पूर्वी राजस्थान के सात गांवों के किसानों के लिए एक सीधी चेतावनी जारी हुई है। जिन खेतों पर कभी उनकी फसलें लहलहाती थीं, उनमें से जिन जमीनों का अधिग्रहण ईसरदा लिंक परियोजना के लिए हो चुका है, वहां अब हल चलाना भी मना है। राजस्थान वाटर ग्रिड कॉरपोरेशन लिमिटेड ने साफ कहा है कि अवाप्त भूमि पर किसी भी तरह की खेती करने वालों के खिलाफ नियमानुसार राजकीय कार्रवाई की जाएगी। आदेश में यह भी जोड़ा गया है कि रोक सिर्फ उन किसानों पर नहीं है जिन्हें मुआवजा मिल चुका है, बल्कि जिनका मुआवजा अभी बाकी है, उन पर भी यही पाबंदी लागू होगी।
किसानों के लिए सीधा आदेश: इन कामों पर पूरी रोक
कॉरपोरेशन के ताजा निर्देशों के मुताबिक अवाप्त जमीन पर खेत तैयार करने से लेकर फसल बोने तक, खेती से जुड़ी हर गतिविधि पर पाबंदी लगा दी गई है। किसान न तो जमीन की जुताई कर सकेंगे, न खाद-बीज डाल सकेंगे और न ही कोई फसल बो सकेंगे।
आदेश में दो बातें खास तौर पर रेखांकित की गई हैं। पहली, यह रोक मुआवजा पा चुके और मुआवजा न पाने वाले दोनों तरह के भूमि हितधारियों पर एक जैसी लागू होगी। यानी मुआवजा न मिलने का हवाला देकर कोई किसान अधिग्रहित जमीन पर खेती नहीं कर सकता। दूसरी, अगर खेती करने के दौरान फीडर निर्माण के काम में जमीन को कोई नुकसान पहुंचता है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित किसान की होगी, और साथ में नियमों के तहत राजकीय कार्रवाई भी झेलनी पड़ेगी।
एक नजर में: परियोजना और आदेश के मुख्य तथ्य
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| परियोजना का नाम | नवनेरा-गलवा-बीसलपुर-ईसरदा लिंक परियोजना |
| निर्माण कार्य | नवनेरा बैराज के डिलीवरी सिस्टर्न से मेज एनीकट तक फीडर, विभिन्न संरचनाओं सहित |
| आदेश जारीकर्ता | राजस्थान वाटर ग्रिड कॉरपोरेशन लिमिटेड |
| प्रभावित गांव | गुहाटा, कोटाखुर्द, लबान, दहीखेड़ा, डपटा, रामगंज, खरायता (कुल 7 गांव) |
| प्रतिबंधित गतिविधियां | खेत तैयार करना, जुताई, खाद-बीज डालना, फसल बोना |
| मुआवजा कानून | भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 |
| मुआवजे की स्थिति | एक हिस्से का भुगतान हो चुका, शेष का भुगतान प्रक्रियाधीन |
| उल्लंघन पर परिणाम | राजकीय कार्रवाई + निर्माण में हुए नुकसान की जिम्मेदारी किसान पर |
ईसरदा लिंक परियोजना आखिर है क्या
ईसरदा लिंक परियोजना पूर्वी राजस्थान की जल योजनाओं की उस कड़ी का हिस्सा है जिसके जरिए नदियों और बैराजों का पानी जरूरत वाले इलाकों तक पहुंचाने की तैयारी है। इस परियोजना के तहत नवनेरा बैराज के डिलीवरी सिस्टर्न से मेज एनीकट तक एक फीडर का निर्माण होना है, जिसमें कई छोटी-बड़ी संरचनाएं भी शामिल हैं।
इसी फीडर के रास्ते में आने वाली जमीन का अधिग्रहण किया गया है। गुहाटा, कोटाखुर्द, लबान, दहीखेड़ा, डपटा, रामगंज और खरायता — इन सात गांवों की जमीनें इस दायरे में आती हैं। परियोजना का मकसद साफ है: क्षेत्र में सिंचाई और पेयजल की लंबे समय से चली आ रही दिक्कत को दूर करना। लेकिन निर्माण शुरू होने से पहले जमीन का पूरी तरह खाली होना जरूरी है, और इसी वजह से खेती पर यह सख्त रोक लगाई गई है।
गौरतलब है कि ईसरदा नाम से जुड़ा एक अन्य विवाद भी हाल में सुर्खियों में रहा था, जब ईसरदा से बंध बारेठा तक प्रस्तावित नहर के खिलाफ किसानों ने विरोध जताया था। वह मामला अलग प्रस्तावित नहर से जुड़ा था, जबकि ताजा आदेश लिंक फीडर के निर्माण से संबंधित है।
मुआवजे का हिसाब: 2013 के कानून के तहत भुगतान
