राजस्थान में अपने ही सोलर प्लांट से बिजली बनाकर इस्तेमाल करने वाली बड़ी औद्योगिक कंपनियों के लिए एक अहम फैसला सामने आया है। राजस्थान विद्युत नियामक आयोग (RERC) ने हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL) की वह याचिका खारिज कर दी है, जिसमें कंपनी ने अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (AVVNL) द्वारा की गई 8.90 करोड़ रुपये की वसूली रद्द करने और रियायती बिजली टैरिफ का लाभ जारी रखने की मांग की थी। आयोग ने साफ कहा है कि मीटर के पीछे (Behind-the-Meter यानी BTM) लगे कैप्टिव सोलर प्लांट की बिजली को लोड फैक्टर की गणना में शामिल नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह उत्पादन ग्रिड इंटरफेस पर दर्ज ही नहीं होता।
यह मामला सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं है। राजस्थान में खनन, सीमेंट और मेटल सेक्टर की कई बड़ी इकाइयां अपने परिसर में सोलर प्लांट लगाकर बिजली खर्च घटा रही हैं। इस फैसले के बाद ऐसी सभी इकाइयों को अपने टैरिफ लाभ का हिसाब दोबारा देखना पड़ सकता है।
पूरा मामला क्या है: दो प्लांट, 34 मेगावाट क्षमता
हिंदुस्तान जिंक राजस्थान में दो बड़े कैप्टिव सोलर प्लांट चलाती है। पहला प्लांट भीलवाड़ा जिले के आगूंचा-गुलाबपुरा परिसर में है, जिसकी क्षमता 22 मेगावाट है और यह 2019 में शुरू हुआ था। दूसरा प्लांट उदयपुर के देबारी में है, जिसकी क्षमता 12 मेगावाट है और यह 2017 से चल रहा है। दोनों ही प्लांट जमीन पर लगे (ग्राउंड-माउंटेड) हैं और इनसे बनने वाली बिजली कंपनी के अपने 11 केवी आंतरिक नेटवर्क में सीधे खपत होती है, यानी यह बिजली डिस्कॉम के ग्रिड से होकर नहीं गुजरती।
विवाद की जड़ RERC के 26 जुलाई 2024 के टैरिफ आदेश का पैराग्राफ 2.46.3 है। इस प्रावधान के तहत 1 एमवीए या उससे अधिक बिलिंग डिमांड वाले बिजली-गहन औद्योगिक उपभोक्ताओं को रियायती टैरिफ मिल सकता है, बशर्ते उनका संयुक्त लोड फैक्टर — सोलर उत्पादन और डिस्कॉम आपूर्ति मिलाकर — कम से कम 50 प्रतिशत हो और अकेले डिस्कॉम आपूर्ति का लोड फैक्टर न्यूनतम 40 प्रतिशत रहे।
पहले मिला लाभ, फिर हुई वसूली
शुरुआत में AVVNL ने हिंदुस्तान जिंक को इस प्रावधान के तहत रियायत दे दी थी। आगूंचा इकाई को 5.78 करोड़ रुपये और देबारी इकाई को 3.12 करोड़ रुपये का लाभ मिला — कुल मिलाकर 8.90 करोड़ रुपये। लेकिन 31 दिसंबर 2025 को RERC ने याचिका संख्या 2333/2025 में स्पष्ट किया कि BTM सोलर उत्पादन इस रियायत व्यवस्था के दायरे में नहीं आता। इसके बाद डिस्कॉम ने पहले दिया गया लाभ बिजली बिलों के जरिए वसूलना शुरू कर दिया।
इसी वसूली के खिलाफ हिंदुस्तान जिंक फिर आयोग पहुंची। कंपनी का कहना था कि 2024 के टैरिफ आदेश में BTM कैप्टिव प्लांट को कहीं बाहर नहीं रखा गया है, उसके प्लांट विद्युत नियम, 2005 के तहत कैप्टिव उत्पादन की सभी शर्तें पूरी करते हैं और डिस्कॉम अधिकारियों की मौजूदगी में संयुक्त मीटर रीडिंग भी नियमित होती रही है। कंपनी ने वसूली रद्द करने, 8.90 करोड़ रुपये 14 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाने और बिलिंग डिमांड को अनुबंधित डिमांड के 75 प्रतिशत तक सीमित रखने की मांग रखी थी।
आयोग ने क्यों खारिज की दलीलें
RERC अध्यक्ष डॉ. राजेश शर्मा और सदस्य हेमंत कुमार जैन व विजय पाल सिंह की पीठ ने 28 सितंबर 2026 के आदेश में डिस्कॉम का पक्ष सही ठहराया। आयोग की मुख्य टिप्पणियां इस प्रकार रहीं:
- BTM सोलर बिजली परिसर के अंदर ही खपत होती है और ग्रिड इंटरफेस पर इसका कोई ऊर्जा लेखा-जोखा (एनर्जी अकाउंटिंग) नहीं होता, इसलिए इसे लोड फैक्टर में जोड़ा नहीं जा सकता।
