72 करोड़ बजट अटका: 53 हजार स्कूलों में पुराने बर्तनों में खाना

स्कूल बर्तन बजट: 17 साल पुराने बर्तनों में खा रहे हैं राजस्थान के बच्चे

सोचिए — आपके बच्चे जिस स्कूल में रोज़ दोपहर का खाना खाते हैं, वहाँ के बर्तन आखिरी बार साल 2009 में बदले गए थे। 17 साल से वही पतीले, वही चूल्हे, वही खाना परोसने के बर्तन। हाँ, यह सच्चाई है राजस्थान के 53,738 सरकारी स्कूलों की। और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि स्कूल बर्तन बजट में करीब 72 करोड़ रुपए की राशि मंज़ूर हुए अरसा बीत चुका है, फिर भी नए बर्तन बच्चों तक नहीं पहुंच पाए।

शिक्षा विभाग की ओर से बर्तन और किचन उपकरण बदलने का पूरा खाका तैयार है — किस स्कूल को कितनी राशि मिलेगी, कहाँ से खरीद होगी, सब तय। लेकिन मंत्री और अफसरों के बीच एक बुनियादी सवाल पर खींचतान ने पूरी प्रक्रिया को थाम रखा है: बर्तन स्कूल खुद खरीदेंगे या एक जगह से थोक में आएंगे? इसी बहस में 72 करोड़ का स्कूल बर्तन बजट फंसा हुआ है, और इसका सीधा असर बच्चों की थाली पर पड़ रहा है।

71 करोड़ 90 लाख का पूरा हिसाब — पैसा कहाँ से आएगा

स्कूल बर्तन बजट का अंकगणित समझ लीजिए। बर्तन और किचन उपकरण बदलने के लिए कुल 71 करोड़ 90 लाख 90 हजार रुपए का प्रावधान तय किया गया है। इसमें केंद्र सरकार का हिस्सा 43 करोड़ 14 लाख 54 हजार रुपए है और राज्य सरकार का हिस्सा 28 करोड़ 76 लाख 36 हजार रुपए। यानी पैसा केंद्र और राज्य — दोनों की ओर से उपलब्ध है, कमी कहीं नहीं।

समस्या पैसे की नहीं, खरीद के तरीके की है। विभागीय आकलन के मुताबिक जिन स्कूलों में बर्तन पांच साल या उससे अधिक पुराने हो चुके हैं, खराब चूल्हे हैं, पतीले और खाद्यान्न रखने के कंटेनर टूट चुके हैं — उन सभी को बदलना जरूरी है। इसके लिए प्रदेशभर के 53,738 स्कूलों की सूची भी तैयार कर ली गई है। बस, खरीद की हरी झंडी बाकी है।

किस स्कूल को कितनी राशि — पूरी तालिका

शिक्षा विभाग ने स्कूल बर्तन बजट का वितरण विद्यार्थियों की संख्या के हिसाब से तय किया है। बड़े स्कूल को ज़्यादा और छोटे स्कूल को कम राशि मिलेगी:

स्कूल का आकार (विद्यार्थी संख्या) स्कूलों की संख्या प्रति स्कूल राशि
50 तक विद्यार्थी 25,476 10,000 रुपए
51 से 150 विद्यार्थी 21,412 15,000 रुपए
151 से 250 विद्यार्थी 5,620 20,000 रुपए
251 या अधिक विद्यार्थी 1,230 25,000 रुपए
कुल 53,738 71.90 करोड़

आंकड़े साफ बताते हैं कि सबसे ज़्यादा फायदा छोटे स्कूलों को मिलेगा — प्रदेश के आधे से अधिक सरकारी स्कूलों में विद्यार्थी संख्या 50 से कम है, और उन्हें 10-10 हजार रुपए मिलेंगे। लेकिन जब तक खरीद प्रक्रिया शुरू नहीं होती, यह तालिका कागज़ पर ही सजी रहेगी।

मंत्री बनाम अफसर: खरीद के दो मॉडल पर रस्साकशी

स्कूल बर्तन बजट के फंसने के पीछे दो बिल्कुल अलग सोच की टकराव है। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर का रुख साफ है — बर्तन खरीद का अधिकार स्कूलों को खुद दिया जाना चाहिए, और खरीद विद्यालय विकास एवं प्रबंधन समिति (एसडीएमसी) के माध्यम से होनी चाहिए। मंत्री का तर्क है कि स्कूलों को अपनी ज़रूरत के बर्तनों की जानकारी सबसे अच्छी तरह होती है — किस स्कूल में चूल्हा टूटा है, कहाँ पतीला बदलना है, यह वहीं के शिक्षक और प्रबंधन समिति सबसे बेहतर जानती है।

वहीं, विभागीय अधिकारी केंद्रीकृत खरीद व्यवस्था के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि एक जगह से थोक खरीद से गुणवत्ता एकसमान रहेगी, दरों में एकरूपता आएगी और वित्तीय नियंत्रण बेहतर होगा। थोक में खरीदने पर कीमत भी कम पड़ेगी और हर स्कूल को एक जैसा माल मिलेगा — इस तर्क के साथ अधिकारी स्कूल-स्तरीय खरीद के विरोध में खड़े हैं।

