बाड़मेर अनार उकठा रोग इस समय जिले के बागवानों के लिए सबसे बड़ी चिंता बन गया है। एक पौधे की पत्तियां अचानक पीली पड़ती हैं, फिर टहनियां सूखने लगती हैं और समय रहते ध्यान न दिया जाए तो पूरा पौधा खत्म हो जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआती लक्षण पहचानकर सही क्रम में उपचार करना ही बचाव है।
बाड़मेर जैसे शुष्क जिले में अनार की खेती किसानों के लिए नकदी फसल का भरोसेमंद जरिया बन रही है। कम पानी में होने वाली यह बागवानी अच्छी आमदनी देती है, इसीलिए इसका रकबा बढ़ रहा है। लेकिन बागवानी में निवेश लंबे समय तक बंधा रहता है — एक पौधा सूखा तो कई साल की देखभाल भी डूब जाती है।
बाड़मेर अनार उकठा रोग के 5 शुरुआती लक्षण
रोग की पहचान ही आधी लड़ाई है। उकठा रोग धीरे-धीरे शुरू होता है, इसलिए किसान अक्सर इसे पानी की कमी या मौसम का असर समझकर टाल देते हैं। नीचे दिए लक्षणों में से कोई भी दिखे तो पौधे को तुरंत गौर से देखें।
- पत्तियां अचानक पीली पड़ना: रोग की शुरुआत में पत्तियां अचानक पीली पड़ने लगती हैं, और यह पीलापन धीरे-धीरे पूरे पौधे पर फैलता है।
- टहनियों का सूखना: पीलापन आने के बाद टहनियां सूखने लगती हैं — पहले छोटी, फिर बड़ा हिस्सा।
- जड़ और तने के अंदर रंग बदलना: जड़ों और तने के निचले हिस्से को बीच से काटने पर अंदर की लकड़ी हल्की भूरी या काली दिखे तो यह रोग की पक्की निशानी है।
- पानी देने पर भी मुरझाना: पानी मिलने के बावजूद पौधा मुरझाया लगे तो समझिए जड़ों से पानी ऊपर तक नहीं पहुंच पा रहा है।
- पूरा पौधा सूखना: संक्रमण गंभीर होने पर पूरा पौधा सूख सकता है, और तब उसे बचाना लगभग असंभव हो जाता है।
उकठा रोग के पीछे कौन से फफूंद जिम्मेदार हैं
कृषि विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप पगारिया के अनुसार, उकठा रोग की वास्तविक वजह जानने के लिए सिर्फ बाहरी लक्षणों पर भरोसा करना ठीक नहीं है। अलग-अलग फफूंद के लक्षण बाहर से एक जैसे दिख सकते हैं, लेकिन उपचार अलग होता है — इसीलिए प्रयोगशाला जांच जरूरी है।
जानकारी के अनुसार, Ceratocystis fimbriata के संक्रमण में तने और जड़ों के अंदर गहरा भूरा या काला रंग दिखता है। वहीं, Fusarium के संक्रमण में जाइलम भूरा होता है। जाइलम वह भीतरी तंत्र है जो जड़ों से पानी ऊपर तक पहुंचाता है — इसके खराब होने पर पौधा पानी मिलने के बावजूद सूखने लगता है। इसीलिए सही पहचान के बाद ही उपचार अपनाएं।
संक्रमित पौधा दिखते ही सबसे पहले ये 3 काम करें
दवा डालने से पहले बाग को और संक्रमण से बचाना सबसे अहम है। प्रभावित पौधों को तुरंत उखाड़कर निस्तारित करें। उखाड़ते समय संक्रमित जड़ों और आसपास की मिट्टी को बोरे या पॉलीथिन बैग में भरकर बगीचे से बाहर निकालें।
दूसरा काम है आसपास के पौधों की निगरानी बढ़ाना — उन्हें हर कुछ दिन में देखें, ताकि नया लक्षण दिखते ही कार्रवाई हो सके। तीसरा काम है औजारों की सफाई — संक्रमित पौधे पर इस्तेमाल किए गए खुरपी या कैंची को बिना साफ किए स्वस्थ पौधों पर इस्तेमाल न करें। और हां, संक्रमित पौधा हटाने के बाद उसी जगह नया पौधा लगाने में जल्दबाजी न करें — पहले मिट्टी का उपचार करें।
बाड़मेर अनार उकठा रोग का उपचार शेड्यूल: रासायनिक से जैविक तक
रोग नियंत्रण के लिए विशेषज्ञों ने एक क्रमबद्ध उपचार बताया है — रासायनिक फफूंदनाशक से शुरुआत, फिर जैविक उपचार से पौधे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना।
