पश्चिमी राजस्थान के पशुपालक आज जिस हालत से गुजर रहे हैं, वह किसी के भी कलेजे को कांपने वाली है — चारा 20 रुपये किलो हो गया है, और जैसलमेर में हजारों गायों के मरने का दावा किया जा रहा है। यही राजस्थान सूखा संकट अब राज्य की सियासत का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है। रविवार, 18 अक्टूबर को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जैसलमेर दौरे पर रवाना होने से पहले जयपुर स्थित अपने निवास पर मीडिया से कहा कि सूखा इतना गंभीर हो चुका है कि मुख्यमंत्री स्तर पर तत्काल निगरानी और ठोस कदम न उठे, तो पूरे प्रदेश को भारी त्रासदी झेलनी पड़ेगी।
जैसलमेर से बीकानेर तक — राजस्थान सूखा संकट का भयावह नक्शा
गहलोत ने बताया कि उन्होंने हाल ही में बीकानेर का दौरा किया, जहां हालात बेहद गंभीर हैं। जैसलमेर, बाड़मेर और जोधपुर जैसे पश्चिमी जिलों में सूखे का प्रकोप चरम पर है। उनके शब्दों में, “राजस्थान इकलौता ऐसा राज्य है, जहां सरकार को अभी तक यह भी नहीं पता कि गांवों में सूखा कितना गंभीर है।”
यह दावा महज आरोप नहीं — पहले ही प्रदेश के 41 में से 31 जिलों में चारे-पानी की स्थिति चिंताजनक बताई जा चुकी है (31 जिले अलर्ट पर), और बांधों में जलस्तर पिछले साल से काफी नीचे है (बांधों में घटा जलस्तर)। कम बारिश से पूरे उत्तर भारत में पानी का संकट गहरा गया है।
| जिला/क्षेत्र | हालत (गहलोत के दावे और ताजा रिपोर्टों के आधार पर) |
|---|---|
| जैसलमेर | चारे-पानी की किल्लत से हजारों गायों की मौत का दावा, सबसे गंभीर स्थिति |
| बाड़मेर | सूखे का प्रकोप चरम पर, ग्रामीण इलाकों में पानी की भारी किल्लत |
| जोधपुर | पश्चिमी जिले में हालात खराब, चारा संकट बढ़ा |
| बीकानेर | गहलोत ने खुद दौरा किया, हालात “बेहद गंभीर” बताए |
| प्रदेश भर में 31 जिले | चारे-पानी की स्थिति चिंताजनक, सरकार की ओर से अलर्ट जारी |
चारा 20 रुपये किलो — राजस्थान सूखा संकट में पशुधन पर सबसे बड़ा खतरा
प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबसे चिंताजनक बात चारे की कीमतों को लेकर सामने आई — 20 रुपये प्रति किलो के स्तर पर पहुंचे दाम, और सरकार की तरफ से कोई समुचित प्रबंधन नहीं। “चारे का प्रबंधन एक बड़ी चिंता है और मवेशी मरने लगे हैं,” गहलोत ने कहा।
जैसलमेर के पूर्व विधायक से हुई बातचीत का हवाला देते हुए गहलोत ने दावा किया कि वहां हजारों गायें काल का ग्रास बन चुकी हैं — यही पश्चिमी राजस्थान है, जहां गोवंश पर सूखे की सबसे ज्यादा मार पहले भी पड़ती रही है (पश्चिमी राजस्थान में सूखे से जूझता गोवंश)। बारिश कम होने से बांध नहीं भरे और ग्रामीण इलाकों में पानी के लिए हाहाकार है।
जो किसान पहले से सूखे से जूझ रहे हैं, उन्हें अब अपने पशुओं को बचाने के लिए महंगा चारा खरीदना पड़ रहा है — ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले पशुधन पर यह दोहरी मार है।
“16 अगस्त से राहत कार्य” — गहलोत ने अपने शासन का इतिहास याद दिलाया
गहलोत ने अपने पुराने कार्यकाल की याद दिलाते हुए कहा, “एक बार ऐसी स्थिति आई थी, जब हमने 16 अगस्त से ही राहत कार्य शुरू कर दिया था। ग्रामीणों को आज भी याद है कि हमारी सरकार ने 16 अगस्त से काम शुरू कराया था।” उनके मुताबिक 16 अगस्त से काम शुरू करने का मतलब करीब 10-11 महीने तक निरंतर राहत कार्य चलाना होता है, जो कोई छोटी बात नहीं है।
उन्होंने बताया कि उस समय उन्होंने केंद्र से मदद ली थी — तब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और गहलोत “काम के बदले अनाज” योजना लेकर आए थे। इस इतिहास को याद दिलाने का मकसद साफ था: राहत कार्यों में देरी के लिए मौजूदा सरकार को घेरना।
केंद्र से मदद की मांग — “डबल इंजन की सरकार है, तो केंद्र से बात क्यों नहीं?”
