दिल्ली की भलस्वा झील पर सुबह की धुंध छंट रही थी और पानी पर 20 पैडल एक साथ उठ-गिर रहे थे। जिस नाव में सबसे बेहतरीन तालमेल था, उसी पर बैठी थीं राजस्थान की बेटियां। 13वीं राष्ट्रीय जूनियर ड्रैगन बोट चैंपियनशिप के तीन दिन के मुकाबलों में उदयपुर की इन खिलाड़ियों ने 200 मीटर और 500 मीटर, दोनों स्पर्धाओं में कांस्य पदक जीतकर प्रदेश का नाम रोशन कर दिया। ड्रैगन बोट चैंपियनशिप राजस्थान के खेल इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी राष्ट्रीय सफलता लेकर आई है।
ये कहानी सिर्फ दो पदकों की नहीं है। ये उस खेल की कहानी है, जिसे राजस्थान में अभी ज्यादातर लोग नाम से भी नहीं जानते। ये कहानी उस सुबह की तपस्या की है, जो उदयपुर की एक झील पर हर रोज होती है। और ये कहानी उन 10 लड़कियों की है, जिन्होंने दिल्ली की झील पर साबित कर दिया कि तालमेल और मेहनत के आगे बड़े नाम भी फीके पड़ जाते हैं।
क्या होती है ड्रैगन बोट रेसिंग
ड्रैगन बोट रेसिंग दुनिया के सबसे पुराने जल-खेलों में से एक है। इसमें एक लंबी, संकरी नाव होती है, जिसके दोनों तरफ 10-10 पैडलर बैठते हैं। नाव के एक सिरे पर ड्रमर बैठता है, जो ढोल की थाप पर पैडल चलाने की गति तय करता है, और दूसरे सिरे पर स्टीयरर होता है, जो नाव की दिशा संभालता है।
इस खेल की सबसे खास बात ये है कि इसमें कोई एक सितारा नहीं होता। जीत उसी टीम की होती है, जिसके बीसों पैडल एक ही लय में पानी को चीरते हैं। एक सेकंड का अंतर भी हार-जीत तय कर देता है। इसी वजह से ड्रैगन बोट को “टीम स्पिरिट का सबसे बड़ा खेल” कहा जाता है।
भारत में इस खेल का संगठन भारतीय ड्रैगन बोट फेडरेशन करता है और राष्ट्रीय चैंपियनशिप हर साल अलग-अलग शहरों में होती है। राजस्थान में इसका केंद्र उदयपुर का गोवर्धन सागर वाटर स्पोर्ट्स सेंटर है, जहां जूनियर से लेकर सीनियर तक के खिलाड़ी नियमित अभ्यास करते हैं।
भलस्वा झील में तीन दिन की टक्कर
इस बार की 13वीं राष्ट्रीय जूनियर ड्रैगन बोट चैंपियनशिप 18 से 20 अक्टूबर तक दिल्ली की भलस्वा झील में आयोजित हुई। देशभर की टीमों ने हिस्सा लिया। राजस्थान की जूनियर महिला टीम ने 200 मीटर और 500 मीटर, दोनों स्पर्धाओं में कांस्य पदक हासिल किए।
दोनों दौड़ों में राजस्थान की नावों ने कड़ी टक्कर दी। 200 मीटर की दौड़ में शुरुआत से ही तेज़ी चाहिए होती है — यहां गति और संतुलन दोनों की परीक्षा होती है। 500 मीटर में मामला थोड़ा अलग होता है — यहां सहनशक्ति और आखिरी 100 मीटर में टीम का दम दिखता है। राजस्थान की बेटियों ने दोनों दूरी में अपनी रणनीति सही रखी और पदक मंच तक पहुंचीं।
राजस्थान ड्रैगन बोट के अध्यक्ष डॉ. हेमराज सिंह चौधरी के अनुसार, ये उपलब्धि प्रदेश में ड्रैगन बोट खेल के बढ़ते विकास और खिलाड़ियों की कड़ी मेहनत को दर्शाती है। उन्होंने सभी पदक विजेता खिलाड़ियों और कोच नितिन बिष्ट को बधाई देते हुए आगामी प्रतियोगिताओं में भी ऐसे ही प्रदर्शन की उम्मीद जताई।
पदक जीतने वाली 10 बेटियां: कौन-कौन हैं
टीम में उदयपुर के गोवर्धन सागर वाटर स्पोर्ट्स सेंटर में अभ्यास करने वाली 10 खिलाड़ी शामिल थीं। सभी ने कोच नितिन बिष्ट के मार्गदर्शन में महीनों तक रोजाना पसीना बहाया।
| क्र.सं. | खिलाड़ी का नाम |
|---|---|
| 1 | दिव्या |
