आठ साल की फरारी, लगातार बदलते ठिकाने, और सिर पर दस-दस हजार रुपये का इनाम — आखिरकार जयपुर पुलिस के हाथ वो दो चेहरे आ ही गए जो 2018 के एक बड़े बैंक घोटाले के मुख्य किरदार बताए जाते हैं। माणक चौक थाना पुलिस की विशेष टीम ने तकनीकी सूचना और मुखबिर तंत्र की मदद से प्रकाश भारद्वाज (54) और निशा भारद्वाज (48) को गिरफ्तार किया है। दोनों प्रताप नगर, सांगानेर (जयपुर) के रहने वाले हैं। पुलिस अब इनसे घोटाले में इनकी भूमिका और बाकी सह-आरोपियों के बारे में पूछताछ कर रही है।
पकड़ने में आठ साल क्यों लगे? पुलिस की अपनी जुबानी
मामले की सबसे दिलचस्प कड़ी खुद गिरफ्तारी की प्रक्रिया है। डीसीपी (उत्तर) करण शर्मा के मुताबिक दोनों आरोपी 2018 में मुकदमा दर्ज होते ही फरार हो गए थे। उसके बाद से वे एक जगह टिककर नहीं रहे — गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए लगातार अपना निवास स्थान और गुप्त ठिकाने बदलते रहे।
लंबे समय से फरार इन वांछित आरोपियों को पकड़ने के लिए माणक चौक थाना पुलिस ने एक विशेष टीम बनाई थी। इस टीम ने तकनीकी इंटेलिजेंस और स्थानीय मुखबिरों के बड़े नेटवर्क के जरिए दोनों के सभी संभावित ठिकानों के बारे में जानकारियां जुटाईं। अधिकारियों का कहना है कि आरोपियों की गतिविधियों पर लगातार कड़ी नजर रखी गई और उनकी सटीक लोकेशन चिह्नित की गई। जैसे ही पुख्ता सूचना मिली, टीम ने सादी वर्दी में निगरानी और तुरंत दबिश का समन्वय करके दोनों को गिरफ्तार कर लिया।
13 लोन खाते और करोड़ों की चपत — घोटाला कैसे रचा गया
पुलिस जांच में जो तस्वीर सामने आई है, वह किसी फिल्मी साजिश से कम नहीं लगती — फर्क सिर्फ इतना है कि यह पूरी तरह असली कागजों पर रची गई थी। आरोप है कि सभी 59 नामजद आरोपियों ने आपस में सांठगांठ करके एक बड़ा आपराधिक षड्यंत्र रचा।
खेल इस तरह चला: विभिन्न संपत्तियों के पट्टे और विवादित — या फिर बैंक में पहले से ही जमा — संपत्तियों के दस्तावेज बैंक में गिरवी रख दिए गए। फिर नियमों और वित्तीय प्रक्रिया के पूरी तरह विपरीत जाकर करीब 13 ऋण खाते स्वीकृत करवा लिए गए। इन खातों के जरिए आरोपियों ने बैंक की करोड़ों रुपये की राशि हड़प ली और बैंक को बहुत बड़ा वित्तीय नुकसान पहुंचाया।
इस मामले में पुलिस ने बैंक के पूर्व अध्यक्ष से लेकर कर्मचारी, वैल्यूअर और अधिवक्ताओं तक कुल 59 लोगों को नामजद किया है — यानी यह कोई एक-दो लोगों की करतूत नहीं, बल्कि बैंक के अंदर-बाहर फैला पूरा तंत्र था।
सहकारिता विभाग की जांच से खुली घोटाले की परतें
घोटाले की परतें तब खुलनी शुरू हुईं जब उप रजिस्ट्रार, सहकारिता समितियां, जयपुर (शहर) की ओर से जांच कराई गई। सहकारिता विभाग की जांच में घोटाला पूरी तरह साबित होने के बाद राजस्थान मरुधरा ग्रामीण सहकारी बैंक लिमिटेड के अधिकृत ऋण प्रभारी सदस्य ने माणक चौक थाने में आरोपियों के खिलाफ औपचारिक लिखित शिकायत दी।
शिकायत के आधार पर माणक चौक थाना पुलिस ने धोखाधड़ी करने, कूटरचित फर्जी दस्तावेज तैयार करने, उनका उपयोग करने और आपराधिक षड्यंत्र रचने जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया। मुकदमा दर्ज होने के बाद से ही प्रकाश भारद्वाज और निशा भारद्वाज पुलिस की गिरफ्त से बचने के लिए फरार हो गए थे — और तब से आठ साल तक कानून की पहुंच से दूर रहे।
पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार दोनों आरोपियों से अब घोटाले में उनकी व्यक्तिगत भूमिका और अन्य सह-आरोपियों के बारे में विस्तृत पूछताछ की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि इन गिरफ्तारियों से अन्य संदिग्धों और वित्तीय लेनदेन से जुड़े तथ्यों की जांच को गति मिलेगी।
सहकारी बैंक के ग्राहकों के लिए बड़े सबक
यह मामला सिर्फ दो गिरफ्तारियों की खबर नहीं है — यह राजस्थान के लाखों सहकारी बैंक ग्राहकों के लिए चेतावनी भी है। सहकारी बैंकों में ऋण प्रक्रिया अक्सर शहरी वाणिज्यिक बैंकों से कम पारदर्शी होती है, और इसी ढीलेपन का फायदा ऐसे गिरोह उठाते हैं।
अगर आप किसी सहकारी बैंक से लोन लेते हैं या वहां खाता रखते हैं, तो ये बातें ध्यान रखें: गिरवी रखी संपत्ति के दस्तावेजों की स्वतंत्र वकील से जांच करवाएं; ऋण की शर्तें बैंक से लिखित में लें; समय-समय पर अपना क्रेडिट स्कोर जांचते रहें ताकि आपके नाम पर कोई फर्जी खाता न खुला हो। घोटालों में अक्सर अंदरूनी लोगों की मिलीभगत होती है, इसलिए सिर्फ बैंक के भरोसे न रहें — अपने दस्तावेज खुद संभालें।
मामले के अहम आंकड़े एक नजर में
| बिंदु | जानकारी |
| गिरफ्तार आरोपी | प्रकाश भारद्वाज (54 वर्ष), निशा भारद्वाज (48 वर्ष) |
| पता | प्रताप नगर, सांगानेर, जयपुर |
| घोषित इनाम | 10-10 हजार रुपये (कुल 20 हजार) |
| फरारी की अवधि | 2018 से, करीब 8 साल |
| बैंक | राजस्थान मरुधरा ग्रामीण सहकारी बैंक लिमिटेड, जयपुर |
| फर्जी ऋण खाते | करीब 13 |
| कुल नामजद आरोपी | 59 (पूर्व अध्यक्ष, अधिकारी, कर्मचारी, ऋणी, गारंटर, वैल्यूअर, अधिवक्ता) |
| मुकदमा | माणक चौक थाना, जयपुर — 2018 में दर्ज |
| धाराएं | धोखाधड़ी, कूटरचित दस्तावेज, आपराधिक षड्यंत्र (420, 467, 468, 471, 120B समेत) |
| खुलासा | डीसीपी (उत्तर) करण शर्मा |
| गिरफ्तारी टीम | माणक चौक थाना पुलिस की विशेष टीम |
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सवाल 1: आरोपी आठ साल तक पुलिस से कैसे बचते रहे?
जवाब: दोनों आरोपी लगातार अपना ठिकाना बदलते रहे, इसलिए गिरफ्तारी में देरी हुई। आखिर में तकनीकी इंटेलिजेंस और मुखबिरों की मदद से सटीक लोकेशन मिली और दबिश देकर उन्हें पकड़ा गया।
सवाल 2: 13 फर्जी लोन खातों से घोटाला कैसे हुआ?
जवाब: आरोप है कि फर्जी या विवादित संपत्तियों के दस्तावेज गिरवी रखकर नियमों के विपरीत 13 ऋण खाते स्वीकृत करवाए गए। इन खातों के जरिए बैंक की करोड़ों रुपये की राशि हड़प ली गई। इस साजिश में बैंक के पूर्व अध्यक्ष से लेकर कर्मचारी, वैल्यूअर और अधिवक्ता तक — कुल 59 लोग नामजद हैं।
सवाल 3: क्या आम ग्राहकों का पैसा भी डूबा है?
जवाब: जांच में बैंक को भारी वित्तीय नुकसान की बात सामने आई है। सहकारी बैंक का पैसा आखिरकार जमाकर्ताओं और सदस्यों का ही होता है, इसलिए ऐसे घोटालों का असर परोक्ष रूप से ग्राहकों पर भी पड़ता है। नुकसान की वसूली अब जांच और अदालत की प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
सवाल 4: अब आगे क्या होगा?
जवाब: पुलिस दोनों से उनकी भूमिका और अन्य सह-आरोपियों के बारे में पूछताछ कर रही है। इसके बाद अदालत में पेशी और रिमांड पर घोटाले की बाकी कड़ियां जोड़ी जाएंगी।
आगे की राह
आठ साल बाद हुई ये गिरफ्तारियां जयपुर पुलिस के लिए बड़ी सफलता हैं, लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। कितने आरोपी अब भी फरार हैं और हड़पी गई राशि में से कितनी वसूल हो पाएगी — ये सवाल अभी बाकी हैं। माणक चौक पुलिस की पूछताछ से जुड़ने वाली कड़ियां इस घोटाले की पूरी तस्वीर साफ करेंगी।