जयपुर रियासत की संपत्तियों पर राजस्थान का दावा, यूपी के 4 शहरों में खंगाला जा रहा पुराना राजस्व रिकॉर्ड

राजस्थान सरकार ने जयपुर रियासत संपत्ति को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। राज्य के मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने उत्तर प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर आगरा, मथुरा, प्रयागराज और वाराणसी में स्थित पूर्व जयपुर रियासत की संपत्तियों का मालिकाना हक राजस्थान के नाम दर्ज करने का अनुरोध किया है। जयपुर रियासत संपत्ति से जुड़ा यह दावा 1949 के राजस्थान एकीकरण और 1952 के विलय समझौते के कानूनी आधार पर टिका है। पत्र मिलते ही यूपी में हलचल तेज हो गई — राजस्व परिषद के आयुक्त ने चारों शहरों के जिलाधिकारियों से रिपोर्ट तलब कर ली है और आगरा में पुराने राजस्व रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं।

यूपी के 4 शहरों में किन संपत्तियों का जिक्र है

पत्र में सबसे विस्तार से आगरा की संपत्तियों का ब्योरा है। मुख्य सचिव के पत्र के साथ 16 फरवरी 1952 का राजपत्र भी भेजा गया है, जिसमें आगरा के जयपुर हाउस क्षेत्र में दो ऐतिहासिक कोठियों, करीब 100 बीघा जमीन, सदाशिव मन:कामेश्वर मंदिर से जुड़े क्षेत्र और सड़क की एक प्रमुख पट्टी का जिक्र है।

मथुरा-वृंदावन में सवाई जयसिंह द्वितीय के काल की जयसिंहपुरा बस्तियों के ऐतिहासिक संदर्भ हैं — धार्मिक गतिविधियों और यात्रियों के ठहरने के लिए जयपुर रियासत ने यहां जमीन और निर्माण कराए थे। काशी में जयपुर के महाराजाओं के खरीदे घाटों के संदर्भ बताए जाते हैं, और प्रयागराज में भी रियासतकालीन संपत्तियों के पुराने रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं।

यूपी ने तुरंत एक्शन लिया है। राजस्व परिषद के आयुक्त ने चारों शहरों के जिलाधिकारियों से रिपोर्ट मांगी है। आगरा के जिलाधिकारी मनीष बंसल ने नगर आयुक्त, विकास प्राधिकरण के सचिव और एसडीएम सदर को पुराने रिकॉर्ड खंगालने के निर्देश दिए हैं। अब यह पता लगाया जा रहा है कि जयपुर रियासत के नाम कितनी संपत्तियां दर्ज थीं और बाद में उनका रिकॉर्ड किसके नाम हुआ।

जयपुर रियासत संपत्ति के दावे का कानूनी आधार

राजस्थान सरकार ने जयपुर रियासत संपत्ति का दावा 1952 के विलय समझौते के आर्टिकल 6(2)सी पर किया है — पूर्ववर्ती जयपुर रियासत की राज्य के बाहर स्थित संपत्तियों पर राजस्थान राज्य सरकार का अधिकार होगा। 1949 के राजस्थान एकीकरण समझौते और 1952 के बाद के राजस्व रिकॉर्ड भी इस दावे का समर्थन करते हैं।

मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने बताया कि यूपी सरकार की ओर से अभी तक कोई जवाब नहीं आया है। विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे दावों में असली लड़ाई दस्तावेजों की होती है — यह साबित करना होता है कि रियासतकाल में किस संपत्ति का रिकॉर्ड किसके पक्ष में था और विलय के बाद उसकी कानूनी स्थिति क्या हुई।

जयसिंहपुरा से काशी के घाट तक — कितनी गहरी हैं जड़ें

जयपुर रियासत की मौजूदगी सिर्फ जयपुर शहर, सिटी पैलेस या आमेर-हवामहल तक सीमित नहीं रही। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार दिल्ली, आगरा, मथुरा-वृंदावन, काशी, प्रयागराज, उज्जैन और हरिद्वार से लेकर बंगाल तक जयपुर रियासत से जुड़ी जमीन, भवन, घाट और मंदिरों के रिकॉर्ड मिलते हैं।

इतिहासकार देवेंद्र कुमार भगत के अनुसार सवाई जयसिंह द्वितीय के काल में उत्तर भारत के धार्मिक केंद्रों में जमीन खरीदने और जयसिंहपुरा बस्तियां बसाने की परंपरा रही — यही परंपरा आज की जयपुर रियासत संपत्ति के दावे की ऐतिहासिक नींव है। हरिद्वार में बद्री बावला की हवेली का भी संदर्भ है, जहां सवाई माधोसिंह के ठहरने की बात कही जाती है। सवाई जयसिंह द्वितीय ने जयपुर के अलावा दिल्ली, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में वेधशालाएं भी बनवाई थीं। आगरा को लेकर एक ऐतिहासिक दावा ताजमहल की जमीन से भी जोड़ा जाता है — हालांकि इतिहासकार खुद स्पष्ट करते हैं कि ऐतिहासिक दावा अपने आप में वर्तमान मालिकाना हक का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

