Rajasthan High Court का बड़ा फैसला: जांच लंबित होने के बावजूद आरोपी को विदेश यात्रा की इजाजत — बेटे की सर्जरी के लिए 4 महीने अमेरिका जाने की अनुमति

कल्पना कीजिए कि आपका बेटा अमेरिका में है और उसे जल्द ही सर्जरी करानी है। आप उसके पास रहना चाहते हैं, लेकिन आपके खिलाफ एक आपराधिक मामले की जांच चल रही है और निचली अदालत ने विदेश जाने की इजाजत देने से इनकार कर दिया है। ऐसे में क्या होगा? राजस्थान हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि सिर्फ जांच लंबित होने के आधार पर किसी आरोपी की अस्थायी विदेश यात्रा पर रोक नहीं लगाई जा सकती।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने तीन याचिकाकर्ताओं — महेश कुमार गुप्ता, चंदा गुप्ता और विनायक गुप्ता — की याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें अधिकतम चार महीने के लिए अमेरिका जाने की अनुमति दे दी है। साथ ही बीकानेर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-4 का 7 अगस्त 2026 का वह आदेश रद्द कर दिया गया है, जिसमें विदेश यात्रा की अनुमति से इनकार किया गया था। यह फैसला उन हजारों लोगों के लिए राहत भरा है जिनके खिलाफ मामले चल रहे हैं, लेकिन पारिवारिक या चिकित्सीय कारणों से उन्हें विदेश जाना जरूरी होता है।

मामला क्या है: बेटे की सर्जरी और अटकी जांच

याचिकाकर्ताओं के खिलाफ बीकानेर के गंगाशहर थाने में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज है। इस एफआईआर को रद्द करने की याचिका भी हाईकोर्ट में लंबित है, और हाईकोर्ट की ही दूसरी पीठ ने पहले ही उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा रखी है। यानी वे जांच से भागे नहीं थे, कानूनी प्रक्रिया में पूरी तरह सहयोग कर रहे थे।

तीनों याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि उनका पुत्र अमेरिका में सर्जरी से गुजरने वाला है और वे इस मुश्किल घड़ी में उसके साथ रहना चाहते हैं। उन्होंने बीकानेर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष विदेश यात्रा की अनुमति मांगी थी, लेकिन मजिस्ट्रेट ने 7 अगस्त 2026 के आदेश से यह अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।

राज्य सरकार की ओर से विदेश यात्रा का कड़ा विरोध किया गया। सरकार का तर्क था कि मामले की जांच अभी लंबित है और डॉक्टर की सलाह ओपीडी आधार पर है, यानी बच्चे को अस्पताल में भर्ती होना जरूरी नहीं है। लेकिन हाईकोर्ट को रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिला, जिससे यह माना जा सके कि याचिकाकर्ताओं की अस्थायी विदेश यात्रा से जांच प्रभावित होगी।

हाईकोर्ट ने क्या-क्या कहा: फैसले की 5 बड़ी बातें

अदालत की टिप्पणियां इस फैसले की सबसे अहम कड़ी हैं, क्योंकि ये भविष्य में ऐसे मामलों के लिए नजीर बनेंगी:

  • 1. जांच लंबित होना अपने आप में रोक का आधार नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल आपराधिक मामले की जांच लंबित होने के आधार पर आरोपी की अस्थायी विदेश यात्रा पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
  • 2. व्यक्तिगत मौजूदगी हर चरण में जरूरी नहीं: यदि जांच में आरोपी की व्यक्तिगत मौजूदगी जरूरी नहीं है और वह न्यायालय की शर्तों का पालन करने को तैयार है, तो विदेश जाने की अनुमति दी जा सकती है।
  • 3. मानवीय पहलू सर्वोपरि: कोर्ट ने कहा कि भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश में बीमार संतान के पास रहना माता-पिता की स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है। इसके लिए बच्चे का अस्पताल में भर्ती होना अनिवार्य नहीं है। यानी ओपीडी आधार पर इलाज की दलील देकर मानवीय जरूरत को खारिज नहीं किया जा सकता।
  • 4. गिरफ्तारी से संरक्षण का मतलब जांच से छूट नहीं: अदालत ने यह भी साफ किया कि गिरफ्तारी से मिली सुरक्षा का मतलब जांच से छूट नहीं है। जांच एजेंसी कानून के अनुसार जांच जारी रख सकती है।
  • 5. चार महीने की सीमा तय: कोर्ट ने अधिकतम चार महीने के लिए ही विदेश यात्रा की अनुमति दी और स्पष्ट किया कि इससे अधिक समय तक विदेश में रहने की अनुमति नहीं होगी।

