कल्पना कीजिए — नागौर से अजमेर जा रही एक आम यात्री बस श्रीमाधोपुर के पास रुकती है। वन विभाग की टीम डिग्गी खोलती है तो अंदर दो प्लास्टिक के कट्टों में 18 जीवित पाटागोह (मॉनिटर लिजार्ड) भरे मिलते हैं। ये किसी फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि 13 अक्टूबर को सीकर जिले में सामने आई सीकर पाटागोह तस्करी की सच्ची घटना है। इस भंडाफोड़ में अब तक चार आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं और एक नाबालिग को निरुद्ध किया गया है।
पकड़े गए तस्करों ने पूछताछ में क्या-क्या कबूला?
गिरफ्तार आरोपियों से जब वन विभाग ने सख्ती से पूछताछ की तो वन्यजीवों के अवैध शिकार और खरीद-बिक्री का पूरा तंत्र सामने आ गया। आरोपियों ने स्वीकार किया कि पाटागोह का शिकार उसका मांस खाने और बेचने के लिए किया जाता था। इतना ही नहीं, उसके शरीर के अंगों की भी अलग से बिक्री होती थी।
सबसे चौंकाने वाला खुलासा पाटागोह की खाल को लेकर हुआ। आरोपियों ने बताया कि इस संरक्षित जीव की खाल का इस्तेमाल ढोल जैसे वाद्य यंत्र बनाने में किया जाता है — यानी सीकर पाटागोह तस्करी के पीछे मांस और अंगों के साथ खाल का भी बड़ा बाजार था।
इसके अलावा बस से बरामद औषधीय वन उपज शतावरी को दवाइयों के लिए लगभग 200 रुपये प्रति किलो की दर से बेचा जाता था।
सीकर पाटागोह तस्करी का भंडाफोड़ आखिर कैसे हुआ?
यह कार्रवाई पुख्ता खुफिया जानकारी पर आधारित सुनियोजित अभियान थी। सीकर के उप वन संरक्षक प्रदीप कुमार के निर्देशन में 13 अक्टूबर को वन्यजीव तस्करी के खिलाफ विशेष अभियान चलाया गया था।
सहायक वन संरक्षक (वन्यजीव) सीकर देवेन्द्र सिंह राठौड़ को मुखबिर से सूचना मिली थी कि अजमेर की ओर जाने वाली एक निजी यात्री बस में कुछ लोग पाटागोह और औषधीय वन उपज शतावरी का अवैध परिवहन कर रहे हैं — सूचना मिलते ही सहायक वन संरक्षक मुख्यालय सीकर कीर्ति राठौड़ के पर्यवेक्षण में विशेष टीम गठित की गई, और इसी सूचना ने सीकर पाटागोह तस्करी के इस पूरे जाल का पर्दाफाश कर दिया।
क्षेत्रीय वन अधिकारी प्रथम श्रीमाधोपुर जितेन्द्र सिंह चौधरी के नेतृत्व में टीम ने जालपाली-अजीतगढ़ मार्ग पर नाकाबंदी की। नाकाबंदी के दौरान निजी यात्री बस संख्या RJ09PA2776 को रोककर तलाशी ली गई। डिग्गी के दो प्लास्टिक कट्टों से 18 जीवित पाटागोह, एक अन्य कट्टे से शतावरी और लोहे के दो कुरसे जब्त किए गए।
चौथे आरोपी और शिकार के हथियारों तक कैसे पहुंची टीम?
सीकर पाटागोह तस्करी की जांच आगे बढ़ने पर वन विभाग ने एक और आरोपी को गिरफ्तार किया और शिकार में इस्तेमाल पिकअप वाहन जब्त कर लिया। इससे यह सवाल उठा है कि क्या वन्यजीवों को पहले एक जगह एकत्र कर बाद में यात्री बस से आगे भेजा जा रहा था।
आरोपी रामचन्द्र बावरी की निशानदेही पर चीपलाटा के एक घर से टोपेदार बंदूक और झाऊचूहे के कांटे भी बरामद हुए।
तीनों आरोपियों को 14 अक्टूबर को अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम, श्रीमाधोपुर के समक्ष पेश किया गया, जहां से 16 अक्टूबर तक दो दिन का रिमांड मिला। बाल अपचारी को किशोर न्याय बोर्ड, सीकर के आदेश पर संप्रेक्षण गृह, डिडोर भेजा गया।
सीकर पाटागोह तस्करी पर कानून क्या कहता है?
