रेगिस्तान में पानी पहुंच गया है — और ये अपने आप में एक खुशखबरी है। लेकिन इसी खुशखबरी के साथ एक कहानी भी छिपी है, जिस पर आज तक किसी ने ठीक से ध्यान नहीं दिया। नहरों का पानी थार के रेतीले मैदानों को हरा कर रहा है, किसान नई-नई फसलें उगा रहे हैं। मगर इसी बीच थार के प्राकृतिक चरागाह — वे सेवन के मैदान जहां सदियों से मारवाड़ के पशुधन ने अपना जीवन पाला है — तेज़ी से गायब होते जा रहे हैं। यही थार चरागाह संकट है: एक तरफ समृद्धि की हरी लहर, दूसरी तरफ एक पारंपरिक व्यवस्था का धीमा पतन।
थार चरागाह संकट: मारवाड़ के पशुधन पर मंडराता खतरा
थार चरागाह संकट का सबसे गहरा असर वहां पड़ा है, जो इस जमीन का असली चेहरा रहा है — पशुपालन। थार की कठोर जलवायु के हिसाब से जो वनस्पतियां बनीं — सेवन, खेजड़ी, रोहिड़ा, कुमट, केर, फोग, आक, बेर, धामण और खींप — ये एक पूरी अर्थव्यवस्था का आधार थीं। सेवन के प्राकृतिक चरागाह पशुपालन के लिए खास महत्व रखते हैं। इन मैदानों में चरकर ही मारवाड़ का पशुधन अपनी नस्ल के लिए देश-दुनिया में पहचान बना पाया।
लेकिन अब खेती के विस्तार से इन डुन चरागाहों का उपयोग बदल रहा है। कई जगह चरागाहों की जमीन ही कृषि क्षेत्र में तब्दील हो गई है। प्राकृतिक चरागाहों के सिमटने से पशुओं का पारंपरिक चारा कम हो रहा है, और इसका सीधा असर पशुधन की संख्या पर दिखने लगा है। जहां पीढ़ियों से पशुपालन ही आजीविका का मुख्य सहारा रहा, वहां चारागाहों का सिकुड़ना सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं — ये हजारों पशुपालक परिवारों के भविष्य का सवाल है।
सरकार की मंगला पशु बीमा योजना का असली फायदा तभी है, जब पशुओं के लिए चारा और चरागाह की व्यवस्था बनी रहे।
बाजरे से अनार-जीरे तक: थार की खेती का बदला चेहरा
पानी ने थार की खेती का पूरा नक्शा ही बदल दिया है। पंजाब के हरिके बैराज से निकलने वाली इंदिरा गांधी नहर राजस्थान में प्रवेश कर पश्चिमी जिलों तक पहुंचती है, और रेगिस्तान के कई हिस्सों में अब हरियाली नजर आती है। कभी वर्षा आधारित खेती में बाजरा, मूंग, मोठ, ग्वार और तिल ही यहां की पहचान थे। आज तस्वीर बिल्कुल अलग है।
अब उसी जमीन पर गेहूं, सरसों, चना, जीरा, इसबगोल, मूंगफली, कपास और अरंडी की खेती हो रही है। सिंचित क्षेत्रों में सब्जियों के साथ-साथ अनार, खजूर, अंजीर और अमरूद की बागवानी भी बढ़ रही है। ये निस्संदेह एक आर्थिक क्रांति है — लेकिन ये क्रांति एक कीमत पर आई है, और वो कीमत चुकाई जा रही है थार चरागाह संकट के रूप में।
इंदिरा गांधी नहर से जुड़ी बड़ी सिंचाई योजनाओं के बारे में पढ़ें: IGNP पर 1,274 करोड़ का पानी-खजाना।
थार चरागाह संकट: एक नज़र में (डेटा तालिका)
| पहलू | पहले की तस्वीर | अब की तस्वीर |
|---|---|---|
| मुख्य फसलें | बाजरा, मूंग, मोठ, ग्वार, तिल | गेहूं, सरसों, चना, जीरा, इसबगोल |
| बागवानी | लगभग न के बराबर | अनार, खजूर, अंजीर, किन्नू, आंवला, अमरूद |
| चरागाह | विस्तृत सेवन मैदान | सिकुड़े चरागाह, कृषि भूमि में तब्दील |
| पशुधन | मजबूत नस्लें, बड़ी संख्या | घटती संख्या, चारे की किल्लत |
| वनस्पति | खेजड़ी, रोहिड़ा, केर, फोग | विलायती बबूल का फैलाव बढ़ा |
