राजस्थान में मदरसा शिक्षा को लेकर अब अदालत की नजर और सख्त हो गई है। राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेश में चल रहे करीब 3,000 मदरसों के प्रबंधन, नियंत्रण और संचालन को लेकर राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने अतिरिक्त महाधिवक्ता बी.एल. भाटी को निर्देश दिया है कि सरकार मदरसों के प्रभावी संचालन के लिए जो कदम उठा रही है या उठाने जा रही है, उनका पूरा ब्योरा हलफनामे के रूप में अदालत के सामने रखा जाए। मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को तय हुई है। यानी आने वाले हफ्तों में सरकार को यह साफ करना होगा कि मदरसों की व्यवस्था को लेकर उसकी तैयारी क्या है।
यह मामला सिर्फ कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं है। याचिका में मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों की योग्यता, पंजीकरण की पारदर्शिता और सरकारी अनुदान के इस्तेमाल जैसे बुनियादी सवाल उठाए गए हैं। ऐसे में यह खबर उन परिवारों के लिए अहम है, जिनके बच्चे मदरसों में पढ़ते हैं, और उन संचालकों के लिए भी, जिन पर नए नियमों का सीधा असर पड़ सकता है।
याचिका में आखिर कहा क्या गया है?
यह याचिका प्रतिपाल सिंह व अन्य की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता मोती सिंह ने अदालत के सामने दलील रखी कि मदरसों पर प्रभावी नियंत्रण, स्पष्ट कानूनी नियमों और नियमित पर्यवेक्षण की कमी की ओर ध्यान देने की जरूरत है। उनका कहना था कि फिलहाल लागू ‘राजस्थान मदरसा बोर्ड अधिनियम, 2020’ में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और उचित प्रबंधन के लिए पर्याप्त व प्रभावी प्रावधानों की कमी है।
अधिवक्ता ने मांग की कि योग्य शिक्षकों के जरिए शिक्षा का स्तर सुधारने और प्रबंधन को पारदर्शी बनाने के लिए कानून में जरूरी संशोधन किए जाएं। आसान शब्दों में, याचिका का मूल सवाल यही है — मदरसों में पढ़ाई का स्तर, शिक्षकों की नियुक्ति और संस्थाओं की जवाबदेही तय करने वाला तंत्र कितना मजबूत है, और अगर कमजोर है तो उसे सुधारा कैसे जाए।
याचिकाकर्ता के 6 बड़े सुझाव, एक नजर में
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने बच्चों के भविष्य और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर कई ठोस सुझाव अदालत के सामने रखे। ये सुझाव फिलहाल प्रस्ताव के रूप में हैं; इन पर अंतिम फैसला सरकार की रिपोर्ट और अदालत की आगे की सुनवाई के बाद ही होगा।
| क्रम | सुझाव | क्या है मतलब |
|---|---|---|
| 1 | संबद्धता और पंजीकरण की जांच | RBSE व CBSE से संबद्ध माध्यमिक/उच्च माध्यमिक मदरसों की अलग सूची बने, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप व्यवस्था हो और मानकों पर खरे न उतरने वालों के पंजीकरण की समीक्षा हो |
| 2 | अनुदान पर रोक | जो संस्थाएं स्कूल के रूप में पंजीकृत हैं, उन्हें मदरसा बोर्ड से मिलने वाली वित्तीय सहायता या अनुदान बंद किया जाए |
| 3 | एकीकृत पाठ्यक्रम और परीक्षा | प्राथमिक व उच्च प्राथमिक मदरसों के लिए शिक्षा विभाग निश्चित पाठ्यक्रम तैयार करे और DIET के तहत समान परीक्षा हो |
| 4 | डिजिटल पोर्टल और यूनिक आईडी | मदरसा छात्रों का विवरण जुटाने के लिए विशेष पोर्टल बने और हर बच्चे को यूनिक स्टूडेंट आईडी मिले |
| 5 | अयोग्य शिक्षकों पर कार्रवाई | बिना डिग्री-डिप्लोमा वाले संविदा या पैरा-टीचर्स के मानदेय पर रोक लगे और धार्मिक शिक्षा देने वालों को सरकारी कोष से वेतन न मिले |
| 6 | पंजीकरण रद्द और भूमि वापसी | मानक पूरे न करने वाली संस्थाओं का पंजीकरण रद्द हो और आवंटित भूमि संबंधित जिला कलेक्टर को वापस सौंपी जाए |
इनके अलावा एक और संवेदनशील सुझाव भी रखा गया — राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सिफारिशों के अनुरूप गैर-मुस्लिम बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने वाले मदरसों से निकालकर शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत सामान्य विद्यालयों में प्रवेश दिलाया जाए। यह बिंदु आगे चलकर सबसे ज्यादा चर्चा में रह सकता है, क्योंकि इसका सीधा संबंध बच्चों की पढ़ाई और परिवारों के फैसलों से है।
कोर्ट ने सरकार से क्या करने को कहा?