कपडद्वारा दस्तावेज — पहचान कैसे होगी

किसी जयपुर रियासत संपत्ति की पहचान के लिए कपडद्वारा डॉक्यूमेंट, जयपुर के दस्तूर-कोमवार रिकॉर्ड और बीकानेर आर्काइव्स के दस्तावेज अहम हैं — इनमें पट्टों और परवानों की नंबरिंग से अलग-अलग स्थानों की संपत्तियों का विवरण मिलता है। इसके साथ फरमान, नक्शे-प्लान, पुराने राजस्व रिकॉर्ड, जमाबंदी-खसरा और हस्तांतरण दस्तावेजों का भी सहारा लिया जाता है। वर्तमान स्थिति जानने के लिए पुराने रिकॉर्ड को मौजूदा राजस्व दस्तावेजों से मिलाना जरूरी होगा — यही वजह है कि यूपी प्रशासन अभी रिकॉर्ड खंगालने के चरण में है।

सबसे बड़ा पेच — रियासत और राजपरिवार की संपत्ति अलग है

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण अंतर यही है कि जयपुर रियासत की संपत्ति और जयपुर राजपरिवार की निजी संपत्ति को एक ही मानना सही नहीं होगा। 1949 में एकीकरण के बाद रियासती संपत्तियों का कानूनी वर्गीकरण हुआ — कुछ सरकारों के अधीन गईं, कुछ धार्मिक ट्रस्ट या देवस्थान व्यवस्था का हिस्सा बनीं। इसलिए जयपुर रियासत संपत्ति के दावे का मतलब राजपरिवार को निजी मालिकाना हक नहीं है।

चारों शहरों की स्थिति एक नजर में

शहर किन संपत्तियों का जिक्र वर्तमान स्थिति
आगरा जयपुर हाउस में दो कोठियां, करीब 100 बीघा जमीन, मन:कामेश्वर मंदिर क्षेत्र, सड़क पट्टी पुराना रिकॉर्ड खंगाला जा रहा
मथुरा-वृंदावन जयसिंहपुरा बस्तियां, धार्मिक गतिविधियों की जमीनें जिलाधिकारी से रिपोर्ट तलब
प्रयागराज रियासतकालीन संपत्तियों के पुराने रिकॉर्ड जिलाधिकारी से रिपोर्ट तलब
वाराणसी (काशी) जयपुर महाराजाओं के खरीदे घाट, प्रवास भवन जिलाधिकारी से रिपोर्ट तलब

आगे क्या होगा

फिलहाल राजस्थान सरकार का पत्र यूपी सरकार के पाले में है। मुख्य सचिव के अनुसार अभी तक यूपी का कोई आधिकारिक जवाब नहीं आया है, लेकिन चारों जिलों के जिलाधिकारियों से रिपोर्ट मांगकर प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि जमीन किसकी थी, बल्कि यह भी है कि जयपुर से जुड़ी इस विरासत का आज क्या बचा है और उसके संरक्षण की जिम्मेदारी किसकी है।

राजस्थान की यूनेस्को विरासत से जुड़ी हालिया चेतावनी के बीच यह मामला विरासत के संरक्षण और स्वामित्व, दोनों की बहस को आगे बढ़ाता है। जयपुर की साहित्यिक और सांस्कृतिक पहचान की तरह उसकी रियासतकालीन विरासत भी अब नए सिरे से चर्चा में है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1: राजस्थान सरकार ने उत्तर प्रदेश सरकार से क्या मांगा है?

उत्तर: मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने पत्र लिखकर आगरा, मथुरा, प्रयागराज और वाराणसी में पूर्व जयपुर रियासत की संपत्तियों का मालिकाना हक राजस्थान के नाम दर्ज करने का अनुरोध किया है।

प्रश्न 2: इस दावे का कानूनी आधार क्या है?

उत्तर: 1952 के विलय समझौते का आर्टिकल 6(2)सी — राज्य के बाहर स्थित जयपुर रियासत संपत्ति पर राजस्थान सरकार का अधिकार होगा। 1949 के एकीकरण समझौते और 16 फरवरी 1952 के राजपत्र का भी हवाला दिया गया है।

प्रश्न 3: आगरा में कौन-कौन सी संपत्तियों का जिक्र है?

उत्तर: जयपुर हाउस क्षेत्र में दो ऐतिहासिक कोठियां, करीब 100 बीघा जमीन, सदाशिव मन:कामेश्वर मंदिर से जुड़ा क्षेत्र और सड़क की एक प्रमुख पट्टी।

प्रश्न 4: क्या इन संपत्तियों पर अब जयपुर राजपरिवार का अधिकार हो जाएगा?

उत्तर: नहीं। रियासत की संपत्ति और राजपरिवार की निजी संपत्ति अलग-अलग विषय हैं। 1949 के बाद कानूनी वर्गीकरण हुआ — कुछ सरकारों के अधीन गईं, कुछ ट्रस्ट या देवस्थान व्यवस्था में। अंतिम फैसला वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर ही होगा।

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