राजस्थान के करीब 52 लाख सरकारी कर्मचारियों, पेंशनरों और उनके परिजनों के लिए राहत भरी खबर है। राजस्थान सरकार स्वास्थ्य योजना (आरजीएचएस) के तहत अस्पताल से छुट्टी यानी डिस्चार्ज के समय अपनाई जाने वाली सत्यापन प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया गया है। अब अगर किसी मरीज की हालत इतनी गंभीर है कि वह आंख झपकाकर अपनी पहचान का सत्यापन नहीं कर सकता, तो अस्पताल उसे इस प्रक्रिया से छूट दे सकेगा — बशर्ते इसके पीछे का चिकित्सकीय कारण दर्ज किया जाए। आरजीएचएस की ओर से संशोधित दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए हैं, जो प्रदेश के सभी सूचीबद्ध अस्पतालों पर लागू होंगे।
आरजीएचएस डिस्चार्ज नियम में हुआ यह बदलाव उन मरीजों के लिए बड़ी राहत है, जो अब तक डिस्चार्ज के समय एक अव्यावहारिक औपचारिकता से जूझते थे। जरा सोचिए — ऑपरेशन के बाद बेहोशी की दवा का असर अभी उतरा नहीं, शरीर में तेज दर्द है या चेहरे पर पट्टी बंधी है, और उसी हालत में मरीज से कहा जाए कि कैमरे की ओर देखकर आंख झपकाइए। यही वह परेशानी थी, जिसकी शिकायतें लगातार आरजीएचएस प्रशासन तक पहुंच रही थीं। इन्हीं शिकायतों के बाद नियमों में संशोधन का फैसला लिया गया।
नया आरजीएचएस डिस्चार्ज नियम क्या कहता है
संशोधित दिशा-निर्देशों के मुताबिक अब डिस्चार्ज के समय मरीज की लाइव फोटो लेकर आंख झपकाकर सत्यापन कराना हर हाल में जरूरी नहीं रहेगा। अगर मरीज की गंभीर हालत या किसी अन्य चिकित्सकीय कारण से यह सत्यापन संभव नहीं हो पाता है, तो अस्पताल इसके बजाय मरीज की स्थिति से जुड़ा ठोस चिकित्सकीय कारण दर्ज कर सकेगा। यानी सत्यापन की प्रक्रिया खत्म नहीं हुई है, बल्कि उसमें मानवीय छूट का प्रावधान जोड़ दिया गया है।
इस बदलाव का सबसे अहम पहलू यह है कि छूट मनमानी नहीं होगी। अस्पताल को सिर्फ यह लिखकर काम नहीं चलेगा कि “सत्यापन नहीं हो पाया”। नए नियम के तहत अस्पताल को स्पष्ट रूप से बताना होगा कि मरीज किस चिकित्सकीय कारण से आंख झपकाकर सत्यापन नहीं कर पाया। यह जानकारी उपचार बिल और दावे के रिकॉर्ड का हिस्सा बनेगी, ताकि दावों की जांच के समय अधिकारी देख सकें कि सत्यापन क्यों नहीं हुआ और बताया गया कारण उचित था या नहीं।
पहले डिस्चार्ज के समय क्या प्रक्रिया थी
अब तक आरजीएचएस डिस्चार्ज नियम के तहत अस्पताल से छुट्टी देते समय मरीज की लाइव फोटो लेकर आंख झपकाकर सत्यापन करना अनिवार्य था। इसका मकसद यह पक्का करना था कि इलाज कराने वाला मरीज वही व्यक्ति है जिसका रिकॉर्ड योजना में दर्ज है — ताकि फर्जी दावों पर रोक लग सके। कागज पर यह व्यवस्था फर्जीवाड़ा रोकने के लिए थी, लेकिन जमीनी हकीकत में गंभीर मरीजों के लिए मुसीबत बन गई थी — कई बार परिजनों को डिस्चार्ज में देरी झेलनी पड़ती थी, सिर्फ इसलिए क्योंकि मरीज यह औपचारिकता पूरी नहीं कर पा रहा था।
किन हालात में मिलेगी सत्यापन से छूट
संशोधित आदेश में उन चिकित्सकीय परिस्थितियों का जिक्र है जिनमें मरीज आंख झपकाकर सत्यापन नहीं कर पाते — ऑपरेशन के बाद बेहोशी की दवा का असर बने रहना, शरीर में तेज दर्द होना, ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत पड़ना या चेहरे पर पट्टी बंधी होना। ऐसे मामलों में अस्पताल को मरीज की चिकित्सकीय स्थिति के आधार पर सत्यापन न हो पाने का कारण दर्ज करने की अनुमति होगी।
लेकिन यह छूट सिर्फ वास्तविक और विशेष चिकित्सकीय परिस्थितियों तक सीमित है। जो मरीज सामान्य स्थिति में हैं, उनके लिए लाइव फोटो और आंख झपकाकर सत्यापन की पुरानी प्रक्रिया ही लागू रहेगी। अस्पताल सामान्य रूप से इस प्रक्रिया को छोड़ नहीं सकेंगे — बिना ठोस कारण के छूट देने पर दावों की जांच में सवाल उठेंगे।
