एशियन गेम्स 2026: जापान में कांस्य जीतकर लौटीं निशानेबाज माहेश्वरी चौहान, उदयपुर में हुआ ऐतिहासिक स्वागत

उदयपुर। जापान के आइची-नागोया में एशियन गेम्स 2026 की स्कीट शूटिंग में कांस्य पदक जीतने वाली राजस्थान की बेटी माहेश्वरी चौहान शनिवार को अपने वतन लौटीं, तो उदयपुर ने उनका ऐतिहासिक स्वागत किया। सुबह दिल्ली एयरपोर्ट से लेकर उदयपुर के डबोक एयरपोर्ट तक तिलक लगाकर उनकी अगवानी हुई, और शाम को फतहसागर स्थित राज बाग में राजसमंद राइफल एसोसिएशन के सम्मान समारोह में उदयपुर, राजसमंद, बांसवाड़ा और जालौर से पहुंचे प्रमुख लोगों और खेलप्रेमियों ने फूल बरसाकर अभिनंदन किया।

महिला स्कीट टीम स्पर्धा में भारत तीसरे स्थान पर रहा और कांस्य पदक जीता।

आइची-नागोया में वो पल जब कांस्य पक्का हुआ

एशियन गेम्स 2026 की महिला स्कीट टीम स्पर्धा में भारतीय टीम ने 331 अंकों के संयुक्त स्कोर के साथ तीसरा स्थान हासिल किया। टीम में माहेश्वरी चौहान के साथ राइजा ढिल्लों और परिनाज धालीवाल शामिल थीं। इस स्पर्धा में चीन ने स्वर्ण पदक जीता और कजाकिस्तान दूसरे स्थान पर रहा।

स्थान देश पदक
पहला चीन स्वर्ण
दूसरा कजाकिस्तान रजत
तीसरा भारत कांस्य

भारतीय टीम का कुल स्कोर 331 अंक रहा — तीनों शूटरों की एकजुट मेहनत का नतीजा। माहेश्वरी के लिए यह कांस्य व्यक्तिगत उपलब्धि से बढ़कर है, क्योंकि टीम स्पर्धा में पदक का मतलब है एक-दूसरे का हौसला और तालमेल।

पेरिस की निराशा, जिसने इस कांस्य को जन्म दिया

माहेश्वरी के ससुर और राजसमंद राइफल एसोसिएशन के अध्यक्ष राघवेंद्र सिंह राठौड़ ने समारोह में उस किस्से को याद किया जो इस पदक की असली कहानी है। पेरिस ओलंपिक में माहेश्वरी से पदक बेहद मामूली अंतर से छूट गया था। वह निराशा किसी भी खिलाड़ी को तोड़ सकती थी, लेकिन माहेश्वरी ने रुकना स्वीकार नहीं किया।

राजसमंद के केलवा स्थित शूटिंग रेंज पर उन्होंने अभ्यास जारी रखा। रोज़ वही रूटीन, वही निशाने — बस इरादा और पक्का हो गया।

सियाणा गांव की मिट्टी से शुरू हुआ सफर

4 जुलाई 1996 को जालौर जिले के सियाणा गांव में जन्मी माहेश्वरी ने निशानेबाजी की पहली सीख अपने दादा गणपत सिंह से ली। दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से पढ़ाई करने वाली इस बेटी के जीवन में मोड़ तब आया जब उनके पिता प्रदीप सिंह चौहान — जो जालौर राइफल एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं — ने बेटी की प्रतिभा को पहचाना।

उन्होंने बेटी के सपनों को उड़ान देने के लिए सियाणा गांव में ही शूटिंग रेंज तैयार करवा दी। सोचिए — एक गांव, जहां खेल की बड़ी सुविधाओं का अभाव होता है, वहां एक पिता अपनी बेटी के लिए खुद रेंज बनवा देता है। यह फैसला सिर्फ पिता का नहीं था, यह एक परिवार के भरोसे का प्रतीक था।

समारोह में माहेश्वरी के पिता ने कहा कि केवल सुविधा मिल जाने से सफलता हासिल नहीं होती। माहेश्वरी ने उस अवसर को अपनी मेहनत, अनुशासन और लगातार अभ्यास से सफलता में बदला। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई उपलब्धियों के बाद एशियन गेम्स में कांस्य पदक उनके इसी लंबे संघर्ष का परिणाम है।

शादी के बाद भी नहीं टूटा निशाना

माहेश्वरी की कहानी का एक और पहलू उनके ससुराल का है, जो भारतीय खेल में बेटियों के लिए एक प्रेरक संदेश है। शादी के बाद उन्होंने केलवा स्थित राजसमंद राइफल शूटिंग संघ की शूटिंग रेंज पर अभ्यास कर अपनी प्रतिभा को और निखारा। उनके पति अधिराज सिंह हैं और वे राजसमंद के पूर्व सांसद हरिओम सिंह के परिवार से हैं।

