राजस्थान के गांवों में रहने वाली महिलाओं की कमाई को लेकर एक उम्मीद भरी खबर सामने आई है। सखी महिला आय में पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले करीब 43 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई है। हिंदुस्तान जिंक की सखी माइक्रोएंटरप्राइज पहल से जुड़ी 426 महिलाओं की सामूहिक आय 23 लाख रुपये से बढ़कर 32.84 लाख रुपये तक पहुंच गई है। ये महिलाएं अब अचार, मसाले और मिलेट उत्पादों की कमाई से अपने घर का बजट संभाल रही हैं।
यह खबर इसलिए खास है क्योंकि इसमें सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि बदलाव की पूरी तस्वीर छिपी है। 426 महिलाओं का एक साथ आगे बढ़ना बताता है कि काम, हुनर और बाजार तीनों मिलने पर आय बढ़ना कोई एक दिन का चमत्कार नहीं रहता।
सखी महिला आय: 23 लाख से 32.84 लाख तक का सफर
सीधे आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले वर्ष की तुलना में सखी महिला आय में करीब 9.84 लाख रुपये की बढ़त हुई है, जो प्रतिशत में 43 के आसपास बैठती है। किसी भी ग्रामीण आजीविका पहल के लिए एक साल में इतनी बढ़त छोटी बात नहीं मानी जाती।
| पहलू | जानकारी |
|---|---|
| पहल का नाम | सखी माइक्रोएंटरप्राइज (हिंदुस्तान जिंक) |
| जुड़ी महिलाएं | 426 |
| पहले की सामूहिक आय | 23 लाख रुपये |
| वित्त वर्ष 2026 में सामूहिक आय | 32.84 लाख रुपये |
| बढ़त | करीब 43 प्रतिशत |
| उत्पादन इकाइयां | 14 (राजस्थान और उत्तराखंड में) |
| नई इकाई | दरीबा में मिलेट उत्पादन इकाई |
| बिक्री के रास्ते | दिल्ली के तीन स्टोर, ब्लिंकिट, अमेजन, फ्लिपकार्ट, ओएनडीसी, हार्ट्स विद फिंगर्स |
इस आंकड़े को कुल सामूहिक आय के रूप में देखना सही होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि हर महिला की जेब में बराबर पैसा पहुंचा। लेकिन कुल तस्वीर यह साफ करती है कि पहल से जुड़ी महिलाओं की आर्थिक गतिविधि पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है।
मंजू देवी की कहानी: मौसमी मजदूरी से हर महीने 8,000 रुपये तक
आंकड़ों के पीछे की सबसे असरदार कहानी मंजू देवी की है, जो सखी महिला आय के पीछे का मानवीय चेहरा दिखाती है। वर्ष 2019 में पति के निधन के बाद उन पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई थी। उस दौर में उनकी जिंदगी मौसमी कृषि कार्य और अस्थायी मजदूरी के भरोसे चल रही थी, जिसमें काम रुकते ही घर का खर्च भी रुक जाता था।
सखी पहल से जुड़ने के बाद मंजू देवी अब परियोजना के तहत प्रोसेसिंग मशीनों का संचालन करती हैं। कंपनी की जानकारी के अनुसार वह हर महीने करीब 8,000 रुपये कमा रही हैं। शहर के हिसाब से यह रकम भले ही छोटी लगे, लेकिन गांव के एक ऐसे परिवार के लिए जहां पहले आय का कोई पक्का जरिया नहीं था, वहां हर महीने तय आमदनी मिलना अपने आप में बड़ा बदलाव है।
14 उत्पादन इकाइयों में क्या-क्या तैयार होता है
सखी माइक्रोएंटरप्राइज के तहत राजस्थान और उत्तराखंड में कुल 14 उत्पादन इकाइयां चल रही हैं। इनमें महिलाएं अचार, मसाले, दालें, शहद, नमकीन, तेल और घी जैसे खाद्य उत्पाद तैयार करती हैं। इसके अलावा क्रोशिया और परिधान उत्पादों के साथ-साथ मिलेट आधारित खाद्य सामग्री का उत्पादन भी किया जा रहा है।
उत्पादों की यह सूची जानबूझकर ऐसी रखी गई है जो बाजार में हमेशा मांग में रहते हैं। अचार और मसाले हर घर की जरूरत हैं, दाल और शहद की मांग साल भर बनी रहती है, और मिलेट उत्पादों की लोकप्रियता पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है।
दरीबा की नई मिलेट इकाई क्यों अहम है
