दस साल से लटकी एक भर्ती का भविष्य अब आखिरकार साफ दिशा में बढ़ चला है — और सबसे राहत भरी बात यह है कि इस फैसले से पहले से नौकरी कर रहे किसी भी उप निरीक्षक की कुर्सी पर आंच नहीं आएगी। राजस्थान हाईकोर्ट ने एसआई भर्ती 2016 मेरिट सूची को नए सिरे से बनाने का आदेश दिया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ऊपर नहीं जा सकती, और इसी सिद्धांत पर पदों की गिनती दोबारा होगी। सरकार और राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) को पूरी प्रक्रिया 180 दिन के भीतर पूरी करनी है। यानी अगले छह महीनों में इस भर्ती की तस्वीर बदलनी तय है — लेकिन बिना किसी की नौकरी छीने।
यह आदेश उन हजारों अभ्यर्थियों के लिए मायने रखता है जो 2016 से इस भर्ती के अलग-अलग पड़ावों से गुजरे हैं — कुछ नौकरी पा चुके हैं, कुछ मेरिट से बाहर रह गए थे, और कुछ ने आरक्षण की गणना को अदालत में चुनौती दी थी। अब अदालत ने बीच का रास्ता निकाला है: गणना सुधरेगी, मेरिट सूची बदलेगी, लेकिन पहले से नियुक्त लोग सुरक्षित रहेंगे।
एसआई भर्ती 2016 मेरिट सूची पर कोर्ट का आदेश
जयपुर पीठ में जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने श्याम सिंह और अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। मुख्य याचिका आकाश भारद्वाज बनाम राजस्थान राज्य सहित कुल 11 जुड़ी याचिकाओं का निस्तारण इसी आदेश से हुआ। अदालत के निर्देशों का सार कुछ इस तरह है:
पहला, राज्य सरकार और RPSC पदों की श्रेणीवार गणना नए सिरे से करें। इसमें 50 प्रतिशत आरक्षण की सामान्य सीमा का कड़ाई से पालन होगा। दूसरा, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की बैकलॉग रिक्तियों के नियमों का भी ध्यान रखा जाएगा। तीसरा, पहले से नियुक्त किसी भी अभ्यर्थी को हटाया नहीं जाएगा, भले ही संशोधित गणना में उसकी श्रेणी का पद न बन रहा हो। चौथा, सामान्य और अनारक्षित वर्ग के मेधावी अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा के लिए सरकार जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त (अधिसंख्य) पद भी सृजित कर सकेगी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सीधी भर्ती में सिर्फ एससी और एसटी वर्ग की बैकलॉग रिक्तियों को ही आगे बढ़ाया जा सकता है। अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की रिक्तियों को आगे बढ़ाने का सीधी भर्ती में कोई कानूनी प्रावधान नहीं है — और यही वह बिंदु था जिस पर याचिकाकर्ताओं की सबसे तीखी आपत्ति थी।
एसआई भर्ती 2016 मेरिट सूची: 180 दिन की समयसीमा
अदालत ने प्रक्रिया को दो चरणों में बांटा है, ताकि काम लटके नहीं:
| चरण | काम | समयसीमा |
|---|---|---|
| पहला चरण | 50% आरक्षण सीमा और एससी-एसटी बैकलॉग नियमों के तहत पदों की श्रेणीवार पुनर्गणना, जानकारी कार्मिक विभाग और RPSC की वेबसाइट पर सार्वजनिक | आदेश से 90 दिन के भीतर |
| दूसरा चरण | नियुक्त अभ्यर्थियों को मेरिट के आधार पर पुनः व्यवस्थित कर कैडर और वरिष्ठता प्रदान करना | इसके बाद 60 दिन के भीतर |
| कुल अवधि | पूरी प्रक्रिया का समापन | 180 दिन के भीतर |
मतलब यह कि पहले तीन महीनों में पदों की नई गणना सामने आएगी, फिर दो महीनों में कैडर-वरिष्ठता का पुनर्गठन होगा। संशोधित सूची कार्मिक विभाग और RPSC की आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक की जाएगी।
विवाद की जड़: 456 पदों में सामान्य वर्ग को सिर्फ 142