- दिसंबर 2025 की स्थिति दोहराते हुए आयोग ने कहा कि जब टैरिफ आदेश में BTM सिस्टम का स्पष्ट उल्लेख ही नहीं है, तो अनुमान के आधार पर टैरिफ प्रोत्साहन नहीं दिया जा सकता।
- विद्युत नियम, 2005 के तहत किसी संयंत्र का ‘कैप्टिव’ माना जाना अपने आप में लोड फैक्टर आधारित टैरिफ रियायत की पात्रता नहीं बनाता।
- डिस्कॉम ने भी यही कहा था कि संयुक्त मीटर रीडिंग राज्य विद्युत शुल्क (स्टेट इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी) के आकलन के लिए होती थी, वह रियायत की पात्रता साबित नहीं करती।
बिलिंग डिमांड, अतिरिक्त शुल्क और रिफंड जैसे बाकी दावों पर आयोग ने कंपनी को RERC विनियम, 2021 के तहत उपभोक्ता शिकायत निवारण मंच (CGRF) के सामने जाने को कहा है। याचिका बिना किसी लागत आदेश के निस्तारित कर दी गई।
आंकड़ों में पूरा विवाद
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| कंपनी | हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL) |
| डिस्कॉम | अजमेर विद्युत वितरण निगम (AVVNL) |
| आगूंचा (भीलवाड़ा) सोलर प्लांट | 22 मेगावाट, शुरुआत 2019 |
| देबारी (उदयपुर) सोलर प्लांट | 12 मेगावाट, शुरुआत 2017 |
| आगूंचा इकाई को मिला लाभ | 5.78 करोड़ रुपये |
| देबारी इकाई को मिला लाभ | 3.12 करोड़ रुपये |
| कुल वसूली गई रियायत | 8.90 करोड़ रुपये |
| RERC आदेश की तारीख | 28 सितंबर 2026 |
उद्योगों के लिए इसका क्या मतलब है
इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश यह है कि राजस्थान में अब कोई भी औद्योगिक उपभोक्ता अपने परिसर के भीतर लगे सोलर प्लांट की बिजली को डिस्कॉम टैरिफ रियायत का आधार नहीं बना सकेगा, जब तक टैरिफ आदेश में इसका स्पष्ट प्रावधान न हो। जो कंपनियां रूफटॉप या परिसर-स्थित सोलर से लोड फैक्टर सुधारकर रियायत ले रही थीं, उन्हें अपने बिलों की समीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि डिस्कॉम अब पुराने लाभ की वसूली का रास्ता अपना सकते हैं। दूसरी ओर, ग्रिड से जुड़े कैप्टिव और ओपन एक्सेस सोलर प्रोजेक्ट पर यह फैसला सीधे लागू नहीं होता, क्योंकि वहां उत्पादन का लेखा-जोखा ग्रिड इंटरफेस पर होता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले टैरिफ आदेशों में आयोग को BTM सोलर पर स्थिति और स्पष्ट करनी होगी, ताकि निवेशक भ्रम में न रहें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सवाल: BTM सोलर प्लांट क्या होता है?
जवाब: BTM यानी Behind-the-Meter सोलर प्लांट वह होता है जो उपभोक्ता के अपने परिसर में लगा होता है और उसकी बिजली मीटर के पीछे, यानी डिस्कॉम के ग्रिड में जाए बिना, सीधे उसी परिसर में खपत होती है।
सवाल: हिंदुस्तान जिंक से कितनी रकम वसूली गई?
जवाब: AVVNL ने आगूंचा इकाई से 5.78 करोड़ और देबारी इकाई से 3.12 करोड़ रुपये — कुल 8.90 करोड़ रुपये की पहले दी गई टैरिफ रियायत बिजली बिलों के जरिए वसूल ली, और RERC ने इस वसूली को सही ठहराया है।
सवाल: क्या अब कंपनी के पास कोई रास्ता बचा है?
जवाब: बिलिंग डिमांड और रिफंड जैसे मुद्दों पर आयोग ने कंपनी को उपभोक्ता शिकायत निवारण मंच (CGRF) जाने का निर्देश दिया है। इसके अलावा कंपनी चाहे तो आदेश के खिलाफ अपीलीय मार्ग भी अपना सकती है।
सवाल: क्या आम उपभोक्ताओं पर इस फैसले का कोई असर पड़ेगा?
जवाब: सीधे तौर पर नहीं। यह फैसला केवल बड़े औद्योगिक उपभोक्ताओं के टैरिफ रियायत से जुड़ा है। घरेलू उपभोक्ताओं की बिजली दरों या रूफटॉप सोलर सब्सिडी पर इसका कोई प्रभाव नहीं है।