नागौर में चने की बुवाई शुरू: कम पानी में ज्यादा मुनाफा, जानें पूरी तकनीक

नागौर जिले के खेतों में इन दिनों हलचल बढ़ गई है। रबी सीजन की शुरुआत के साथ ही किसानों ने नागौर चना बुवाई की तैयारियां तेज कर दी हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि कम पानी में अच्छी पैदावार देने वाली चने की फसल नागौर जैसे कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए सबसे भरोसेमंद विकल्प है। सही समय पर बुवाई, प्रमाणित बीज और वैज्ञानिक तकनीक से किसान उत्पादन बढ़ाने के साथ लागत भी घटा सकते हैं।

सबसे अहम बात: बुवाई से पहले मिट्टी-नमी की जांच, उन्नत किस्मों का चयन और बीजोपचार जैसी छोटी सावधानियां पैदावार में बड़ा फर्क डालती हैं। आइए समझते हैं कि इस रबी सीजन में नागौर चना बुवाई कैसे करें ताकि कम पानी में भी बंपर फसल मिले।

नागौर के लिए चना क्यों है सही दांव

नागौर में बारिश कम होती है और भूजल का स्तर हर साल चिंता बढ़ा रहा है। ऐसे में चना स्वाभाविक पसंद है — यह दलहनी फसल मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिर करके जमीन की सेहत सुधारती है, जो अगली फसल के लिए मुफ्त का फायदा है।

दूसरा कारण है बाजार का भरोसा — दालों की मांग हमेशा रहती है और समर्थन मूल्य पर खरीद भाव की सुरक्षा देती है। तीसरा कारण है कम लागत — सिंचाई और खाद पर गेहूं-सरसों से कम खर्च आता है।

नागौर चना बुवाई से पहले खेत की तैयारी

एग्रीकल्चर एक्सपर्ट और किसान राजेंद्र चौधरी की सलाह है कि बुवाई से पहले खेत की मिट्टी और नमी की स्थिति देखना सबसे जरूरी है। जल्दबाजी में सूखे या ज्यादा गीले खेत में बुवाई से अंकुरण प्रभावित होता है। इन चार बातों का ध्यान रखें:

1. मिट्टी की जांच: तैयारी के समय मिट्टी का परीक्षण जरूर करवाएं — पोषक तत्वों की जानकारी से खाद का संतुलित उपयोग हो पाता है। अंधाधुंध खाद पैसे की बर्बादी है।

2. जल निकासी: खेत में पानी निकासी की उचित व्यवस्था हो। ज्यादा देर पानी भरा रहने से जड़ों को नुकसान और जड़ गलन का खतरा बढ़ता है। चने के लिए लवण-क्षार रहित, अच्छी जल निकास वाली उपजाऊ भूमि उपयुक्त है।

3. नमी का प्रबंधन: बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी हो ताकि अंकुरण अच्छा हो। कम पानी वाले क्षेत्रों में नमी का सही उपयोग ही पैदावार तय करता है।

4. मृदा उपचार: कृषि अनुसंधान केंद्र तबीजी (अजमेर) के अनुसार 2.5 किलो ट्राइकोडर्मा को 100 किलो नमीयुक्त गोबर की खाद में मिलाकर 10-15 दिन छाया में रखें, और बुवाई के समय पलेवा करते हुए प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला दें।

बीज का चयन: ये गलती महंगी पड़ेगी

नागौर चना बुवाई में बेहतर उत्पादन के लिए बीज का चयन सबसे अहम कड़ी है। नागौर की जलवायु के अनुसार जीएनजी-1581 और जीएनजी-1958 जैसी किस्मों के बारे में कृषि विशेषज्ञों से जानकारी ली जा सकती है। लेकिन किस्म चुनते समय अपने क्षेत्र की मिट्टी, बुवाई का समय, सिंचाई की उपलब्धता और स्थानीय उपयुक्तता का ध्यान रखें — पड़ोसी के खेत वाली किस्म आपके खेत में भी चलेगी, यह जरूरी नहीं।

सबसे बड़ी गलती है बिना जांचे बीज खरीद लेना। हमेशा प्रमाणित बीज ही लें और पैकेट पर अंकित किस्म, विवरण व वैधता जरूर जांचें। सस्ते के चक्कर में घटिया बीज लेना पूरी फसल को दांव पर लगाना है। बुवाई से पहले नजदीकी कृषि पर्यवेक्षक या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेना हजारों के नुकसान से बचा सकता है।

बीजोपचार — छोटा खर्च, बड़ा बचाव

नागौर चना बुवाई में बुवाई से पहले बीजोपचार से बीज और मिट्टी से फैलने वाले रोगों का खतरा कम होता है। कृषि विभाग की अनुशंसित विधियां इस सारणी में देखें:

उद्देश्य उपचार मात्रा (प्रति किलो बीज)
फफूंद रोग कार्बेण्डाजिम + थाइरम 1 ग्राम + 2.5 ग्राम
फफूंद रोग (विकल्प) ट्राइकोडर्मा 10 ग्राम
दीमक फिप्रोनिल 5 SC 10 मिली
दीमक (विकल्प) इमीडाक्लोप्रिड 600 FS 5 मिली