उदयपुर राइफल एसोसिएशन के अध्यक्ष वीरमदेव सिंह कृष्णावत ने समारोह में कहा कि माहेश्वरी ने सिर्फ एक पदक नहीं जीता, बल्कि अपने परिवार का विश्वास, अपने गांव का मान और राजस्थान का गौरव बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि जालौर से बेटी उदयपुर आ गई, लेकिन यहां ससुराल में भी बहू को राइफल शूटिंग में आगे बढ़ने के लिए सपोर्ट और उत्साह मिलता रहा।

उनकी सफलता आने वाली बेटियों के लिए भी प्रेरणा है कि वे बड़े सपने देखें और उन्हें पूरा करने के लिए पूरी मेहनत के साथ आगे बढ़ें।

सम्मान समारोह में कौन-कौन पहुंचा

शनिवार को राज बाग में हुए सम्मान समारोह में माहेश्वरी के परिवारजन — राघवेंद्र सिंह राठौड़, प्रदीप सिंह चौहान, अधिराज सिंह राठौड़, अनंत सिंह राठौड़ और जितेंद्र सिंह राठौड़ — ने सबसे पहले अगवानी कर बधाई दी।

इसके अलावा बांसवाड़ा राइफल संघ के अध्यक्ष दिव्य राज सिंह, राजसमंद राइफल संघ के उपाध्यक्ष देवेन्द्र सिंह राठौड़, पीयूष कच्छावा, कमल भंडारी, हिम्मत सिंह चौहान, पूर्व जिला खेल अधिकारी शकील हुसैन, राजेंद्र नलवाया, मुकेश जैन, राजसमंद के जिला खेल अधिकारी धर्मदेवसिंह, सुरेंद्र सिंह राठौड़, चिरंजीव सिंह ग्रेवाल, अभिमन्यु सिंह झाला, युद्धवीर सिंह शक्तावत, राजेंद्र सिंह चौहान, रामेश्वर जेठी, दीपक दत्त व्यास और प्रमोद कुंदर ने स्वागत किया। समारोह का संचालन शारीरिक शिक्षक श्याम सिंह सिसोदिया ने किया।

युवा खिलाड़ियों के लिए इस कहानी के 4 सबक

  1. हार आखिरी नहीं होती: पेरिस ओलंपिक की निराशा के बाद माहेश्वरी ने अभ्यास बंद नहीं किया — हार को वजह बनाइए, बहाना नहीं।
  2. परिवार का साथ सबसे बड़ी ताकत: दादा की शुरुआती सीख, पिता की बनाई रेंज और ससुराल का सपोर्ट।
  3. गांव से भी रास्ता निकलता है: सियाणा जैसे गांव से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर — प्रतिभा शहर की मोहताज नहीं।
  4. शादी करियर का अंत नहीं: ससुराल के सहयोग से अभ्यास जारी रखना बेटियों के लिए बड़ा संदेश है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न: माहेश्वरी चौहान ने एशियन गेम्स 2026 में कौन-सा पदक जीता?
उत्तर: माहेश्वरी चौहान ने जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन गेम्स 2026 की महिला स्कीट टीम स्पर्धा में कांस्य पदक जीता। भारतीय टीम में उनके साथ राइजा ढिल्लों और परिनाज धालीवाल थीं और टीम का संयुक्त स्कोर 331 अंक रहा।

प्रश्न: माहेश्वरी चौहान का जन्म कहां हुआ और उनकी शिक्षा कहां हुई?
उत्तर: माहेश्वरी का जन्म 4 जुलाई 1996 को राजस्थान के जालौर जिले के सियाणा गांव में हुआ। उन्होंने दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से पढ़ाई की।

प्रश्न: माहेश्वरी के पिता ने उनके लिए क्या खास किया?
उत्तर: उनके पिता प्रदीप सिंह चौहान ने बेटी की प्रतिभा को पहचानकर जालौर के सियाणा गांव में ही शूटिंग रेंज तैयार करवा दी थी, ताकि बेटी को अभ्यास के लिए बाहर न जाना पड़े।

प्रश्न: पेरिस ओलंपिक में माहेश्वरी के साथ क्या हुआ था?
उत्तर: पेरिस ओलंपिक में माहेश्वरी से पदक बेहद मामूली अंतर से छूट गया था। इस निराशा के बाद उन्होंने हार नहीं मानी और केलवा स्थित शूटिंग रेंज पर लगातार अभ्यास जारी रखा, जिसका नतीजा एशियन गेम्स में कांस्य पदक के रूप में मिला।

Leave a Comment