जयपुर हवेली संकट: 45,000 संपत्तियां मैप होने के बाद भी परकोटा क्यों ढह रहा है

जयपुर हवेली संकट की सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं है कि परकोटे की हवेलियां पुरानी हो गई हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि उनकी पूरी तस्वीर कागज पर मौजूद है, फिर भी छतें गिर रही हैं और मालिक-किरायेदार के झगड़े में मरम्मत अटकी है। अक्टूबर 2026 के अंत तक जयपुर का हेरिटेज मैनेजमेंट प्लान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के जरिए यूनेस्को को भेजने की तैयारी है, और यही वह मौका है जब यह सवाल सबसे ज्यादा मायने रखता है कि नक्शे पर दर्ज हवेली को जमीन पर बचाया कैसे जाए।

जयपुर हवेली संकट: अक्टूबर के अंत तक क्या जमा होना है

ईटीवी भारत की 26 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, जयपुर का हेरिटेज मैनेजमेंट प्लान सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के माध्यम से यूनेस्को को भेजा जाना है। इसका लक्ष्य अक्टूबर के अंत तक का रखा गया है। यह योजना चरणों में कार्रवाई का प्रस्ताव रखती है, जिसमें प्रशासनिक और कानूनी दिक्कतों के साथ-साथ निवासियों की व्यावहारिक परेशानियों को भी जगह दी गई है। जीआईएस आधारित दस्तावेज नगर निगम के हेरिटेज सेल के पास उपलब्ध है और उसी को इस योजना का आधार बनाया गया है।

इसका सीधा मतलब यह है कि अब बहस इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि परकोटे में क्या-क्या है। वह काम काफी हद तक हो चुका है। अब बहस इस बात पर होनी चाहिए कि जिस हवेली की दीवार कमजोर है, उसकी मरम्मत का पैसा कौन देगा और काम कब शुरू होगा।

आंकड़ों में परकोटा: क्या दर्ज है और क्या नहीं

विषय आंकड़ा संदर्भ
परकोटे में जीआईएस मैपिंग लगभग 45,000 संपत्तियां 2022-2024 का सर्वे, 6.74 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र
ड्रोन सर्वे में बदलाव/उल्लंघन 700 से ज्यादा संपत्तियां 2020 का सर्वे, रंग, झरोखे और अग्रभाग से जुड़े बदलाव
वास्तु या ऐतिहासिक महत्व वाली संरचनाएं 1,000 से ज्यादा उसी दस्तावेजीकरण से पहचानी गईं
यूनेस्को विश्व धरोहर दर्जा जुलाई 2019, बाकू बैठक 2018 में तैयार डोजियर के बाद
ऐतिहासिक हवेलियों का नुकसान लगभग 33 प्रतिशत महापौर के हवाले से ईटीवी भारत की श्रृंखला का दूसरा भाग

यहां एक गलतफहमी साफ करना जरूरी है। 45,000 का आंकड़ा असुरक्षित इमारतों की गिनती नहीं है, बल्कि उन संपत्तियों की गिनती है जिनकी तस्वीर, निर्माण काल और महत्व दर्ज है। एक अलग रिपोर्ट में 122 संरचनाओं के असुरक्षित चिह्नित होने का उल्लेख है, लेकिन वह संख्या इस मैपिंग से अलग है।

मैपिंग से मरम्मत तक का फासला क्यों है

नगर निगम के सलाहकार और नगर नियोजन विशेषज्ञ आर. के. विजयवर्गिया के अनुसार, सबसे कठिन मामले वे हैं जहां मालिक अब अपनी हवेली में नहीं रहता और उसे उससे कोई नियमित आमदनी भी नहीं होती। ऐसे मालिक के लिए संरक्षण पर पैसा खर्च करना प्राथमिकता नहीं रह जाता। दूसरी तरफ, जहां मालिक और किरायेदार के बीच विवाद चल रहा है, वहां भी मरम्मत रुक जाती है, क्योंकि कोई भी पक्ष पहले कदम उठाने को तैयार नहीं होता।

यातायात और पार्किंग का दबाव भी इस समस्या का हिस्सा है। जब परकोटे की संकरी गलियों में आना-जाना मुश्किल हो जाता है, तो कुछ परिवार आसपास के इलाकों में चले जाते हैं। खाली पड़ा मकान तेजी से खराब होता है, और यही चक्र हवेली को धीरे-धीरे खंडहर में बदल देता है।

