पाली में काजरी के ‘जैविक अस्त्र’: ब्रह्मास्त्र-अग्न्यास्त्र से कीटों का खात्मा, 150 किसानों ने छोड़ा केमिकल

पाली के खेतों में इन दिनों एक नई तरह की जंग छिड़ी है — और इस जंग के हथियार हैं ‘ब्रह्मास्त्र’, ‘अग्न्यास्त्र’, ‘नीमास्त्र’ और ‘दसपर्णी अर्क’। नाम सुनकर लगेगा जैसे किसी पौराणिक युद्ध की तैयारी हो रही है, लेकिन असलियत ये है कि ये चारों हथियार कीटों और बीमारियों के खिलाफ हैं। काजरी जैविक अस्त्र के नाम से मशहूर हो रही यह तकनीक पाली के किसानों को रासायनिक कीटनाशकों से आजादी दिला रही है — और सबसे बड़ी बात, इसकी लागत लगभग शून्य है। अब तक 100 से 150 किसान इन अस्त्रों को अपने खेतों में उतार चुके हैं, और 20 से ज्यादा प्रगतिशील किसान तो रासायनिक खेती को पूरी तरह अलविदा कहकर 100 प्रतिशत जैविक खेती अपना चुके हैं।

पाली स्थित काजरी (CAZRI) के कृषि विज्ञान केंद्र ने यह पहल शुरू की है। पौधा संरक्षण विशेषज्ञ अरविंद सिंह तेतरवाल के मुताबिक, किसानों को घर पर प्राकृतिक सामग्री से कीटनाशक बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही है।

काजरी जैविक अस्त्र: 20 किसानों ने केमिकल को कहा पूरी तरह अलविदा

इस कहानी का सबसे अहम चेहरा हैं वो 20 से ज्यादा प्रगतिशील किसान, जिन्होंने आधी-अधूरी कोशिश नहीं की — उन्होंने रासायनिक खेती को एक ही झटके में छोड़ दिया। आज उनकी पूरी जमीन पर सिर्फ जैविक अस्त्रों से फसल की रक्षा होती है। आसपास के किसान जब इनके खेतों में हरी-भरी फसल और मोटी ताजी सब्जियां देखते हैं, तो खुद भी पूछने लगते हैं — “ये क्या डाला खेत में?”

जवाब सुनकर हैरानी होती है: कुछ नहीं, या कहें तो सब कुछ घर का ही। नीम की पत्तियां, गोमूत्र, गोबर, धतूरा, पपीते-अमरूद के पत्ते, तीखी हरी मिर्च, लहसुन, तंबाकू — ये सारी चीजें किसान के घर-आंगन या खेत के किनारे मिल जाती हैं। जो चीजें पहले बेकार समझी जाती थीं, वही अब फसल की रक्षक बन गई हैं।

विशेषज्ञों की सलाह है कि किसान शुरुआत में 2 से 5 बीघा जमीन से इस तकनीक को आजमाएं। छोटा टुकड़ा, छोटा जोखिम — नतीजा दिखते ही पूरा खेत अपने आप जैविक हो जाएगा।

चारों जैविक अस्त्र: कौन कीट पर क्या करता है — पूरी तालिका

हर अस्त्र का अपना मोर्चा है। किस कीट पर कौन सा अस्त्र चलाना है, ये समझना ही आधी जीत है:

जैविक अस्त्रतैयार करने की मुख्य सामग्रीकिन कीटों/रोगों पर असर
नीमास्त्रनीम की ताजी पत्तियां, गोमूत्र और गोबर का मिश्रणरस चूसने वाले कीट — माहू (एफिड), हरा तेला, थ्रिप्स
ब्रह्मास्त्रनीम, धतूरा, पपीता और अमरूद के पत्ते उबालकरबड़ी सुंडी, इल्लियां, फल व तना छेदक कीट
अग्न्यास्त्रतंबाकू, तीखी हरी मिर्च, लहसुन और नीम का तेज मिश्रणफसल चट करने वाली जिद्दी इल्लियां
दसपर्णी अर्कनीम, धतूरा, बेलपत्र, आकड़ा, करंज, अरंडी समेत 10 औषधीय पौधों की पत्तियांफंगल इन्फेक्शन और फफूंद से रक्षा

नामों में ‘अस्त्र’ शब्द यूं ही नहीं है — हर मिश्रण किसी न किसी कीट-वर्ग पर सीधा और तेज असर करता है। अग्न्यास्त्र तो नाम के मुताबिक ही है: तंबाकू, तीखी मिर्च और लहसुन का इतना तेज मिश्रण कि जिद्दी से जिद्दी इल्ली भी खेत छोड़कर भागे।