अस्पतालों की बढ़ी जिम्मेदारी
नए नियम ने अस्पतालों की जवाबदेही बढ़ा दी है। जब भी किसी मरीज का सत्यापन नहीं हो पाएगा, अस्पताल को उसके पीछे का चिकित्सकीय कारण लिखित में दर्ज करना होगा — और यह कारण मरीज के वास्तविक इलाज रिकॉर्ड से मेल खाना चाहिए। जांच में कारण उचित न पाए जाने पर अस्पताल को दावे में दिक्कत हो सकती है।
यह सख्ती आरजीएचएस प्रशासन की उसी सोच का हिस्सा है, जिसके तहत हाल में नियम पारदर्शी बनाए जा रहे हैं — अगस्त में हर पर्ची पर संबंधित डॉक्टर के खुद के हस्ताक्षर अनिवार्य किए गए, दवाएं न देने पर 215 निजी फार्मेसियों के ट्रांजेक्शन सिस्टम निलंबित हुए, और ब्रांडेड उपकरणों के नाम पर अतिरिक्त वसूली के आरोपों पर भी कार्रवाई हुई।
पहले और अब: आरजीएचएस डिस्चार्ज नियम में क्या बदला
| बिंदु | पहले का नियम | नया नियम |
| डिस्चार्ज सत्यापन | लाइव फोटो + आंख झपकाना अनिवार्य | गंभीर हालत में छूट संभव |
| छूट की स्थिति | कोई छूट नहीं | चिकित्सकीय कारण दर्ज कर छूट |
| अस्पताल की जिम्मेदारी | सिर्फ सत्यापन कराना | ठोस चिकित्सकीय वजह दर्ज करना |
| दावे की जांच | सत्यापन रिकॉर्ड देखा जाता था | दर्ज कारण की सत्यता भी जांची जाएगी |
आरजीएचएस: 52 लाख लाभार्थियों वाली योजना
राजस्थान सरकार स्वास्थ्य योजना राज्य के सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों, पेंशनरों और उनके आश्रित परिजनों को कैशलेस इलाज देती है। करीब 52 लाख लाभार्थी सूचीबद्ध सरकारी और निजी अस्पतालों में इसके तहत इलाज करा सकते हैं। हाल के महीनों में कैशलेस इलाज पर संकट की खबरों से लेकर अतिरिक्त वसूली के आरोपों तक कई उतार-चढ़ाव आए — ताजा संशोधन नियमों को व्यावहारिक बनाने की उसी कड़ी का हिस्सा है।
मरीजों और परिजनों के लिए जरूरी बातें
अगर आप आरजीएचएस के तहत इलाज करा रहे हैं तो डिस्चार्ज के समय इन बातों का ध्यान रखें। गंभीर हालत में मरीज सत्यापन न कर सके तो घबराएं नहीं — अस्पताल से कहें कि वह नियमानुसार चिकित्सकीय कारण दर्ज करे। यह भी सुनिश्चित करें कि दर्ज कारण मरीज की वास्तविक स्थिति से मेल खाता हो, क्योंकि यही रिकॉर्ड दावे की जांच में काम आएगा। सामान्य स्थिति वाले मरीजों के लिए पुरानी सत्यापन प्रक्रिया ही लागू रहेगी, इसलिए पहचान संबंधी दस्तावेज तैयार रखें। अधिकृत जानकारी के लिए आरजीएचएस की आधिकारिक वेबसाइट देखते रहें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
आरजीएचएस डिस्चार्ज नियम में क्या बदलाव हुआ है?
अब गंभीर हालत वाले मरीजों को डिस्चार्ज के समय आंख झपकाकर सत्यापन से छूट मिल सकेगी। अस्पताल को इसके बजाय मरीज की स्थिति से जुड़ा चिकित्सकीय कारण दर्ज करना होगा।
क्या हर मरीज को इस छूट का लाभ मिलेगा?
नहीं। यह सुविधा सिर्फ वास्तविक और विशेष चिकित्सकीय परिस्थितियों में मिलेगी। सामान्य स्थिति वाले मरीजों के लिए पुरानी प्रक्रिया ही लागू रहेगी।
अस्पताल को छूट के बदले क्या करना होगा?
अस्पताल को लिखित में बताना होगा कि मरीज किस चिकित्सकीय कारण से सत्यापन नहीं कर पाया। यह जानकारी उपचार बिल और दावे के रिकॉर्ड में दर्ज होगी, जिसकी जांच अधिकारी करेंगे।
यह नियम कब से लागू हुआ है?
आरजीएचएस की ओर से संशोधित दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए हैं, जो प्रदेश के सभी सूचीबद्ध अस्पतालों पर लागू होंगे।