कटवर्म-वायरवर्म की रोकथाम के लिए आखिरी जुताई से पहले क्यूनालफॉस 1.5% चूर्ण 25 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करें। रसायनों का उपयोग करते समय पूरे कपड़े, मास्क और दस्ताने जरूर पहनें।

नागौर चना बुवाई की सही विधि: सीड ड्रिल से कतारों में

विशेषज्ञों के अनुसार चने की बुवाई कतारों में सीड ड्रिल से करना सबसे उपयोगी है — बीज उचित दूरी-गहराई पर पड़ता है, बीज की बचत होती है और निराई-गुड़ाई आसान हो जाती है। बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी जरूरी है; मात्रा, दूरी और गहराई किस्म की सिफारिश अनुसार तय करें। छिड़काव विधि से अंकुरण असमान होता है, इसलिए सीड ड्रिल को प्राथमिकता दें।

खाद और पानी का सही हिसाब

उर्वरकों का उपयोग मृदा परीक्षण की सिफारिश पर, सही समय और संतुलित मात्रा में ही करें:

क्षेत्र नत्रजन फास्फोरस तरीका
असिंचित 10 किलो/हेक्टेयर 25 किलो/हेक्टेयर आखिरी जुताई पर, 12-15 सेमी गहराई
सिंचित 20 किलो/हेक्टेयर 40 किलो/हेक्टेयर आखिरी जुताई पर, 12-15 सेमी गहराई

पानी के मामले में चने की सबसे बड़ी खूबी है कि इसे अनावश्यक सिंचाई नहीं चाहिए। ज्यादा पानी से पैदावार घटती है और जड़ गलन का खतरा बढ़ता है — बुवाई के समय की नमी और फूल-फली बनने के समय की हल्की सिंचाई ही काफी है। खाद को लेकर राहत की खबर: प्रदेश में खाद की कालाबाजारी और जबरन टैगिंग पर सख्ती के लिए समीक्षा हो चुकी है।

रोग-कीट से बचाव

चने में जड़ गलन, सूखा जड़ गलन और उकठा जैसे रोग लगते हैं। सबसे सस्ता बचाव है फसल चक्र — एक ही खेत में लगातार चना न बोएं। रोग प्रतिरोधी किस्में अपनाएं और ट्राइकोडर्मा से भूमि उपचार व बीजोपचार को आदत बनाएं। खेत का नियमित निरीक्षण करें — शुरुआत में कीट दिखने पर नियंत्रण आसान और सस्ता होता है।

किसान चेकलिस्ट: आज से क्या करें

  1. मिट्टी परीक्षण करवाएं और नमी की स्थिति जांचें।
  2. प्रमाणित बीज खरीदें (जीएनजी-1581/1958 जैसी स्थानीय उपयुक्त किस्में), पैकेट की वैधता देखें।
  3. बीजोपचार करना न भूलें — फफूंदनाशक या ट्राइकोडर्मा से।
  4. नागौर चना बुवाई में सीड ड्रिल से कतारों में बुवाई करें।
  5. संतुलित खाद आखिरी जुताई के समय निर्धारित गहराई पर दें।
  6. फसल बीमा जरूर करवाएं — हाल में डूंगरपुर-जालोर के किसानों को आपत्तियां खारिज होने पर करोड़ों का क्लेम मिला है।
  7. कृषि पर्यवेक्षक या कृषि विज्ञान केंद्र से एक बार सलाह जरूर लें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1: नागौर में चने की बुवाई का सही समय कब है?

उत्तर: रबी सीजन की शुरुआत यानी अक्टूबर का महीना नागौर चना बुवाई के लिए उपयुक्त माना जाता है, बशर्ते खेत में पर्याप्त नमी हो।

प्रश्न 2: कौन सी किस्में लगाएं?

उत्तर: जीएनजी-1581 और जीएनजी-1958 नागौर की जलवायु के अनुकूल मानी जाती हैं। नागौर चना बुवाई से पहले अंतिम चयन के लिए स्थानीय कृषि पर्यवेक्षक से सलाह लें।

प्रश्न 3: क्या चने में ज्यादा सिंचाई चाहिए?

उत्तर: नहीं — यही चने की सबसे बड़ी खूबी है। ज्यादा पानी से पैदावार घटती है और जड़ गलन का खतरा बढ़ता है।

प्रश्न 4: बीजोपचार क्यों जरूरी है?

उत्तर: इससे बीज और मिट्टी से फैलने वाले रोगों व दीमक से बचाव होता है — नागौर चना बुवाई में यह छोटा खर्च पूरी फसल को शुरुआती नुकसान से बचा लेता है।

स्रोत: News18 Hindi (15 अक्टूबर 2026), कृषि अनुसंधान केंद्र तबीजी (अजमेर) की तकनीकी सलाह।

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