कोटा के सरकारी MBS अस्पताल में महंगे इंजेक्शनों का गड़बड़झाला: बुजुर्ग के नाम पर जारी हुई दवा, मरीज कभी भर्ती ही नहीं हुईं

गरीब मरीजों के लिए सरकार हर साल करोड़ों रुपए की मुफ्त दवाएं अस्पतालों को भेजती है, ताकि पैसे की कमी से किसी का इलाज न रुके। लेकिन कोटा एमबीएस अस्पताल में सामने आए ताजा मामले ने इसी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि अस्पताल से करीब आधा दर्जन महंगे ह्यूमन एल्बुमिन इंजेक्शन एक 86 वर्षीय बुजुर्ग महिला के नाम पर जारी कर दिए गए — जबकि वह महिला अस्पताल में कभी भर्ती ही नहीं हुईं।

महिला अपने घर पर आराम करती मिलीं, जबकि अस्पताल के कागजों में वह अब भी भर्ती दिखाई जा रही हैं। प्रबंधन ने पांच सदस्यीय जांच कमेटी गठित कर दी है और रिपोर्ट के बाद मुकदमा दर्ज कराने की बात कही है।

ओपीडी पर्ची से इंजेक्शन तक: खेल कैसे रचा गया

मामले की शुरुआत 10 सितंबर से जुड़ी है। अधीक्षक डॉ. राकेश कुमार सिंह के मुताबिक, नयापुरा इलाके की एक महिला के नाम आधार कार्ड से ओपीडी पर्ची बनाई गई और उसी दिन उसे भर्ती दिखा दिया गया। फिर उसी के नाम पर लगातार करीब आधा दर्जन एल्बुमिन इंजेक्शन जारी हो गए। इन पर्चों की प्रतियां डीडीसी काउंटर पर भी मौजूद बताई जा रही हैं।

लेकिन यह मरीज अस्पताल के किसी वार्ड में थी ही नहीं। भास्कर के रिपोर्टर ने गुरुवार को वार्ड में पड़ताल की — वहां महिला नहीं मिलीं। इसके बाद रिपोर्टर उनके घर पहुंचा, जहां 86 वर्षीय रामकन्या देवी आराम करती मिलीं। उन्होंने बताया कि वह स्वस्थ हैं और कभी अस्पताल में भर्ती नहीं हुईं।

प्रबंधन का कहना है कि यह काम किसी मेडिकल जानकार का ही है — भर्ती की पर्ची पूरी तरह मेडिकल भाषा में लिखी थी। जिन पर्चों पर इंजेक्शन मांगे गए, वहां चिकित्सकों की सील-साइन थे, लेकिन संबंधित चिकित्सकों ने अपने हस्ताक्षर से इनकार कर दिया है।

ह्यूमन एल्बुमिन इंजेक्शन: इतना कीमती क्यों है

यह समझना जरूरी है कि यह इंजेक्शन आखिर है क्या:

पहलू जानकारी
बाजार कीमत प्रति इंजेक्शन करीब 5 से 6 हजार रुपए
अस्पताल को सप्लाई राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन (RMSC) से निशुल्क
निर्माण स्वस्थ व्यक्ति के रक्त प्लाज्मा से तैयार चिकित्सकीय उत्पाद
उपयोग शरीर में रक्त और प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने के लिए
किन स्थितियों में किडनी व लीवर रोग, बर्न केस, ब्लीडिंग रोकने, गंभीर जलन, कुपोषण

यानी खुले बाजार में पांच-छह हजार का बिकने वाला इंजेक्शन सरकारी योजना में मरीज को मुफ्त मिलना चाहिए। अगर आधा दर्जन इंजेक्शन गलत तरीके से जारी हुए, तो नुकसान सरकारी खजाने के साथ उन जरूरतमंद मरीजों का भी हुआ, जिन्हें यह दवा असल में चाहिए थी।

दूसरा मामला: पुलिसकर्मी का फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट

इंजेक्शन प्रकरण के साथ कोटा एमबीएस अस्पताल में ही एक और गड़बड़ी सामने आई है। एक प्रोफेसर के फर्जी साइन और सील से एक पुलिसकर्मी का मेडिकल सर्टिफिकेट बना दिया गया। यह सर्टिफिकेट 45 दिन से ज्यादा अवधि का था, इसलिए जांच के लिए अस्पताल पहुंचा — तभी खुलासा हुआ कि यह फर्जी है।

संबंधित चिकित्सक ने प्रबंधन को पत्र लिखा है। प्रबंधन का कहना है कि यह चिकित्सक की निजी सील थी, इसलिए मुकदमा दर्ज हो सकता है। फिलहाल जांच जारी है कि यह गड़बड़झाला किसने किया।