घर पर तैयार होते हैं काजरी जैविक अस्त्र: खेत की छोटी प्रयोगशाला

इन अस्त्रों को बनाने के लिए न तो फैक्ट्री चाहिए, न महंगी मशीन। किसान के घर का आंगन ही प्रयोगशाला है। पत्तियों को उबालना, गोमूत्र-गोबर के साथ घोलना, धूप में रखना — एक बार ट्रेनिंग लेने के बाद कोई भी किसान खुद बना सकता है।

काजरी पाली के कृषि विज्ञान केंद्र में किसानों को सिखाया जाता है: कौन सी पत्ती कितनी मात्रा में, कितनी देर उबालनी है और छिड़काव का सही समय क्या है। छिड़काव सुबह या शाम को करने की सलाह दी जाती है, जब धूप तेज न हो — ताकि मिश्रण पत्तियों पर टिके।

रासायनिक कीटनाशक की एक बोतल के दाम में किसान कई बीघा खेत का जैविक घोल तैयार कर सकता है। सामग्री घर की, मेहनत अपनी — दुकान से कुछ खरीदने की जरूरत ही नहीं।

2 से 5 बीघा से शुरुआत: ट्रेनिंग कैसे और कहां मिलेगी

काजरी पाली का कृषि विज्ञान केंद्र नियमित रूप से प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाता है। अब तक सैकड़ों किसान इन शिविरों में हिस्सा ले चुके हैं। ट्रेनिंग में घोल बनाना ही नहीं, कीट पहचानना, फसल की निगरानी और सही समय पर छिड़काव — पूरे चक्र की जानकारी दी जाती है।

राजस्थान में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार भी पहल कर रही है — जैविक और प्राकृतिक खेती सिखाने के लिए किसान ब्रांड एम्बेसेडर तक नियुक्त किए गए हैं। नवाचार करने वाले किसानों को आत्मा योजना के तहत पुरस्कार भी मिल रहे हैं, जिससे प्रगतिशील किसानों का हौसला बढ़ा है।

मिट्टी से थाली तक: जब रसायन का चक्र टूटता है

इस पहल की जड़ में एक गंभीर चिंता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, रासायनिक उर्वरकों और जहरीले कीटनाशकों के लगातार इस्तेमाल से खेतों की उपजाऊ मिट्टी की ताकत घट रही है। मिट्टी कमजोर होती है तो फसल कमजोर होती है, कीट ज्यादा लगते हैं — और फिर और ज्यादा रसायन। इस दुष्चक्र में किसान की जेब और सेहत दोनों पिसती हैं।

रसायनों का असर सिर्फ खेत तक सीमित नहीं रहता। जो सब्जी और अनाज हम थाली में परोसते हैं, उनमें इन जहरीले अवशेषों के पहुंचने का खतरा बना रहता है। जैविक अस्त्रों से उगी फसल में यह खतरा नहीं — इसीलिए पाली के किसान ‘केमिकल-फ्री शुद्ध सब्जियां’ उगाकर बाजार में अच्छी कीमत भी पा रहे हैं।

मिट्टी की सेहत की जांच कराने वाले किसानों की संख्या प्रदेश में बढ़ रही है — और जैविक खेती अपनाने वालों की मिट्टी की रिपोर्ट में सुधार इस बदलाव की सबसे ठोस गवाही है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न 1: काजरी जैविक अस्त्र आखिर हैं क्या?
उत्तर: ये घर पर प्राकृतिक सामग्री — नीम, धतूरा, गोमूत्र, गोबर, मिर्च, लहसुन, तंबाकू और औषधीय पौधों की पत्तियों — से तैयार जैविक कीटनाशक हैं। पाली के काजरी कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों को इन्हें बनाने की ट्रेनिंग दी है। चार मुख्य अस्त्र हैं: नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, अग्न्यास्त्र और दसपर्णी अर्क।

प्रश्न 2: क्या ये अस्त्र रासायनिक कीटनाशकों जितने असरदार हैं?
उत्तर: पाली के 100-150 किसानों का अनुभव कहता है कि सही पहचान और सही समय पर छिड़काव से ये कीटों पर प्रभावी नियंत्रण देते हैं। 20 से ज्यादा किसान तो पूरी तरह रासायनिक खेती छोड़कर सिर्फ इन्हीं पर निर्भर हैं।

प्रश्न 3: इन अस्त्रों को बनाने की ट्रेनिंग कहां मिलेगी?
उत्तर: पाली स्थित काजरी के कृषि विज्ञान केंद्र में नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम चलते हैं। वहां घोल बनाने की विधि, कीट पहचान और छिड़काव के सही तरीके की पूरी जानकारी दी जाती है।

प्रश्न 4: शुरुआत में कितनी जमीन पर यह तकनीक आजमानी चाहिए?
उत्तर: पहले 2 से 5 बीघा जमीन से शुरुआत करें। एक सीजन में नतीजा दिखने पर धीरे-धीरे पूरे खेत पर अपनाएं — जोखिम कम, भरोसा ज्यादा।

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