| 2 | मारिया |
| 3 | भावना |
| 4 | प्रिया |
| 5 | तमन्ना |
| 6 | मोनिका |
| 7 | अंकिता |
| 8 | पायल |
| 9 | दीपिका |
| 10 | संध्या |
इनमें से ज्यादातर खिलाड़ी स्कूल-कॉलेज की छात्राएं हैं। रोजाना पढ़ाई के साथ सुबह और शाम, दोनों समय अभ्यास करना आसान नहीं होता। लेकिन कोच नितिन बिष्ट बताते हैं कि इन्हीं बच्चियों की सबसे बड़ी ताकत उनकी अनुशासन-प्रियता है — नाव में 20 पैडलर अगर एक साथ न चलें, तो नाव आगे बढ़ने की बजाय घूम जाती है।
गोवर्धन सागर: जहां रोज होती है तपस्या
उदयपुर का गोवर्धन सागर अब सिर्फ पर्यटन स्थल नहीं रहा, ये राजस्थान के जल-खेलों का प्रशिक्षण केंद्र बन चुका है। यहां सुबह-सुबह ड्रैगन बोट टीम का अभ्यास होता है। तकनीक, शारीरिक क्षमता, सहनशक्ति और टीम समन्वय — चारों पर एक साथ काम होता है।
कोच नितिन बिष्ट के मार्गदर्शन में खिलाड़ी अपनी तकनीक को लगातार निखारती हैं। अभ्यास सिर्फ पानी पर नहीं होता — जिम में ताकत का काम, वीडियो एनालिसिस से स्ट्रोक की समीक्षा, और ड्रमर के साथ लय का तालमेल, ये सब रोज की दिनचर्या का हिस्सा है।
इस सफलता के बाद उदयपुर में वाटर स्पोर्ट्स को नई पहचान मिली है। स्थानीय प्रशासन और खेल प्रेमियों का ध्यान इस केंद्र की ओर बढ़ा है, जिससे आने वाले समय में बेहतर सुविधाओं और संसाधनों की उम्मीद जगी है।
ड्रैगन बोट चैंपियनशिप में राजस्थान का बढ़ता ग्राफ
ये पहला मौका नहीं है जब उदयपुर के खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा हो। लेकिन ड्रैगन बोट चैंपियनशिप राजस्थान के लिए अब एक पहचान बनती जा रही है। जूनियर वर्ग में दो कांस्य पदक इस बात का संकेत हैं कि अगले 2-3 साल में यही खिलाड़ी सीनियर वर्ग में प्रदेश का प्रतिनिधित्व करेंगी।
खेल विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रैगन बोट जैसे टीम खेलों में राजस्थान की बेटियों का प्रदर्शन इसलिए बेहतर हो रहा है, क्योंकि यहां प्रशिक्षण का ढांचा धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है। नियमित अभ्यास, अनुभवी कोच और प्रतिस्पर्धी माहौल — तीनों मिलकर नतीजे दे रहे हैं।
इस सफलता से अन्य युवतियों को भी खेलों से जुड़ने और अपनी प्रतिभा निखारने की प्रेरणा मिलेगी। ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों की बेटियों के लिए ये संदेश साफ है — सही मार्गदर्शन मिले तो राष्ट्रीय पदक दूर नहीं।
राजस्थान की बेटियों की ये साल की बड़ी उपलब्धियां
ड्रैगन बोट की ये सफलता इसी साल राजस्थान की बेटियों की कई बड़ी उपलब्धियों की कड़ी में एक और नाम जोड़ती है। कुछ दिन पहले ही बीकानेर की गर्विता चौधरी ने नेशनल बॉक्सिंग प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता था, जिससे जिले का नाम देशभर में गूंजा।
इससे पहले सीकर की मोना अग्रवाल ने एशियन पैरा गेम्स 2026 में 10 मीटर एयर राइफल में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा था। और उदयपुर की KVS अकादमी के सिलंबम खिलाड़ियों ने खेलो इंडिया में 11 पदक जीतकर प्रदेश को गौरवान्वित किया था।
इन सभी उपलब्धियों में एक बात समान है — ये सब उन खेलों से आई हैं, जो कभी मुख्यधारा में नहीं थे। बॉक्सिंग, पैरा शूटिंग, सिलंबम और अब ड्रैगन बोट — राजस्थान की बेटियां नए-नए खेलों में अपनी छाप छोड़ रही हैं।