जमीन देने वाले किसानों के मन में सबसे बड़ा सवाल मुआवजे को लेकर होता है। कॉरपोरेशन के मुताबिक प्रभावित भूमि का मुआवजा भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के अनुसार दिया जा चुका है। जिन हितधारियों का मुआवजा अभी बाकी है, उनके भुगतान की प्रक्रिया चल रही है।
यहां समझने वाली बात यह है कि कानून के तहत जमीन का अधिग्रहण पूरा होते ही उस पर सरकार का कब्जा माना जाता है, चाहे मुआवजे की रकम खाते में आई हो या प्रक्रिया में हो। इसीलिए कॉरपोरेशन ने दोनों श्रेणियों के किसानों पर एक जैसी रोक लगाई है। मुआवजा न मिलना खेती जारी रखने का आधार नहीं बन सकता, क्योंकि अधिग्रहण की कानूनी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।
ईसरदा लिंक परियोजना से जुड़े किसानों के लिए जरूरी सलाह
अगर आपकी जमीन इन सात गांवों में से किसी में आती है और उसका अधिग्रहण हो चुका है, तो इन बातों का ध्यान रखें:
क्या न करें: अवाप्त जमीन पर जुताई, बुवाई या किसी भी तरह की खेती न करें। रबी सीजन की तैयारियों में भी इस जमीन को शामिल न करें — भले ही रबी बुवाई का समय नजदीक हो, अधिग्रहित खेत में बीज डालना सीधे कार्रवाई को न्योता देगा। खाद-बीज पर खर्च किया पैसा भी डूब सकता है।
क्या करें: अगर आपका मुआवजा अभी तक नहीं मिला है तो संबंधित तहसील या कॉरपोरेशन के कार्यालय में लिखित में अपना दावा दर्ज कराएं और पावती जरूर लें। जमीन से जुड़े सभी कागजात — खतौनी, अधिग्रहण सूचना और मुआवजे से जुड़े पत्र — संभालकर रखें। किसी भी विवाद की स्थिति में स्थानीय प्रशासन से लिखित आदेश या स्पष्टीकरण मांगें, मौखिक आश्वासन पर भरोसा न करें।
वैकल्पिक व्यवस्था: जिन किसानों के पास अधिग्रहण के बाद खेती योग्य जमीन नहीं बची है, वे रबी सीजन के लिए उपलब्ध सरकारी सहायता और योजनाओं की जानकारी कृषि विभाग के स्थानीय कार्यालय से ले सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1: किन गांवों की जमीन पर खेती की रोक लगी है?
उत्तर: गुहाटा, कोटाखुर्द, लबान, दहीखेड़ा, डपटा, रामगंज और खरायता — इन सात गांवों में परियोजना के लिए अवाप्त भूमि पर खेती, जुताई और बुवाई पर पूरी रोक है।
प्रश्न 2: जिन किसानों को मुआवजा नहीं मिला, क्या वे खेती कर सकते हैं?
उत्तर: नहीं। कॉरपोरेशन के आदेश के मुताबिक मुआवजा पाने वाले और न पाने वाले दोनों तरह के हितधारियों पर रोक एक जैसी लागू होगी। मुआवजे का बकाया होना खेती का आधार नहीं बनेगा।
प्रश्न 3: रोक तोड़ने पर क्या कार्रवाई होगी?
उत्तर: नियमानुसार राजकीय कार्रवाई की जाएगी। साथ ही अगर खेती के दौरान निर्माण कार्य के लिए जमीन को कोई नुकसान पहुंचता है तो उसकी जिम्मेदारी भी संबंधित किसान पर डाली जाएगी।
प्रश्न 4: ईसरदा लिंक परियोजना का निर्माण कब तक चलेगा?
उत्तर: परियोजना के तहत नवनेरा बैराज के डिलीवरी सिस्टर्न से मेज एनीकट तक फीडर का निर्माण प्रस्तावित है। निर्माण की समय-सीमा की आधिकारिक घोषणा कॉरपोरेशन की ओर से की जाएगी।
निष्कर्ष
ईसरदा लिंक परियोजना का ताजा आदेश साफ संदेश देता है — अधिग्रहित जमीन अब किसानों के हल के लिए नहीं, निर्माण मशीनों के लिए खाली रहनी चाहिए। सात गांवों के प्रभावित किसान रबी सीजन से पहले इस आदेश को गंभीरता से लें, क्योंकि उल्लंघन पर कार्रवाई के साथ-साथ नुकसान की भरपाई का बोझ भी उन्हीं पर पड़ेगा। मुआवजे से जुड़े दावों को लिखित में आगे बढ़ाना ही फिलहाल सबसे सुरक्षित रास्ता है।
स्रोत: दैनिक नवज्योति (राइजिंग राजस्थान), 23 अक्टूबर 2026