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता बी.एल. भाटी को निर्देश दिया कि वे राजस्थान में मदरसों के प्रभावी प्रबंधन, नियंत्रण और संचालन को लेकर सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदमों का विवरण देते हुए विस्तृत हलफनामा पेश करें। साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता के सुझावों पर विचार करने के निर्देश भी दिए हैं।
इसका सीधा अर्थ है कि अब गेंद सरकार के पाले में है। सरकार को बताना होगा कि करीब 3,000 मदरसों की निगरानी की मौजूदा व्यवस्था क्या है, पंजीकरण और मान्यता की प्रक्रिया कैसे चलती है, शिक्षकों की योग्यता की जांच कैसे होती है और गुणवत्ता सुधारने की आगे की योजना क्या है। अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को होगी।
मदरसा संचालकों और अभिभावकों के लिए इसका क्या मतलब है?
फिलहाल किसी भी मदरसे पर तुरंत कार्रवाई का आदेश नहीं आया है, इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन संकेत साफ हैं — आने वाले समय में पंजीकरण, मानक और दस्तावेजों की जांच बढ़ सकती है। जिन संस्थाओं के कागज पूरे हैं, शिक्षक योग्य हैं और पढ़ाई व्यवस्थित है, उनके लिए यह प्रक्रिया सामान्य रहेगी। कमजोर दस्तावेजों या अधूरे मानकों वाली संस्थाओं को अपनी व्यवस्था दुरुस्त करने का मौका और दबाव, दोनों मिलेंगे।
अभिभावकों के लिए सलाह यही है कि वे अपने बच्चे के मदरसे की पंजीकरण स्थिति और पढ़ाई की व्यवस्था के बारे में जानकारी रखें। अगर आगे यूनिक स्टूडेंट आईडी या डिजिटल पोर्टल जैसी व्यवस्था लागू होती है, तो बच्चों का रिकॉर्ड पारदर्शी होगा और आगे की पढ़ाई में स्थानांतरण जैसी प्रक्रियाएं आसान हो सकती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सवाल 1: हाईकोर्ट ने सरकार से क्या मांगा है?
अदालत ने अतिरिक्त महाधिवक्ता बी.एल. भाटी के माध्यम से सरकार से विस्तृत हलफनामा मांगा है, जिसमें मदरसों के प्रभावी प्रबंधन, नियंत्रण और संचालन को लेकर उठाए जाने वाले कदमों का ब्योरा देना होगा।
सवाल 2: यह मामला कितने मदरसों से जुड़ा है?
याचिका और सुनवाई का दायरा प्रदेश में संचालित करीब 3,000 मदरसों से जुड़ा बताया गया है।
सवाल 3: क्या मदरसों का पंजीकरण तुरंत रद्द होगा?
नहीं। पंजीकरण रद्द करने और भूमि वापस लेने जैसे बिंदु याचिकाकर्ता के सुझाव हैं। इन पर फैसला सरकार की रिपोर्ट और आगे की सुनवाई के बाद ही होगा। फिलहाल ऐसा कोई तत्काल आदेश नहीं है।
सवाल 4: अगली सुनवाई कब है?
मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को तय की गई है।
फिलहाल सबकी नजर सरकार के हलफनामे पर है। 27 अक्टूबर की सुनवाई में साफ होगा कि मदरसा शिक्षा को लेकर राजस्थान में कितना बड़ा बदलाव आने वाला है।