उदयपुर में रहने वालों के लिए एक राहत भरी खबर सामने आई है। उदयपुर देवास प्रोजेक्ट के तीसरे और चौथे चरण का काम अब तेज रफ्तार से चल रहा है। दोनों चरण पूरे होने के बाद शहर को हर साल करीब 1000 MCFT (मिलियन क्यूबिक फीट) अतिरिक्त पानी मिलने लगेगा। इसका सीधा फायदा शहर की पेयजल आपूर्ति को मिलेगा और पिछोला व फतहसागर जैसी झीलों में पानी का स्तर भी बना रहेगा।
झीलों के इस शहर में कमजोर मानसून और बढ़ती आबादी ने पानी की चिंता बढ़ा दी है — दो नए बांध और दो लंबी सुरंगों वाली यह परियोजना शहर की लंबी जल सुरक्षा की नींव मानी जा रही है।
उदयपुर देवास प्रोजेक्ट: दो चरणों के काम का पूरा ब्योरा
परियोजना के तहत दो अलग-अलग जगहों पर बांध बन रहे हैं, और दोनों को सुरंगों के जरिए आपस में जोड़ा जा रहा है। एक नजर पूरे हिसाब पर:
| विवरण | देवास-चतुर्थ (चरण 4) | देवास-तृतीय (चरण 3) |
|---|---|---|
| स्थान | अंबावा गांव, गोगुंदा तहसील | नाथियाथल गांव के पास |
| बांध की क्षमता | 390 MCFT | 703 MCFT |
| टनल की लंबाई | 4.15 किलोमीटर | 10.50 किलोमीटर |
| पानी कहां जाएगा | देवास-तृतीय बांध की ओर | देवास-द्वितीय (आकोदड़ा बांध) तक |
दोनों टनल मिलाकर कुल 14.65 किलोमीटर लंबी सुरंगें बनाई जा रही हैं। देवास-चतुर्थ का पानी पहले देवास-तृतीय बांध तक पहुंचेगा, और वहां से लंबी टनल के जरिए यह पानी मौजूदा देवास-द्वितीय यानी आकोदड़ा बांध तक लाया जाएगा। जरूरत के हिसाब से फिर यह पानी पिछोला झील में छोड़ा जाएगा।
पानी का सफर: साबरमती बेसिन से बनास बेसिन तक
उदयपुर देवास प्रोजेक्ट की सबसे खास बात यह है कि यह एक अंतर-बेसिन जल हस्तांतरण परियोजना है। सरल शब्दों में समझें तो साबरमती बेसिन का वह पानी, जो आमतौर पर बहकर अरब सागर में चला जाता था, उसे अब बनास बेसिन की ओर मोड़कर उदयपुर की जल व्यवस्था से जोड़ा जा रहा है।
यानी जो पानी पहले बेकार बह जाता था, वही अब पहाड़ों को चीरकर बनाई गई सुरंगों से होता हुआ उदयपुर के घरों और झीलों तक पहुंचेगा। बांधों-टनलों का यह नेटवर्क परियोजना के चरणों को आपस में जोड़ता है, ताकि जल संसाधनों का असरदार इस्तेमाल हो सके।
उदयपुर देवास प्रोजेक्ट आखिर क्यों जरूरी है
पानी की जरूरत और उपलब्धता के बीच का अंतर ही इस परियोजना की सबसे बड़ी वजह है। जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के अनुमान के मुताबिक 2031 तक उदयपुर की आबादी करीब 8.75 लाख तक पहुंच जाएगी। इतनी आबादी को हर साल लगभग 2397 MCFT पानी चाहिए होगा, जबकि अभी शहर के पास सिर्फ 1738 MCFT पानी ही उपलब्ध है।
यह अंतर आने वाले सालों में और बढ़ेगा — अनुमान है कि 2036 तक पानी की मांग 2613 MCFT तक पहुंच जाएगी। यानी अगर नए स्रोत नहीं जोड़े गए तो शहर को हर साल सैकड़ों MCFT पानी की कमी झेलनी पड़ेगी। देवास परियोजना के चरण-3 और 4 से मिलने वाला 1000 MCFT पानी इसी कमी को भरने में बड़ी भूमिका निभाएगा।
यही वजह है कि राज्य सरकार इस परियोजना को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में प्राथमिकता से आगे बढ़ा रही है। निर्माण कार्यों में तेजी लाने के साथ-साथ परियोजना से जुड़े प्रशासनिक काम भी निपटाए जा रहे हैं।
पिछोला-फतहसागर झीलों और पर्यटन को क्या फायदा होगा
उदयपुर की पहचान उसकी झीलों से है। पिछोला और फतहसागर झीलें न सिर्फ शहर की खूबसूरती हैं, बल्कि पर्यटन अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी हैं। गर्मियों में जब इन झीलों का जल स्तर गिरता है, तो इसका असर सीधे नावों, होटलों और पर्यटन से जुड़े हजारों रोजगारों पर पड़ता है।
उदयपुर देवास प्रोजेक्ट पूरी होने के बाद इन दोनों झीलों में सालभर जल स्तर बनाए रखने में मदद मिलेगी। इससे झीलों पर निर्भर पर्यटन और इको-टूरिज्म से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा। पानी की कमी से जूझते श्रीडूंगरगढ़ जैसे इलाकों के उलट, उदयपुर के लिए यह परियोजना भविष्य की प्यास बुझाने का स्थायी इंतजाम साबित हो सकती है।
लागत, समय-सीमा और प्रभावित परिवारों का पुनर्वास
रिपोर्टों के मुताबिक उदयपुर देवास प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब 1691 करोड़ रुपये है और इसे जून 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि असली फायदा निर्माण पूरा होने, पानी की उपलब्धता और परियोजना के संचालन पर निर्भर करेगा — यह बात खुद परियोजना से जुड़ी रिपोर्टों में साफ कही गई है।
राज्य सरकार के निर्देशों पर परियोजना से प्रभावित परिवारों को नजदीकी इलाकों में आवासीय भूखंड और बुनियादी सुविधाएं दी जा रही हैं, ताकि उनका सुरक्षित और सम्मानजनक पुनर्वास हो सके।
जयपुर में बीसलपुर सिस्टम से पेयजल व्यवस्था को लेकर चल रही चिंताओं के बीच उदयपुर का यह मॉडल दिखाता है कि लंबे समय की जल सुरक्षा के लिए बांधों और टनलों का नेटवर्क कितना अहम है। सिंचाई के पानी को लेकर अनूपगढ़ में किसानों के आंदोलन जैसी घटनाएं भी बताती हैं कि पानी का हर बूंद बचाना अब राज्य की प्राथमिकता बन चुका है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सवाल: MCFT का क्या मतलब है?
जवाब: MCFT यानी मिलियन क्यूबिक फीट — पानी की मात्रा नापने की इकाई। 1000 MCFT पानी लाखों लोगों की सालभर की पेयजल जरूरत में बड़ा योगदान दे सकता है।
सवाल: उदयपुर देवास प्रोजेक्ट के चरण-3 और 4 कब तक पूरे होंगे?
जवाब: रिपोर्टों के अनुसार उदयपुर देवास प्रोजेक्ट को जून 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य है। फिलहाल दोनों चरणों में बांध और टनल का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है।
सवाल: क्या परियोजना पूरी होने के बाद उदयपुर में रोज पानी मिलेगा?
जवाब: परियोजना का उद्देश्य शहर की बढ़ती पेयजल जरूरत को पूरा करना और झीलों का जल स्तर बनाए रखना है। रिपोर्टों के मुताबिक इससे शहरवासियों को नियमित पेयजल आपूर्ति में मदद मिलेगी, लेकिन अंतिम लाभ निर्माण और संचालन पर निर्भर करेगा।
सवाल: देवास परियोजना के पहले के चरणों का क्या हुआ?
जवाब: उदयपुर देवास प्रोजेक्ट के पहले चरणों में भी बांध और जल हस्तांतरण की व्यवस्था विकसित की गई थी। मौजूदा देवास-द्वितीय (आकोदड़ा बांध) उसी कड़ी का हिस्सा है, जिससे अब नए चरणों का पानी जोड़ा जा रहा है।
आगे क्या
उदयपुर देवास प्रोजेक्ट के तीसरे और चौथे चरण का काम जिस रफ्तार से चल रहा है, उससे उम्मीद है कि तय समय में शहर की जल व्यवस्था को मजबूत सहारा मिल जाएगा। बढ़ती आबादी और पेयजल जरूरतों को देखते हुए यह बुनियादी ढांचा आने वाले दशकों तक काम आएगा। अब नजर इस पर है कि निर्माण तय समय-सीमा में पूरा होता है या नहीं — उदयपुर की प्यास का स्थायी इलाज इसी परियोजना में छिपा है।
स्रोत: News18 हिंदी