बबूल, लवणीयता और जलभराव: थार चरागाह संकट के दूसरे खतरे
थार चरागाह संकट सिर्फ चरागाहों के कृषि भूमि में बदलने की कहानी नहीं है। खेती के विस्तार के साथ जैसलमेर सहित पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्सों में विलायती बबूल का फैलाव भी बढ़ रहा है। ये बबूल जहां घना होता है, वहां स्थानीय वनस्पतियों के लिए जगह कम हो जाती है — खेजड़ी और सेवन जैसी पारंपरिक वनस्पतियों को ये दबाता चला जा रहा है।
इसके अलावा सिंचाई वाले कुछ क्षेत्रों में जलभराव और मिट्टी में लवणीयता की समस्या भी सामने आ रही है। जिस पानी ने रेगिस्तान को हराया, वही पानी बिना योजना के इस्तेमाल हुआ तो जमीन को नुकसान पहुंचा सकता है।
सिंचाई पानी को लेकर किसानों का संघर्ष पहले भी सुर्खियों में रहा — खाजूवाला से जैसलमेर तक सिंचाई पानी का संग्राम याद कीजिए, जब चक्काजाम के बीच किसान पानी के हक की लड़ाई लड़ रहे थे।
थार चरागाह संकट से संतुलन कैसे बचे?
ये सवाल सिर्फ पर्यावरणविदों का नहीं है, ये हर उस किसान और पशुपालक का है जो थार की जमीन से जुड़ा है। संतुलन बचाने के लिए कुछ कदम ज़रूरी हैं:
- चरागाहों का संरक्षण: बचे हुए प्राकृतिक चरागाहों की पहचान करके उन्हें संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए, ताकि खेती के विस्तार में ये पूरी तरह खत्म न हों।
- एकीकृत कृषि-पशुपालन मॉडल: फसलों के साथ चारे की फसलें (ज्वार, बरसीम) उगाने को बढ़ावा दिया जाए, ताकि पशुओं का चारा खेत से ही मिल सके।
- बबूल पर नियंत्रण: विलायती बबूल के फैलाव को रोकने के लिए लक्षित अभियान चलाया जाए और स्थानीय वनस्पतियों के पुनर्रोपण को प्रोत्साहन मिले।
- स्मार्ट सिंचाई: जलभराव और लवणीयता से बचने के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकें अपनाई जाएं, खासकर नई बागवानी वाले क्षेत्रों में।
थार की कहानी हमेशा से पानी के इर्द-गिर्द घूमी है। पहले पानी की कमी ने यहां की जिंदगी को आकार दिया, अब पानी की उपलब्धता आकार बदल रही है। थार चरागाह संकट का जवाब जितनी जल्दी मिलेगा, उतना ही मारवाड़ के पशुपालकों के लिए बेहतर होगा।
स्रोत: पत्रिका — थार में पानी आने से लहलहाए खेत, लेकिन गायब हो रहे चरागाह
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. थार चरागाह संकट क्या है?
नहरी पानी से खेती-बागवानी फैलने के कारण थार के प्राकृतिक चरागाह (खासकर सेवन के मैदान) का सिमटना और कृषि भूमि में तब्दील होना, जिससे पशुओं का पारंपरिक चारा घट रहा है।
2. चरागाह घटने से पशुधन पर क्या असर पड़ रहा है?
पशुओं को मिलने वाला पारंपरिक चारा कम हो रहा है। इसका असर मारवाड़ के पशुधन की संख्या पर दिख रहा है, जो अपनी नस्ल के लिए देश-दुनिया में जाना जाता है।
3. नहरी पानी से थार की खेती में क्या बदलाव आया है?
पहले बाजरा, मूंग, मोठ, ग्वार, तिल जैसी वर्षा आधारित फसलें होती थीं। अब गेहूं, सरसों, चना, जीरा, इसबगोल के साथ अनार, खजूर, अंजीर और अमरूद की बागवानी भी बढ़ रही है।
4. विलायती बबूल क्यों खतरा है?
विलायती बबूल के फैलाव से स्थानीय वनस्पतियों (खेजड़ी, सेवन, रोहिड़ा) की जगह कम हो रही है। जैसलमेर सहित पश्चिमी राजस्थान में इसका फैलाव बढ़ा है।