कैसे जुड़ें: अगर आपकी बेटी भी ड्रैगन बोट सीखना चाहे
इस खबर को पढ़कर अगर आपके मन में भी सवाल उठ रहा है कि ड्रैगन बोट में कैसे शुरुआत करें, तो जान लीजिए कि रास्ता बहुत कठिन नहीं है। उदयपुर के गोवर्धन सागर वाटर स्पोर्ट्स सेंटर में जूनियर वर्ग के लिए नियमित ट्रायल और प्रशिक्षण शिविर आयोजित होते हैं। आमतौर पर 12 से 18 साल की उम्र की लड़कियां यहां दाखिला ले सकती हैं।
शुरुआत में तैराकी का बुनियादी ज्ञान जरूरी होता है, क्योंकि अभ्यास पानी पर होता है। इसके बाद ताकत, सहनशक्ति और टीम के साथ तालमेल का प्रशिक्षण दिया जाता है। राजस्थान ड्रैगन बोट एसोसिएशन समय-समय पर जिला और राज्य स्तर की प्रतियोगिताएं भी कराता है, जिनमें अच्छा प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को राष्ट्रीय शिविरों में चुना जाता है।
अगर आप उदयपुर से बाहर हैं, तो अपने जिले के खेल अधिकारी या जिला खेल संघ से संपर्क करके जानकारी ले सकते हैं। खेलो इंडिया और राज्य खेल परिषद की योजनाओं के तहत कई बार प्रशिक्षण और उपकरण की सुविधा भी मिलती है। सही उम्र में सही खेल चुन लेना ही आधी जीत है — और ड्रैगन बोट जैसी टीम स्पर्धा में तो ये बात और भी ज्यादा लागू होती है।
आगे की राह: जूनियर से सीनियर तक का सफर
अब सवाल ये है कि इन जूनियर खिलाड़ियों का अगला लक्ष्य क्या होगा। खेल कैलेंडर के मुताबिक अगले साल सीनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप और फिर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की बारी आएगी। कोच नितिन बिष्ट का कहना है कि इनमें से कई खिलाड़ी सीनियर वर्ग में भी पदक की दावेदार बन सकती हैं।
डॉ. हेमराज सिंह चौधरी ने उम्मीद जताई है कि इस सफलता के बाद राज्य में ड्रैगन बोट के लिए और केंद्र खुलेंगे। अगर कोटा, जयपुर और जोधपुर जैसे शहरों में भी वाटर स्पोर्ट्स की सुविधाएं बढ़ें, तो राजस्थान इस खेल में देश का अग्रणी राज्य बन सकता है।
फिलहाल तो जश्न का माहौल है। उदयपुर में इन बेटियों के स्वागत की तैयारियां चल रही हैं। और भलस्वा झील पर लहराई उनकी नाव की गूंज अब गोवर्धन सागर के पानी में सुनाई दे रही है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: ड्रैगन बोट रेसिंग क्या होती है? उत्तर: ये एक टीम जल-खेल है, जिसमें 20 पैडलर एक लंबी नाव में एक साथ पैडल चलाते हैं। ड्रमर गति तय करता है और स्टीयरर दिशा संभालता है। जीत उसी की होती है, जिसकी टीम का तालमेल सबसे बेहतर हो।
प्रश्न 2: राष्ट्रीय जूनियर ड्रैगन बोट चैंपियनशिप कहां हुई? उत्तर: 13वीं राष्ट्रीय जूनियर ड्रैगन बोट चैंपियनशिप 18 से 20 अक्टूबर तक दिल्ली की भलस्वा झील में आयोजित हुई, जिसमें राजस्थान की महिला टीम ने 200 और 500 मीटर में दो कांस्य पदक जीते।
प्रश्न 3: राजस्थान की टीम कहां अभ्यास करती है? उत्तर: सभी पदक विजेता खिलाड़ी उदयपुर के गोवर्धन सागर वाटर स्पोर्ट्स सेंटर में कोच नितिन बिष्ट के मार्गदर्शन में नियमित अभ्यास करती हैं।
प्रश्न 4: ड्रैगन बोट में राजस्थान का भविष्य कैसा है? उत्तर: जूनियर वर्ग में दो राष्ट्रीय कांस्य पदक इस बात के संकेत हैं कि अगले कुछ सालों में यही खिलाड़ी सीनियर वर्ग और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर सकती हैं।