गहलोत ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि वह सूखे और चारे की कमी को दूर करने के लिए केंद्र सरकार से मदद मांगे। कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा, “यह तो डबल इंजन की सरकार है, फिर वे केंद्र से बात क्यों नहीं करते? उस समय हम भी केंद्र से मदद लेकर आए थे।”
उनका तर्क था कि भाजपा शासित अन्य राज्यों में भी आपदाओं के दौरान मुख्यमंत्रियों ने ग्राउंड जीरो पर दौरे शुरू किए और राज्य स्तर पर निरंतर निगरानी हो रही है। इसके उलट राजस्थान में सरकार स्थिति की गंभीरता से अनजान बनी है। उनकी चेतावनी: अगर मुख्यमंत्री स्तर पर निगरानी सुनिश्चित नहीं हुई, तो पूरे राज्य के लोगों को भुगतना पड़ेगा।
मदन राठौड़ से माफी की मांग और स्थानीय निकाय चुनावों पर आरोप
सूखे के मुद्दे के साथ-साथ गहलोत ने दो और सियासी मुद्दे उठाए। पहला — भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के उस विवादित बयान का मामला, जिसमें पाकिस्तान का जिक्र आया था (पृष्ठभूमि यहां)। गहलोत ने कहा, “मदन राठौड़ को बिना किसी ‘अगर-मगर’ के ईमानदारी से खेद जताना चाहिए।”
उनके तीखे शब्द थे: “वे मीडिया के सामने जितनी ज्यादा सफाई देने की कोशिश कर रहे हैं, उतनी ही गहरी अपनी कब्र खोदते जा रहे हैं। पाकिस्तान का जिक्र आते ही जनता में इतना गहरा आक्रोश पैदा हो जाता है कि भाजपा इसे संभाल नहीं पाएगी, जब तक राठौड़ स्पष्ट रूप से माफी नहीं मांगते।”
दूसरा मुद्दा स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़ा था — गहलोत ने इन चुनावों में अनियमितताओं और पुलिस द्वारा धमकाने के आरोप लगाए।
आगे क्या — पशुपालकों और किसानों के लिए इसका क्या मतलब है?
राजस्थान सूखा संकट अब सिर्फ मौसम की खबर नहीं; यह आजीविका, राजनीति और प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल बन चुका है। गहलोत ने तीन स्पष्ट मांगें रखीं: (1) केंद्र से तत्काल मदद मांगी जाए, (2) मुख्यमंत्री स्तर पर सख्त मॉनिटरिंग शुरू हो, और (3) चारे का समुचित प्रबंधन किया जाए।
अब नजरें भजनलाल सरकार की प्रतिक्रिया पर हैं — क्या सूखे को लेकर कोई बड़ी घोषणा होगी? क्या चारे के दामों पर नियंत्रण के कदम उठेंगे? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में प्रदेश की सियासत और लाखों पशुपालकों की जिंदगी — दोनों को तय करेंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: अशोक गहलोत ने 18 अक्टूबर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्या कहा? उत्तर: गहलोत ने कहा कि राजस्थान में सूखा और अकाल गंभीर हो चुका है, लेकिन सरकार को धरातल की स्थिति का अहसास नहीं है। उन्होंने केंद्र से मदद मांगने, मुख्यमंत्री स्तर पर निगरानी और चारे के प्रबंधन की मांग की।
प्रश्न 2: राजस्थान में चारे के दाम कितने हैं और गायों की मौत का क्या दावा है? उत्तर: गहलोत के मुताबिक चारे के दाम 20 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। जैसलमेर के एक पूर्व विधायक के हवाले से उन्होंने दावा किया कि चारे-पानी की किल्लत से वहां हजारों गायें मर चुकी हैं।
प्रश्न 3: गहलोत ने मदन राठौड़ से माफी क्यों मांगी? उत्तर: भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के एक बयान में पाकिस्तान का जिक्र आया था, जिस पर विवाद हुआ। गहलोत ने कहा कि राठौड़ को बिना “अगर-मगर” के स्पष्ट रूप से खेद जताना चाहिए।
प्रश्न 4: गहलोत ने अपने शासन के राहत कार्यों का क्या उदाहरण दिया? उत्तर: उन्होंने कहा कि एक बार सूखे के दौरान उनकी सरकार ने 16 अगस्त से ही राहत कार्य शुरू कर दिया था, जो करीब 10-11 महीने चला। तब उन्होंने केंद्र से मदद लेकर “काम के बदले अनाज” योजना चलाई थी, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे।
स्रोत: IANS न्यूज एजेंसी फीड (BhaskarHindi), खास खबर — 18 अक्टूबर 2026। यह लेख कई स्रोतों के तथ्यों को मिलाकर स्वतंत्र रूप से लिखा गया है।