राजस्थान के किसान के खेत में अगले तीन साल में एक बड़ा बदलाव आने वाला है — और इसकी शुरुआत रसायनों के बोझ को कम करने से होगी। कृषि विभाग के मुताबिक प्रदेश में हर साल करीब 20 लाख टन यूरिया और 6-7 लाख टन डीएपी इस्तेमाल होता है। इसी बोझ को कम करने के लिए 25 अक्टूबर को आबूरोड में राजस्थान प्राकृतिक खेती समझौता हुआ, जिसके तहत प्रदेशभर में किसानों को प्राकृतिक और योगिक खेती का प्रशिक्षण मिलेगा, कृषि विभाग के 10,000 से ज्यादा कर्मी इस काम से जुड़ेंगे, और आबूरोड का तपोवन इस मुहिम का उत्कृष्टता केंद्र बनेगा। यह समझौता शुरुआती तौर पर तीन साल के लिए किया गया है, और हर साल इस बात की समीक्षा होगी कि कितने किसानों ने प्राकृतिक खेती अपनाई।
राजस्थान प्राकृतिक खेती समझौता: किसानों को सीधे क्या मिलेगा
इस समझौते का सबसे सीधा फायदा किसान के खेत से जुड़ा है। प्रदेश के अलग-अलग जिलों में किसानों के लिए प्राकृतिक और टिकाऊ खेती से जुड़े प्रशिक्षण शिविर, कार्यशालाएं, प्रदर्शनियां और जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे। इनमें किसानों को मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, स्थानीय संसाधनों से कृषि आदान तैयार करने, जल संरक्षण, जलवायु के अनुकूल तकनीकों और टिकाऊ कृषि प्रबंधन की व्यावहारिक जानकारी दी जाएगी।
सिर्फ क्लासरूम वाली पढ़ाई नहीं होगी। किसानों को सफल प्राकृतिक खेती मॉडल देखने के लिए शैक्षणिक भ्रमण और अनुभव साझा करने के कार्यक्रम भी होंगे, ताकि किसान दूसरे के खेत पर जाकर देखे कि बिना भारी रसायन के फसल कैसे ली जाती है। शुरुआती चरण में चुनी हुई जिलों में गतिविधियां शुरू होंगी, और समीक्षा के बाद कार्यक्रम का विस्तार दूसरे जिलों में किया जाएगा।
आबूरोड का तपोवन बनेगा उत्कृष्टता केंद्र
इस समझौते की सबसे चर्चित बात आबूरोड स्थित तपोवन को लेकर है। तपोवन को योगिक प्राकृतिक खेती के उत्कृष्टता केंद्र यानी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के रूप में विकसित करने पर सैद्धांतिक सहमति बनी है। यह केंद्र प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण, प्रदर्शन, अनुसंधान, ज्ञान-विनिमय और क्षमता संवर्धन की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन सकेगा।
यहां किसानों, कृषि अधिकारियों और मुख्य प्रशिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम होंगे और प्राकृतिक खेती के मॉडल का प्रदर्शन होगा। एक बात साफ रखनी जरूरी है — तपोवन केंद्र को लेकर अभी सैद्धांतिक सहमति बनी है, जो आवश्यक शासकीय स्वीकृतियों के अधीन है। केंद्र के स्वरूप, सुविधाओं, वित्तीय व्यवस्था और संचालन पर अलग से स्वीकृतियां ली जाएंगी।
10,000 कृषि कर्मियों की नई भूमिका: गांव तक पहुंचेगी ट्रेनिंग
किसी भी योजना की सफलता इस बात पर टिकी होती है कि उसे जमीन पर उतारने वाला अमला कितना तैयार है। इस समझौते में इसी कमी को दूर करने पर खास ध्यान दिया गया है। कृषि विभाग के 10,000 से अधिक कर्मचारी इस पहल से जुड़कर काम करेंगे। अधिकारियों, कृषि पर्यवेक्षकों और क्षेत्रीय कार्मिकों को प्राकृतिक खेती की नवीन तकनीकों और किसानों को बेहतर मार्गदर्शन देने के बारे में प्रशिक्षित किया जाएगा।
प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम के जरिए मास्टर ट्रेनर तैयार किए जाएंगे, जो आगे जिला, ब्लॉक और ग्राम स्तर पर किसानों को प्रशिक्षण देंगे। एक अनोखा पहलू यह भी है कि कृषि अधिकारियों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान दिया गया है — राजयोग, ध्यान और सकारात्मक चिंतन से जुड़ी गतिविधियां चलाई जा सकेंगी।
राजस्थान प्राकृतिक खेती समझौता की शर्तें और समय-सीमा
| विषय | तय बात |
|---|---|