एलओसी और जांच एजेंसियों को सख्त निर्देश

इस फैसले का एक और अहम पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ जारी लुक आउट सर्कुलर (LOC) को भी यात्रा में बाधा नहीं बनने दिया। अदालत ने विदेश मंत्रालय, आव्रजन (इमिग्रेशन) और पुलिस अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि याचिकाकर्ताओं की विदेश यात्रा में किसी प्रकार की बाधा न डाली जाए और उनके खिलाफ जारी लुक आउट सर्कुलर को यात्रा रोकने के लिए प्रभावी नहीं किया जाएगा।

प्रमुख निर्देश — विदेश यात्रा की अवधि: अधिकतम 4 महीने, इससे अधिक नहीं। लुक आउट सर्कुलर (LOC): यात्रा रोकने के लिए प्रभावी नहीं होगा। जांच एजेंसी: कानून के अनुसार जांच जारी रख सकती है। गिरफ्तारी पर रोक: पहले से जारी सुरक्षा बरकरार, लेकिन जांच से छूट नहीं। एफआईआर रद्द करने की याचिका: अंतिम फैसला अभी बाकी, अलग से चलेगी।

आम लोगों के लिए इस फैसले का क्या मतलब है

यह फैसला सिर्फ तीन याचिकाकर्ताओं तक सीमित नहीं है। राजस्थान ही नहीं, पूरे देश में ऐसे कई लोग हैं जिनके खिलाफ मामले चल रहे हैं या जांच लंबित है, और उन्हें इलाज, पढ़ाई या नौकरी के सिलसिले में विदेश जाना होता है। इस फैसले से उन्हें एक स्पष्ट कानूनी रास्ता मिलता है:

  • पहला कदम: संबंधित मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय के समक्ष विदेश यात्रा की अनुमति के लिए आवेदन दें। आवेदन में यात्रा का उद्देश्य, अवधि, टिकट और ठहरने का विवरण दें।
  • दूसरा कदम: यह साबित करें कि जांच में आपकी व्यक्तिगत मौजूदगी हर समय जरूरी नहीं है और आप जांच में सहयोग कर रहे हैं।
  • तीसरा कदम: यदि निचली अदालत इनकार कर दे, तो हाईकोर्ट में याचिका दायर की जा सकती है, जैसा इस मामले में हुआ।
  • LOC जारी होने पर: अदालत से विशेष निर्देश लेकर आव्रजन अधिकारियों को अवगत कराएं, ताकि एयरपोर्ट पर रोका न जाए।

ध्यान रहे कि अनुमति हमेशा शर्तों के साथ मिलती है — तय अवधि में लौटना, जांच एजेंसी के समन पर उपस्थित होना और न्यायालय को अपनी विदेशी पता-ठिकाना बताना जैसी शर्तें आम हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न 1: क्या जांच लंबित होने पर कोई भी आरोपी विदेश जा सकता है?
उत्तर: अपने आप नहीं। अदालत देखेगी कि जांच में आपकी व्यक्तिगत मौजूदगी कितनी जरूरी है, आप जांच में सहयोग कर रहे हैं या नहीं, और यात्रा का कारण कितना वाजिब है। मानवीय और चिकित्सीय कारणों को तरजीह मिलती है।

प्रश्न 2: लुक आउट सर्कुलर (LOC) जारी होने पर क्या विदेश यात्रा संभव है?
उत्तर: सामान्यतः LOC जारी होने पर आव्रजन अधिकारी यात्रा रोक देते हैं। लेकिन इस फैसले के अनुसार, अदालत LOC को यात्रा में बाधा बनने से रोकने का निर्देश दे सकती है, जैसा यहां हुआ।

प्रश्न 3: इस मामले में 4 महीने की सीमा क्यों तय की गई?
उत्तर: अदालत ने यात्रा को अस्थायी और उद्देश्य-विशिष्ट रखा है। तय अवधि से अधिक विदेश में रहने की अनुमति नहीं दी गई, ताकि आरोपी जांच से दूर न भाग सके।

प्रश्न 4: क्या यह फैसला सभी अदालतों पर लागू होगा?
उत्तर: हाईकोर्ट के फैसले अपने अधिकार क्षेत्र में नजीर का काम करते हैं। राजस्थान की निचली अदालतें और वकील भविष्य में ऐसे मामलों में इस फैसले का हवाला दे सकेंगे।

नोट: यह खबर सार्वजनिक न्यायालयीन कार्यवाही पर आधारित है। किसी भी कानूनी मामले में अपने वकील से सलाह अवश्य लें।

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