| चरण | उपचार | मात्रा और तरीका | अंतराल |
|---|---|---|---|
| 1. फफूंदनाशक ड्रेंचिंग | प्रोपीकोनाजोल 25 ईसी | 20 मिलीलीटर दवा, 10 लीटर पानी में मिलाकर प्रभावित और आसपास के पौधों की जड़ों में डालें | 20-20 दिन के अंतराल पर 3 से 5 बार |
| 2. जैविक उपचार | कालीसेना (ट्राइकोडर्मा) | 5 ग्राम कालीसेना, 2 किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाकर 15 दिन छायादार स्थान पर रखें, फिर प्रति पौधे की जड़ों में डालें | रासायनिक उपचार के 30 दिन बाद |
| 3. जड़ विकास | माइकोराइजा (जोश सुपर 100 ग्राम या जोश अल्ट्रा 20 ग्राम) | 2 किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाकर 15 दिन तैयार करें, फिर जड़ों में डालें | कालीसेना उपचार के 30 दिन बाद |
यह क्रम इसलिए अहम है क्योंकि रासायनिक दवा के तुरंत बाद जैविक जीवाणु डालने से वे असर नहीं दिखा पाते। 30-30 दिन का अंतराल दोनों को अपना काम करने का मौका देता है।
पानी और मिट्टी का प्रबंधन: रोग को पनपने से रोकें
अनार के बगीचों में ड्रिप सिंचाई का उचित उपयोग और मिट्टी की नमी का नियमित आकलन जरूरी बताया गया है। जरूरत से ज्यादा पानी देने से बचें, क्योंकि अत्यधिक नमी में फफूंद पनपने की अनुकूल परिस्थितियां बन जाती हैं। बाड़मेर जैसे इलाके में ड्रिप प्रणाली दोहरा फायदा देती है — पानी की बचत भी, और जड़ों के आसपास नमी का संतुलन भी।
मिट्टी की सेहत भी रोग से लड़ने में बड़ी भूमिका निभाती है — स्वस्थ मिट्टी वाले बाग में पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है। यही अनुभव जालोर के बागवानों का भी रहा है — जैविक अनार की खेती से सालाना 60-70 लाख कमाने वाले जालोर के किसान ने मिट्टी में कार्बन बढ़ाकर ही लागत आधी की थी। फसल बीमा भी सुरक्षा कवच है — हाल ही में प्रदेश में 345 करोड़ रुपये के फसल बीमा क्लेम का भुगतान हुआ था।
कब विशेषज्ञ से संपर्क करें: देर करना महंगा पड़ेगा
डॉ. पगारिया ने सलाह दी है कि किसी भी पौधे की पत्तियां अचानक पीली पड़ने या तना और जड़ सूखने के लक्षण दिखते ही कृषि विशेषज्ञों से संपर्क करें। बाड़मेर अनार उकठा रोग का सबसे बड़ा दुश्मन देरी है — शुरुआती लक्षण दिखते ही पौधे को अलग करना, निगरानी और सही क्रम में उपचार, ये तीन कदम पूरा बाग बचा सकते हैं।
स्रोत: अमर उजाला, बाड़मेर। मूल खबर यहां पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सवाल: अनार में उकठा रोग का पहला लक्षण क्या होता है?
जवाब: रोग की शुरुआत में पत्तियां अचानक पीली पड़ने लगती हैं और टहनियां सूखने लगती हैं। जड़ों और तने के अंदर की लकड़ी का भूरा या काला पड़ना भी इसकी पहचान है।
सवाल: उकठा रोग के लिए कौन सी फफूंदनाशक दवा इस्तेमाल करें?
जवाब: विशेषज्ञों के अनुसार प्रोपीकोनाजोल 25 ईसी की 20 मिलीलीटर मात्रा को 10 लीटर पानी में मिलाकर जड़ों में डालें। इसे 20-20 दिन के अंतराल पर 3 से 5 बार दोहराएं।
सवाल: संक्रमित पौधे का क्या करें?
जवाब: प्रभावित पौधे को तुरंत उखाड़कर उसकी जड़ों और आसपास की मिट्टी को बोरे या पॉलीथिन बैग में भरकर बगीचे से बाहर निकाल दें। उसी जगह नया पौधा लगाने से पहले मिट्टी का उपचार करें।
सवाल: रासायनिक उपचार के बाद जैविक उपचार कब करें?
जवाब: रासायनिक उपचार के 30 दिन बाद कालीसेना डालें और उसके 30 दिन बाद माइकोराइजा। इससे जड़ों का विकास और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।