| पक्षकार | राजस्थान कृषि विभाग और ब्रह्माकुमारी संस्थान की राजयोग एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन की कृषि एवं ग्रामीण विकास प्रभाग |
| हस्ताक्षर | 25 अक्टूबर 2026, आबूरोड स्थित शांतिवन परिसर, वैश्विक शिखर सम्मेलन के दौरान |
| अवधि | शुरुआती तौर पर 3 वर्ष, दोनों पक्षों की सहमति से आगे बढ़ाई जा सकेगी |
| उत्कृष्टता केंद्र | आबूरोड का तपोवन (सैद्धांतिक सहमति, स्वीकृतियों के अधीन) |
| मुख्य काम | प्रशिक्षण शिविर, कार्यशाला, प्रदर्शनी, जागरूकता अभियान, शैक्षणिक भ्रमण, मास्टर ट्रेनर तैयार करना |
| समीक्षा | दोनों पक्ष नोडल अधिकारी नामित करेंगे, वार्षिक संयुक्त कार्ययोजना बनेगी, प्रशिक्षित किसानों और कार्यक्रमों की समय-समय पर समीक्षा होगी |
| वित्तीय दायित्व | समझौते में कोई पक्का वित्तीय दायित्व तय नहीं, अलग से स्वीकृति और शासकीय नियमों के अनुसार होगा |
राजस्थान सरकार की ओर से कृषि आयुक्त नरेश कुमार गोयल ने हस्ताक्षर किए, जबकि ब्रह्माकुमारी संस्थान की ओर से कृषि एवं ग्रामीण विकास प्रभाग की अध्यक्ष बीके सरला के प्रतिनिधित्व में यह संपन्न हुआ। इस अवसर पर जोधपुर और दांतीवाड़ा कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपति भी मौजूद रहे। सरला दीदी ने कहा कि प्रभाग पिछले 30 वर्षों से समाज की सेवा में सक्रिय है।
रसायनों का बोझ और किसान के अगले कदम
इस समझौते की पृष्ठभूमि को समझे बिना इसकी अहमियत पूरी तरह समझ नहीं आएगी। कृषि आयुक्त गोयल ने कहा कि यूरिया और डीएपी का अत्यधिक उपयोग धरती के लिए नुकसानदायक है, और खेत में डाला गया रसायन अन्न के जरिए मानव जीवन तक पहुंचता है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी अनुदान के कारण किसानों को यूरिया कम कीमत पर मिलता है, जबकि इसकी वास्तविक लागत का बड़ा हिस्सा सरकार वहन करती है — इसलिए संतुलित उपयोग के प्रति जागरूकता जरूरी है।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ीलाल मीणा के मार्गदर्शन में यह पहल हुई है। किसान के लिए समझदारी यही है कि पूरे खेत को एक साथ बदलने के बजाय एक छोटे हिस्से में प्राकृतिक तरीके आजमाकर खर्च और पैदावार नोट करें, और अपने जिले के कृषि विभाग कार्यालय से प्रशिक्षण शिविरों की जानकारी लेते रहें।
इससे जुड़ी पुरानी खबरों में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी पर सब्सिडी से जुड़ी राहत और जैविक खेती को बढ़ावा देने की पहल के बारे में भी पढ़ा जा सकता है। इस समझौते की मूल जानकारी प्रातःकाल की रिपोर्ट में भी उपलब्ध है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: राजस्थान प्राकृतिक खेती समझौता क्या है?
उत्तर: यह राजस्थान कृषि विभाग और ब्रह्माकुमारी संस्थान के बीच 25 अक्टूबर 2026 को हुआ समझौता है, जिसके तहत किसानों को प्राकृतिक और योगिक खेती का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
प्रश्न: यह समझौता कितने साल के लिए है?
उत्तर: शुरुआती तौर पर तीन साल के लिए, जिसे दोनों पक्षों की सहमति से आगे बढ़ाया जा सकेगा।
प्रश्न: आबूरोड के तपोवन में क्या बनेगा?
उत्तर: तपोवन को योगिक प्राकृतिक खेती के उत्कृष्टता केंद्र के रूप में विकसित करने पर सैद्धांतिक सहमति बनी है, जो आवश्यक शासकीय स्वीकृतियों के अधीन है।
प्रश्न: किसान इससे कैसे जुड़ सकते हैं?
उत्तर: कार्यक्रम चरणबद्ध तरीके से जिलों में शुरू होंगे। किसान अपने जिले के कृषि विभाग कार्यालय से प्रशिक्षण शिविरों की जानकारी ले सकते हैं।
राजस्थान के किसानों के लिए यह समझौता एक लंबी दौड़ की शुरुआत है। रसायनों पर निर्भरता घटाना, मिट्टी को बचाना और खेती की लागत कम करना — ये तीनों लक्ष्य एक साथ साधे जा सकते हैं, बशर्ते प्रशिक्षण सच में गांव तक पहुंचे और हर साल की समीक्षा ईमानदारी से हो।