वन्यजीवों का अवैध शिकार, कब्जा, परिवहन और व्यापार गंभीर दंडनीय अपराध है। इस प्रकरण में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 9, 39, 48(ख), 52 और 57/51 तथा राजस्थान वन अधिनियम, 1953 की धारा 41, 42 और 52(2) के तहत कार्रवाई हुई है। दोष सिद्ध होने पर तीन से सात वर्ष तक कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| बरामद जीव | 18 जीवित पाटागोह (मॉनिटर लिजार्ड) |
| बरामदगी स्थल | निजी यात्री बस RJ09PA2776, श्रीमाधोपुर (सीकर) |
| अन्य बरामदगी | शतावरी, लोहे के दो कुरसे, पिकअप वाहन, टोपेदार बंदूक, झाऊचूहे के कांटे |
| गिरफ्तार आरोपी | 4 (तीन नागौर के बावरी समुदाय के, एक अन्य) + 1 बाल अपचारी निरुद्ध |
| कार्रवाई की तारीख | 13 अक्टूबर 2026 |
| न्यायालय में पेशी | 14 अक्टूबर 2026 (ACJM प्रथम, श्रीमाधोपुर) |
| रिमांड | 16 अक्टूबर 2026 तक |
| लागू कानून | वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972; राजस्थान वन अधिनियम 1953 |
पाटागोह की तस्करी आखिर इतनी खतरनाक क्यों है?
पाटागोह यानी मॉनिटर लिजार्ड पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है — यह छोटे वन्यजीवों और शिकार प्रजातियों की आबादी का संतुलन बनाए रखता है। बड़ी संख्या में इसका शिकार जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा है।
मांस, खाल और अंगों की बाजार मांग ही अवैध शिकार को बढ़ावा देती है। सीकर पाटागोह तस्करी का यह मामला दिखाता है कि शिकारियों के साथ खरीदारों और परिवहन में मदद करने वालों की पहचान भी उतनी ही जरूरी है। राजस्थान में वन्यजीव सप्ताह के दौरान तेंदुआ संरक्षण और धौलपुर में 14 फीट लंबे अजगर के रेस्क्यू जैसे मामलों ने भी वन्यजीव सुरक्षा का मुद्दा उठाया था।
अब जांच का अगला कदम क्या होगा?
सीकर पाटागोह तस्करी के इस प्रकरण ने संभावित तस्करी नेटवर्क की कई कड़ियों को जांच के दायरे में ला दिया है। अब सबसे अहम सवाल हैं — शिकार कहां हुआ, जीवों को कहां एकत्र किया गया, अजमेर ले जाने का असली मकसद क्या था और इस कारोबार में और कौन शामिल है।
उप वन संरक्षक प्रदीप कुमार ने सीकर पाटागोह तस्करी जैसे मामलों में अवैध गतिविधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रखने के निर्देश दिए हैं। अभियान में सहायक वन संरक्षक (वन्यजीव) देवेन्द्र सिंह राठौड़, सहायक वन संरक्षक मुख्यालय कीर्ति राठौड़, क्षेत्रीय वन अधिकारी जितेन्द्र सिंह चौधरी और नरेन्द्र सैनी सहित कई वनकर्मियों की अहम भूमिका रही।
स्रोत: Nature Times (प्रकाशन: 15 अक्टूबर 2026)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: पाटागोह क्या होता है? उत्तर: पाटागोह को अंग्रेजी में मॉनिटर लिजार्ड कहा जाता है। यह एक बड़ी छिपकली प्रजाति है जो वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित है — सीकर पाटागोह तस्करी जैसे मामलों में इसी कानून के तहत कार्रवाई होती है।
प्रश्न 2: सीकर मामले में पाटागोह की तस्करी क्यों की जा रही थी? उत्तर: आरोपियों ने बताया कि मांस खाने-बेचने, अंगों की बिक्री और खाल से ढोल बनाने के लिए शिकार किया जाता था। साथ ले जाई जा रही शतावरी दवाइयों के लिए करीब 200 रुपये किलो बेची जाती थी।
प्रश्न 3: इस मामले में कौन-कौन सी कानूनी धाराएं लगाई गई हैं? उत्तर: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 9, 39, 48(ख), 52, 57/51 और राजस्थान वन अधिनियम, 1953 की धारा 41, 42, 52(2) के तहत प्रकरण दर्ज है। दोष सिद्ध होने पर 3 से 7 वर्ष कारावास और जुर्माना हो सकता है।
प्रश्न 4: वन्यजीव तस्करी की सूचना आम नागरिक कहां दे सकता है? उत्तर: अपने नजदीकी वन विभाग कार्यालय, क्षेत्रीय वन अधिकारी या वन्यजीव अपराध से जुड़े हेल्पलाइन नंबर पर सूचना दी जा सकती है। सूचना देने वाले की पहचान गोपनीय रखी जाती है।