इस भर्ती का विज्ञापन RPSC ने 5 अक्टूबर 2016 को जारी किया था। बाद में 5 दिसंबर 2018 और 23 अगस्त 2019 को इसमें शुद्धि पत्र जारी हुए। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि गैर-अनुसूचित क्षेत्र के कुल 456 पदों में से सामान्य वर्ग के लिए सिर्फ 142 पद रखे गए। इससे अनारक्षित श्रेणी का अनुपात 50 प्रतिशत की सीमा से बहुत नीचे रह गया, जबकि एसआई (एपी) में आरक्षित पदों का प्रतिशत करीब 78 प्रतिशत तक पहुंच गया।
याचिका में यह भी कहा गया कि विज्ञापनों में बैकलॉग रिक्तियों का स्पष्ट आधार नहीं दिया गया था और ओबीसी की रिक्तियों को बिना उचित कानूनी प्रावधान के आगे बढ़ा दिया गया। सरकार और आयोग ने वर्षवार रिक्तियों का ब्योरा और अतिरिक्त शपथपत्र पेश कर पदों के निर्धारण को सही ठहराने की कोशिश की, लेकिन अदालत ने इन दलीलों को अपर्याप्त माना — सार्वजनिक सेवाओं में आरक्षण की सामान्य सीमा 50 प्रतिशत है और इसका कड़ाई से पालन होना ही चाहिए।
विज्ञापन से अदालत तक: दस साल का सफर
इस भर्ती की कहानी एक दशक लंबी है। 2016 में विज्ञापन आया, 2019 में लिखित परीक्षा हुई और 1 सितंबर 2020 को परिणाम घोषित हुआ। इसके बाद दिसंबर 2020 में हाईकोर्ट ने नियुक्तियों पर रोक लगा दी, जो जुलाई 2021 में हटी — और रोक हटते ही आयोग ने चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्तियां दे दीं। लेकिन आरक्षण गणना को लेकर कानूनी लड़ाई चलती रही और अब जाकर इसका निर्णायक पड़ाव आया है।
दिलचस्प बात यह है कि अदालत ने मानवीय पक्ष को भी उतनी ही गंभीरता से लिया है। संशोधित मेरिट सूची के बाद अगर कोई पहले से नियुक्त अभ्यर्थी अपनी श्रेणी में जगह नहीं बना पाता, तब भी उसकी नौकरी नहीं जाएगी — इसके लिए सरकार अधिसंख्य पद सृजित कर सकेगी। सुधार भी होगा और किसी का घर भी नहीं उजड़ेगा — यही इस फैसले की सबसे बड़ी खासियत है।
अभ्यर्थियों के लिए इसका क्या मतलब है
अगर आप इस भर्ती के अभ्यर्थी हैं, तो कुछ बातें साफ हो जानी चाहिए। पहली, कोई नई परीक्षा नहीं होगी — सिर्फ पदों की गणना और मेरिट सूची संशोधित होगी। दूसरी, पहले से सेवारत एसआई की नौकरी पूरी तरह सुरक्षित है। तीसरी, पहले मेरिट से बाहर रहे अभ्यर्थियों के लिए संशोधित सूची में जगह की संभावना खुली है। चौथी, आधिकारिक जानकारी सिर्फ कार्मिक विभाग और RPSC की वेबसाइट पर आएगी — किसी अफवाह पर भरोसा न करें।
पुलिस भर्तियों पर अदालतों के फैसले हजारों परिवारों को प्रभावित करते हैं — RPSC की एसआई भर्तियों से जुड़ी खबरें और एसआई भर्ती के पुराने विवादों पर भी नजर बनी हुई है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: क्या एसआई भर्ती 2016 की परीक्षा दोबारा होगी?
उत्तर: नहीं। अदालत ने सिर्फ पदों की श्रेणीवार पुनर्गणना और संशोधित मेरिट सूची जारी करने का आदेश दिया है, नई परीक्षा का नहीं।
प्रश्न: पहले से नियुक्त एसआई की नौकरी पर क्या असर पड़ेगा?
उत्तर: कोई असर नहीं पड़ेगा। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि 1 सितंबर 2020 के परिणाम के आधार पर नियुक्त किसी भी अभ्यर्थी को सेवा से नहीं हटाया जाएगा।
प्रश्न: संशोधित मेरिट सूची कब तक आएगी?
उत्तर: पूरी प्रक्रिया 180 दिन में पूरी करनी है — पहले 90 दिन में पदों की गणना सार्वजनिक होगी, फिर 60 दिन में कैडर-वरिष्ठता का पुनर्गठन होगा।
प्रश्न: 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा का क्या मतलब है?
उत्तर: सीधी भर्ती में आरक्षित श्रेणियों के पदों की कुल संख्या 50 प्रतिशत की सामान्य सीमा से ज्यादा नहीं हो सकती — अदालत ने इसी सिद्धांत पर गणना दोबारा करने को कहा है।