राजस्थान के दरीबा में स्थापित नई मिलेट उत्पादन इकाई इस पहल का अगला कदम है। इससे स्थानीय महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ने और पारंपरिक अनाजों से मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने की योजना है। मिलेट यानी मोटे अनाज को लेकर लोगों की रुचि पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है, क्योंकि ये अनाज पौष्टिक माने जाते हैं।
हालांकि एक बात साफ रखना जरूरी है। इस इकाई की उत्पादन क्षमता और रोजगार के सटीक आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं, इसलिए इसे भविष्य की संभावना मानना सही होगा, न कि तैयार सफलता।
दिल्ली के स्टोर से ऑनलाइन मंच तक: बिक्री का रास्ता
कोई भी उत्पाद तभी कमाई बनता है जब वह खरीदार तक पहुंचे। सखी उत्पादों की बिक्री के लिए ले मार्शे के साथ साझेदारी की गई है, जिसके तहत ये उत्पाद दिल्ली के तीन स्टोरों पर उपलब्ध हैं। इसके अलावा ये ब्लिंकिट, अमेजन, फ्लिपकार्ट, ओएनडीसी और हार्ट्स विद फिंगर्स के जरिए भी बेचे जा रहे हैं।
ग्रामीण उत्पादों की सबसे बड़ी चुनौती आमतौर पर बाजार तक पहुंच ही होती है। गांव में अच्छा अचार बनाना एक बात है और दिल्ली के खरीदार तक उसे पहुंचाना बिल्कुल अलग चुनौती है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और शहर के स्टोर इस दूरी को कम करते हैं, जिससे महिलाओं को बेहतर दाम मिलने की संभावना बढ़ती है।
महिलाओं के लिए अन्य रास्तों में राज्य सरकार की महिला वर्क फ्रॉम होम योजना में हजारों अवसर हैं, बालिका रोजगार अवसर के तहत छात्राओं को हुनर की ट्रेनिंग मिल रही है, और जयपुर के अमृता हाट में महिला उद्यमियों को डिजिटल मार्केटिंग सिखाई जा रही है।
सखी महिला आय के आंकड़ों को सही नजरिए से कैसे पढ़ें
अब सबसे जरूरी सवाल पर आते हैं। क्या 43 प्रतिशत की बढ़त का मतलब यह है कि हर जुड़ी महिला अब आर्थिक रूप से पूरी तरह सुरक्षित हो गई है? इसका सीधा जवाब है नहीं। सामूहिक आय बढ़ना एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन किसी मॉडल की दीर्घकालिक सफलता तीन बातों से तय होगी: व्यक्तिगत आय की टिकाऊपन, रोजगार की निरंतरता और बाजार में मांग का बने रहना।
इन तीनों सवालों का जवाब आने वाले वर्षों में ही मिलेगा। लेकिन फिलहाल जो तस्वीर है, वह उम्मीद जगाने वाली है। 426 महिलाओं की सामूहिक आय का 23 लाख से 32.84 लाख तक पहुंचना बताता है कि सही सहयोग मिलने पर ग्रामीण महिलाएं कमाई करने वाली उद्यमी भी बन सकती हैं। सखी महिला आय की यह कहानी बताती है कि रसोई का हुनर भी रोजगार बन सकता है। इस बारे में अधिक जानकारी के लिए आप हिंदुस्तान जिंक की आधिकारिक वेबसाइट देख सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सखी माइक्रोएंटरप्राइज पहल क्या है?
यह हिंदुस्तान जिंक की पहल है, जिसमें ग्रामीण महिलाओं को उत्पादन इकाइयों में खाद्य उत्पाद, क्रोशिया, परिधान और मिलेट सामग्री बनाने के काम से जोड़ा जाता है।
सखी से जुड़ी महिलाओं की आय कितनी बढ़ी है?
वित्त वर्ष 2026 में 426 महिलाओं की सामूहिक आय 23 लाख से बढ़कर 32.84 लाख रुपये हो गई है, यानी करीब 43 प्रतिशत की बढ़त।
सखी उत्पाद कहां बिकते हैं?
दिल्ली में ले मार्शे के तीन स्टोरों पर, और ब्लिंकिट, अमेजन, फ्लिपकार्ट, ओएनडीसी व हार्ट्स विद फिंगर्स के जरिए।
दरीबा की मिलेट इकाई से क्या फायदा होगा?
स्थानीय महिलाओं को रोजगार और पारंपरिक अनाजों से मूल्यवर्धित उत्पाद बनाने का मौका मिलेगा। सटीक आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं।