देवली लाइट टेंडर विवाद: 5.72 लाख का काम 48 लाख में?

टोंक जिले के देवली शहर में सड़कों की लाइटों की मरम्मत का एक ठेका अचानक बड़ी बहस बन गया है। वजह एक चौंकाने वाला आंकड़ा है — वही काम जो अब तक सालाना करीब 5 लाख 72 हजार रुपये में हो रहा था, अब करीब 48 लाख रुपये में कराने का प्रस्ताव है। फर्क करीब 42 लाख 28 हजार रुपये का है, यानी पुरानी लागत का आठ गुना से ज्यादा। यही देवली लाइट टेंडर विवाद की जड़ है, और इसे उठाने वाले कोई विपक्षी नेता नहीं, बल्कि नगर पालिका के अपने उपाध्यक्ष नेमीचंद जैन हैं, जिन्होंने अपनी ही पार्टी की पालिकाध्यक्ष कजोड़ी देवी पर गंभीर आरोप लगाते हुए बुधवार को पत्रकार वार्ता में मामला सार्वजनिक कर दिया।

यह विवाद तब आया है जब देवली नगर पालिका का नया बोर्ड बने महज सवा महीना हुआ है। पहली बैठक में ही इस टेंडर पर तकरार हो चुकी थी, और अब उपाध्यक्ष के खुलासे ने भाजपा के अंदर की खींचतान को खुलकर सामने ला दिया है। बड़ा सवाल यही है कि जनता के पैसे से होने वाले काम की कीमत अचानक इतनी कैसे बढ़ी, और निरस्त प्रस्ताव दोबारा मेज पर कैसे आया।

देवली लाइट टेंडर विवाद: आंकड़ों में समझिए पूरा फर्क

जैन के अनुसार मौजूदा लाइट रिपेयर ठेका 1 अप्रैल 2026 से मार्च 2027 तक 47,700 रुपये प्रतिमाह की दर से दिया गया है — सालाना करीब 5 लाख 72 हजार रुपये। इसके मुकाबले नए टेंडर की दर 4 लाख रुपये प्रतिमाह, यानी सालाना करीब 48 लाख रुपये बताई जा रही है।

बिंदु पुराना ठेका नया टेंडर प्रस्ताव
अवधि अप्रैल 2026 – मार्च 2027 आगामी वार्षिक ठेका
मासिक दर 47,700 रुपये 4,00,000 रुपये
सालाना लागत करीब 5.72 लाख रुपये करीब 48 लाख रुपये
अतिरिक्त बोझ — करीब 42.28 लाख रुपये
कवरेज देवली के 35 वार्डों की लाइट मरम्मत 35 वार्ड, पर नई लाइट/पोल/तार नहीं

जैन का तर्क सीधा है — काम वही, वार्ड वही, दायरा वही, तो कीमत आठ गुना से ज्यादा क्यों? बढ़ी रकम का बोझ नगर पालिका के खजाने पर पड़ेगा, और आखिर में यह पैसा जनता का ही है।

देवली लाइट टेंडर विवाद में उपाध्यक्ष के तीन बड़े आरोप

पहला आरोप टेंडर की शर्तों को लेकर है। जैन के अनुसार नए टेंडर को सही ठहराने के लिए उसमें यह शर्त जोड़ी गई है कि रिपेयर का सामान, जैसे बल्ब, अब ठेकेदार देगा। वे इस तर्क को खारिज करते हैं — लाइटों में मुख्य रूप से बल्ब ही लगता है, जिस पर कंपनी की ओर से पहले से दो साल की वारंटी मिलती है। सिर्फ सामान की शर्त पर कीमत कई गुना बढ़ाना समझ से परे है।

दूसरा आरोप काम के दायरे को लेकर है। जैन के अनुसार नए टेंडर में ठेकेदार 35 वार्डों में न नई रोड लाइट लगाएगा, न नया पोल खड़ा करेगा और न नई तार बिछाएगा — नई लाइटें नगर पालिका अपने फंड से खरीदकर देती है। उनका सवाल है — जब सिर्फ पुरानी लाइटों की मरम्मत होनी है, तो 48 लाख रुपये किस काम के?