कोटा एमबीएस अस्पताल में जांच कहां पहुंची

मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. नीलेश जैन ने पांच सदस्यीय कमेटी बनाई है — इसमें मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. निर्मल शर्मा, उप अधीक्षक डॉ. करनेश गोयल, निशुल्क दवाई योजना के प्रभारी डॉ. जितेंद्र नामा, रिकॉर्ड रूम प्रभारी डॉ. प्रदीप फौजदार और नर्सिंग अधीक्षक सत्यनारायण मीणा शामिल हैं।

अधीक्षक डॉ. राकेश कुमार सिंह के अनुसार सीसीटीवी फुटेज से एक संदिग्ध की पहचान हुई है और तहकीकात जारी है। कमेटी की रिपोर्ट के बाद मुकदमा दर्ज होगा, जिसके बाद पुलिस पूरा खुलासा करेगी।

प्रबंधन को शक है कि महिला का कोई रिश्तेदार भी इसमें शामिल हो सकता है, क्योंकि भर्ती का कागज उनके आधार कार्ड से ही बना था। सिस्टम में वह आज भी भर्ती दिख रही हैं, जबकि अधीक्षक ने कहा कि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

कोटा एमबीएस अस्पताल मामला क्यों गंभीर है

मुख्यमंत्री निशुल्क दवाई योजना का मकसद साफ है — गरीब और जरूरतमंद मरीजों को महंगी दवाएं मुफ्त मिलें। जब ऐसी योजना की दवाएं कागजों में हेराफेरी से गायब होती हैं, तो सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं मरीजों का होता है जिन्हें दवा असल में चाहिए थी।

यह पहला मौका नहीं है जब सरकारी दवाओं पर सवाल उठे हैं — इससे पहले भी सरकारी दवाओं की कालाबाजारी के मामले सामने आ चुके हैं। सरकार एक तरफ घर बैठे मरीजों तक इलाज पहुंचाने जैसी योजनाएं चला रही है, वहीं कोटा के अस्पतालों में हाल के महीनों में प्रसूता मौत जैसे विवाद भी चर्चा में रहे हैं। हाल ही में जयपुर के SMS अस्पताल में स्क्रब टाइफस को लेकर भी स्वास्थ्य विभाग अलर्ट पर रहा है। ऐसे में यह नया मामला अस्पतालों की निगरानी व्यवस्था पर फिर सवाल खड़े करता है।

एक बात साफ रहे — फिलहाल ये आरोप हैं। स्वतंत्र जांच और प्रशासन का विस्तृत पक्ष अभी सामने आना बाकी है, और निष्पक्ष जांच से ही पता चलेगा कि यह प्रशासनिक चूक थी या जानबूझकर की गई गड़बड़ी।

मरीज के तौर पर आप क्या कर सकते हैं

इलाज का रिकॉर्ड जांचें: भर्ती होने पर डिस्चार्ज के समय दी गई दवाओं की सूची और पर्ची का मिलान जरूर करें।

आधार की कॉपी संभालकर दें: आधार की फोटो कॉपी पर तारीख और उद्देश्य लिख दें, ताकि गलत इस्तेमाल न हो।

शिकायत का रास्ता अपनाएं: नाम पर गलत एंट्री लगे तो राजस्थान संपर्क पोर्टल (sampark.rajasthan.gov.in) या हेल्पलाइन 181 पर शिकायत दर्ज कराएं।

योजना की जानकारी रखें: निशुल्क दवाई योजना की दवाएं अस्पताल के डीडीसी काउंटर से ही लें और पर्ची संभालकर रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न: ह्यूमन एल्बुमिन इंजेक्शन किस काम आता है?

उत्तर: यह शरीर में रक्त और प्रोटीन की मात्रा बढ़ाता है। किडनी व लीवर रोग, बर्न केस, ब्लीडिंग, गंभीर जलन और कुपोषण में डॉक्टर की सलाह पर दिया जाता है।

प्रश्न: कोटा एमबीएस अस्पताल में फर्जीवाड़े का खुलासा कैसे हुआ?

उत्तर: मीडिया की ग्राउंड पड़ताल में पता चला कि जिन 86 वर्षीय महिला के नाम पर इंजेक्शन जारी हुए, वे अस्पताल में भर्ती ही नहीं थीं और घर पर स्वस्थ मिलीं। इसके बाद प्रबंधन ने जांच शुरू की।

प्रश्न: अब तक क्या कार्रवाई हुई है?

उत्तर: मेडिकल कॉलेज प्राचार्य ने पांच सदस्यीय जांच कमेटी बनाई है। सीसीटीवी से एक संदिग्ध की पहचान हुई है। रिपोर्ट के बाद पुलिस में मुकदमा दर्ज कराने की बात कही गई है।

प्रश्न: क्या इसी अस्पताल में कोई और गड़बड़ी भी मिली है?

उत्तर: हां, एक पुलिसकर्मी का फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने का मामला भी सामने आया है, जिसमें एक प्रोफेसर की सील-साइन का गलत इस्तेमाल हुआ था।

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