दरअसल, यह विवाद नया नहीं है। साल 2009 में जब पिछली बार बर्तन बदले गए थे, तब भी खरीद प्रक्रिया को लेकर लंबी बहस हुई थी। लेकिन इस बार हालात ज़्यादा गंभीर हैं — 17 साल में बर्तनों की हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि कई स्कूलों में खाना बनाने और परोसने में रोज़ परेशानी होती है। बच्चों के स्वास्थ्य और स्वच्छता की दृष्टि से यह मुद्दा अब सिर्फ बजट का नहीं, जिम्मेदारी का सवाल बन चुका है।

बच्चों और अभिभावकों के लिए इसका क्या मतलब है

अगर आपके बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं, तो इस खबर का सीधा असर आप पर है। स्कूल बर्तन बजट के अटके होने का मतलब है कि स्कूलों में पोषाहार बनाने वाले बर्तन पुराने और जर्जर ही रहेंगे — जब तक खरीद शुरू नहीं होती। अभिभावक चाहें तो अपने स्कूल की एसडीएमसी बैठक में इस मुद्दे को उठा सकते हैं, क्योंकि खरीद का एक प्रस्तावित मॉडल एसडीएमसी के माध्यम से ही है।

शिक्षकों के लिए भी यह अहम है, क्योंकि स्कूल बर्तन बजट का सीधा संबंध रसोई की हालत से है। खाना बनाने वाले बर्तनों की खराब हालत में भोजन की गुणवत्ता और स्वच्छता बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। स्कूल स्तर पर बर्तनों की स्थिति का रिकॉर्ड रखना और विभाग को सूचना देना इस प्रक्रिया को तेज करने में मदद कर सकता है। याद रखिए, कुछ दिन पहले चूरू में मिड डे मील में छिपकली मिलने की घटना ने स्कूलों में बच्चों के खाने की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा किया था — बर्तनों की हालत भी इसी श्रृंखला का हिस्सा है।

स्कूल बर्तन बजट: अब आगे क्या होगा — मंत्री का बयान

शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने एसडीएमसी के माध्यम से बर्तन खरीदने के निर्देश दिए हैं। मंत्री के मुताबिक स्कूलों को अपनी ज़रूरत के बर्तनों की जानकारी होती है, इसलिए खरीद का विकेंद्रीकृत मॉडल ही सही रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि प्रक्रिया जल्द शुरू कराने के लिए अधिकारियों से बात की जाएगी।

अब सबकी नज़र इस बात पर है कि मंत्री और अफसरों के बीच की खींचतान कब सुलझती है। 71.90 करोड़ रुपए का स्कूल बर्तन बजट तैयार है, 53,738 स्कूलों की सूची तैयार है, राशि का बंटवारा भी तय है — कमी सिर्फ एक फैसले की है। अगर एसडीएमसी मॉडल पर सहमति बनती है, तो छोटे स्कूल अपनी स्थानीय ज़रूरत के हिसाब से बर्तन खरीद सकेंगे। और अगर केंद्रीकृत मॉडल अपनाया जाता है, तो थोक खरीद की प्रक्रिया अपने स्तर पर शुरू होगी।

इस बीच, सरकारी स्कूलों से जुड़े अन्य अहम फैसले भी चर्चा में हैं — जैसे स्कूलों के समय में बदलाव और शिक्षा विभाग के ताज़ा आदेश। इस बारे में राजस्थान स्कूल टाइमिंग की जानकारी भी पढ़ सकते हैं, और सरकारी स्कूलों में होने वाली भर्तियों की ताज़ा खबरों के लिए सैनिक स्कूल चित्तौड़गढ़ भर्ती देख सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1: स्कूल बर्तन बजट में कुल कितनी राशि तय की गई है? उत्तर: बर्तन और किचन उपकरण बदलने के लिए कुल 71 करोड़ 90 लाख 90 हजार रुपए का प्रावधान है, जिसमें केंद्र का हिस्सा 43 करोड़ 14 लाख 54 हजार रुपए और राज्य का हिस्सा 28 करोड़ 76 लाख 36 हजार रुपए है।

प्रश्न 2: बर्तन खरीद क्यों अटकी हुई है? उत्तर: शिक्षा मंत्री मदन दिलावर स्कूल स्तर पर एसडीएमसी के माध्यम से खरीद चाहते हैं, जबकि विभागीय अधिकारी केंद्रीकृत खरीद व्यवस्था के पक्ष में हैं। इस मतभेद के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।

प्रश्न 3: स्कूलों में बर्तन आखिरी बार कब बदले गए थे? उत्तर: राजस्थान के सरकारी स्कूलों में पोषाहार के लिए बर्तन आखिरी बार साल 2009 में बदले गए थे — यानी 17 साल पहले।

प्रश्न 4: किस स्कूल को बर्तन खरीद के लिए कितनी राशि मिलेगी? उत्तर: 50 तक विद्यार्थियों वाले 25,476 स्कूलों को 10 हजार, 51–150 विद्यार्थियों वाले 21,412 स्कूलों को 15 हजार, 151–250 विद्यार्थियों वाले 5,620 स्कूलों को 20 हजार और 251 या अधिक विद्यार्थियों वाले 1,230 स्कूलों को 25 हजार रुपए मिलेंगे।

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