तीसरा और सबसे गंभीर आरोप प्रक्रिया को लेकर है। जैन का कहना है कि पूर्व बैठक में सभी पार्षदों ने भारी वित्तीय नुकसान को देखते हुए इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से निरस्त कर दिया था। लेकिन आरोप है कि अगले ही दिन से इसे बहाल करने के लिए पार्षदों के घरों पर जाकर दबाव बनाया जा रहा है और हस्ताक्षर करवाए जा रहे हैं।

नए बोर्ड की पहली बैठक में ही दिख गई थी तकरार

यह विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ। नवगठित बोर्ड की पहली बैठक में ही इस मुद्दे पर तीखी बहस हुई थी। वरिष्ठ पार्षद भीमराज जैन ने भी सवाल उठाया था कि जब मरम्मत करीब 12 लाख रुपये सालाना में हो सकती है, तो पालिका 47 लाख का खर्च किस आधार पर करेगी। उपाध्यक्ष ने ठेके को निरस्त करने का प्रस्ताव रखा था, और सत्ता पक्ष के कई पार्षदों ने भी सहमति जताई थी। गौरतलब है कि अब तक उपलब्ध रिपोर्टों में पालिकाध्यक्ष कजोड़ी देवी का पक्ष सामने नहीं आया है।

देवली लाइट टेंडर विवाद का जनता पर असर

नगर पालिका का बजट सीमित होता है — हर अतिरिक्त खर्च का मतलब है किसी दूसरे काम के लिए कम पैसा। अगर 48 लाख का टेंडर लागू होता है, तो मरम्मत मद में करीब 42 लाख रुपये अतिरिक्त खर्च होंगे, जिनसे सड़कों की मरम्मत, सफाई या पेयजल के कई काम हो सकते थे। इसलिए यह विवाद सिर्फ पार्षदों की लड़ाई नहीं, बल्कि हर परिवार से जुड़ा मुद्दा है।

दूसरी ओर, स्ट्रीट लाइटें शहर की सुरक्षा से सीधे जुड़ी हैं — खराब लाइटों वाली गलियां रात में असुरक्षित हो जाती हैं, खासकर महिलाओं और बुजुर्गों के लिए। मरम्मत रुकना भी ठीक नहीं और महंगे दाम पर होना भी ठीक नहीं। सही रास्ता दरों की खुली जांच और वारंटी जैसी शर्तों का कागजी सत्यापन है। देवली हाल ही में तीन नए स्टेडियमों को 2.5 करोड़ की मंजूरी और आरजीएचएस दवाई संकट को लेकर भी चर्चा में रहा है; टोंक के हालिया विवादों के बाद यह टेंडर विवाद जिले की सियासत में नया अध्याय जोड़ रहा है।

आगे क्या: जांच, बोर्ड का फैसला और सियासी असर

अब तीन रास्ते दिख रहे हैं — बोर्ड दोबारा चर्चा करके टेंडर को निरस्त रखे या संशोधित दरों के साथ आगे बढ़ाए; जिला प्रशासन या स्वायत्त शासन विभाग से प्रक्रिया और दरों की जांच हो; और भाजपा संगठन के अंदर इस टकराव को सुलझाया जाए, क्योंकि पंचायत चुनाव के दौर में खुला विवाद पार्टी के लिए असहज है। फिलहाल गेंद बोर्ड के पाले में है — रोक लगी या दरें घटीं तो यह जनता के पैसे की बचत होगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

देवली लाइट टेंडर विवाद क्या है?
स्ट्रीट लाइट मरम्मत के नए टेंडर की कीमत को लेकर विवाद है। उपाध्यक्ष नेमीचंद जैन का आरोप है कि 5.72 लाख रुपये सालाना वाला काम 48 लाख रुपये में कराने का प्रस्ताव है, जो पालिका पर करीब 42.28 लाख रुपये का अतिरिक्त बोझ डालेगा।

पुराने और नए टेंडर की दर में कितना फर्क है?
पुराना ठेका 47,700 रुपये प्रतिमाह (सालाना 5.72 लाख रुपये) और नया टेंडर 4 लाख रुपये प्रतिमाह (सालाना 48 लाख रुपये) का है — फर्क करीब 42.28 लाख रुपये सालाना का है।

सबसे गंभीर आरोप क्या है?
उपाध्यक्ष का आरोप है कि सर्वसम्मति से निरस्त टेंडर प्रस्ताव को अगले ही दिन से पार्षदों के घरों पर जाकर दबाव बनाकर और हस्ताक्षर करवाकर बहाल करने की कोशिश हो रही है।

पालिकाध्यक्ष का पक्ष क्या है?
अब तक उपलब्ध रिपोर्टों में पालिकाध्यक्ष कजोड़ी देवी की ओर से इन आरोपों पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

स्रोत: नवभारत टाइम्स की 28 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट (पूरी खबर पढ़ें) और स्थानीय रिपोर्टें। सभी आरोप उपाध्यक्ष के बयानों पर आधारित हैं।

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