आगे क्या होगा: बातचीत होगी या विवाद और बढ़ेगा?
फिलहाल दोनों राज्य अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं। पंजाब रॉयल्टी के दावे को विधानसभा के प्रस्ताव के जरिए मजबूत करना चाहता है, जबकि राजस्थान इसे असंवैधानिक बताकर खारिज कर चुका है। राजस्थान ने बातचीत का दरवाजा खुला रखा है, लेकिन रॉयल्टी के भुगतान से इनकार साफ है। अगला कदम केंद्र सरकार की भूमिका पर निर्भर करेगा, क्योंकि अंतरराज्यीय नदी जल विवादों में केंद्र और केंद्रीय जल आयोग की निगरानी अहम होती है। तब तक राजस्थान का रुख साफ है: बातचीत हां, रॉयल्टी नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पंजाब राजस्थान से कितनी रॉयल्टी मांग रहा है?
भगवंत मान ने सतलज के पानी के बदले 1.44 लाख करोड़ रुपये मांगे हैं। यह मांग मार्च 2026 में भी उठी थी और अक्टूबर में पंजाब विधानसभा के विशेष सत्र में फिर दोहराई गई है।
राजस्थान ने रॉयल्टी देने से क्यों इनकार किया है?
राजस्थान का कहना है कि 1955, 1959 और 1981 के समझौतों में रॉयल्टी का कोई प्रावधान नहीं है। मंत्री सुरेश रावत ने मांग को असंवैधानिक बताया है।
1920 का समझौता क्या था?
1920 में ब्रिटिश सरकार, बीकानेर रियासत और बहावलपुर के बीच समझौता हुआ था। राजस्थान का कहना है कि उसमें कोई शुल्क ब्रिटिश सरकार को देय था, न कि पंजाब को।
क्या इस विवाद से राजस्थान का पानी रुक सकता है?
सरकार ने भरोसा दिलाया है कि पेयजल की कोई दिक्कत नहीं होगी। आपूर्ति का नियमन भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड और केंद्र सरकार की व्यवस्था के तहत होता है।
स्रोत: एबीपी लाइव, 28 अक्टूबर 2026।