जयपुर हवेली संकट से बचाव: हवेली को आमदनी से जोड़ना

इस समस्या का एक व्यावहारिक जवाब एडेप्टिव रीयूज में तलाशा जा रहा है, यानी हवेली का मूल चरित्र बिगाड़े बिना उसे नए काम में लाना। भवन उपविधियों में होमस्टे, हेरिटेज गेस्ट हाउस, खानपान प्रतिष्ठान और रेस्तरां जैसे उपयोगों का विकल्प मौजूद है। जरूरत के हिसाब से सार्वजनिक उपयोग और पार्किंग से जुड़े उपयोगों पर भी विचार किया जा सकता है। विजयवर्गिया के शब्दों में, मकसद इमारत को साबुत रखते हुए उसके मालिक को आमदनी देना है।

इसके साथ ही निगरानी भी अहम है। प्रवर्तन दलों और जोनल उपायुक्तों को नियमित निरीक्षण और धरोहर उल्लंघनों पर कार्रवाई का निर्देश दिया गया है। अगर मरम्मत संभव है तो संरक्षण में देर नहीं होनी चाहिए, और अगर कोई इमारत जान के लिए गंभीर खतरा बन गई है तो उसे गिराना ही आखिरी विकल्प होगा, जिसमें मूल स्वरूप के अनुसार दोबारा बनाने की कोशिश रहती है।

300 साल का शहर और 2019 का विश्व धरोहर दर्जा

जयपुर करीब 300 साल पुराना शहर है, और उसके परकोटे की पहचान सिर्फ इमारतों से नहीं बनती। विजयवर्गिया ने धरोहर के तीन जुड़े हुए पहलू बताए हैं: व्यापार और वाणिज्य, वास्तुकला और नगर नियोजन, तथा कला और संस्कृति। किसी हवेली को बचाने का मतलब सिर्फ उसकी दीवार बचाना नहीं है, बल्कि उससे जुड़े कारीगर, व्यापारी और परिवारों की जीवनशैली को भी समझना है।

विश्व धरोहर की मान्यता के लिए 2018 में डोजियर तैयार किया गया था, विशेषज्ञों ने शहर का निरीक्षण किया और जुलाई 2019 में बाकू में जयपुर को दर्जा मिला। उसके बाद 2020 में ड्रोन सर्वे में 700 से ज्यादा संपत्तियों में बदलाव या उल्लंघन पाए गए, नोटिस भी जारी हुए, लेकिन बहाल करने की दिशा में बहुत कुछ जमीन पर नहीं उतरा।

परकोटे में रहने वालों के लिए व्यावहारिक बातें

अगर आप परकोटे में रहते हैं, तो बिना जानकारी के रंग, झरोखा या अग्रभाग में बदलाव करना उल्लंघन हो सकता है। कोई बड़ा बदलाव करने से पहले नगर निगम के हेरिटेज सेल या अपने जोन के उपायुक्त कार्यालय से स्थिति पूछ लें। दरार, सीलन या छत की कमजोरी दिखे तो उसे टालें नहीं, और मालिक-किरायेदार विवाद हो तो मरम्मत की जिम्मेदारी पर लिखित सहमति पहले बनाएं।

पर्यटकों के लिए भी यह कहानी अहम है, क्योंकि हेरिटेज वॉक की पहचान इसी दस्तावेजीकरण से हुई है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या जयपुर की 45,000 संपत्तियां असुरक्षित घोषित हो गई हैं?

नहीं। 45,000 संपत्तियों की जीआईएस मैपिंग हुई है, जिसमें उनकी तस्वीर, इतिहास और महत्व दर्ज है। यह असुरक्षित इमारतों की सूची नहीं है।

जयपुर को विश्व धरोहर का दर्जा कब मिला था?

जुलाई 2019 में, बाकू में हुई यूनेस्को की बैठक में। इससे पहले 2018 में डोजियर तैयार किया गया था और विशेषज्ञों ने शहर का निरीक्षण किया था।

हेरिटेज मैनेजमेंट प्लान कब तक यूनेस्को को भेजा जाना है?

रिपोर्ट के अनुसार, सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के जरिए इसे अक्टूबर 2026 के अंत तक भेजने का लक्ष्य है।

हवेली मालिक मरम्मत का खर्च कैसे उठा सकते हैं?

एडेप्टिव रीयूज एक विकल्प है, जिसमें होमस्टे, हेरिटेज गेस्ट हाउस या खानपान जैसे उपयोग से इमारत को आमदनी मिल सकती है, बशर्ते उसका मूल चरित्र न बिगड़े।

इस कहानी की मूल जानकारी ईटीवी भारत की रिपोर्ट में उपलब्ध है। जयपुर की धरोहर से जुड़ी पुरानी खबरों के लिए जयपुर यूनेस्को हेरिटेज चेतावनी और सुमेरपुर ईको टूरिज्म भी पढ़ें।

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