देशभर के 400 जिलों से एक ही दिन एक ही मांग उठी है — बांसवाड़ा की मानगढ़ पहाड़ी को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मिले। राजस्थान वनवासी कल्याण परिषद और कई अन्य संगठनों के नेतृत्व में गुरुवार को जिला कलेक्टरों और उपखंड अधिकारियों के माध्यम से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन सौंपे गए। ज्ञापन में साफ लिखा है: मानगढ़ धाम सिर्फ एक पहाड़ी नहीं, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक जीवंत अध्याय है, और इस जनजातीय बलिदान को अब वही सम्मान मिलना चाहिए जो उसे बहुत पहले मिल जाना चाहिए था।
मानगढ़ धाम राष्ट्रीय स्मारक की मांग नई नहीं है। 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां आए थे, राष्ट्रपति ने हाल में श्रद्धांजलि दी थी, और जनजाति आयोग भी सिफारिश कर चुका है। फिर भी औपचारिक दर्जा नहीं मिला — और इसी ने इस बार देशव्यापी अभियान को जन्म दिया।
मानगढ़ धाम राष्ट्रीय स्मारक: 22 अक्टूबर को 400 जिलों से उठी एक आवाज
इस देशव्यापी अभियान की सबसे ठोस तस्वीर भीलवाड़ा से आई। वहां वनवासी कल्याण परिषद के जिला उपाध्यक्ष कैलाश सोनी ने बताया कि ज्ञापन अतिरिक्त जिला कलेक्टर के माध्यम से सौंपा गया। इसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राजस्थान के राज्यपाल और मुख्यमंत्री — चारों के नाम मांग रखी गई: मानगढ़ धाम को अविलंब राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जाए और इसके ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व के अनुरूप इसका संरक्षण और विकास सुनिश्चित हो।
नगरी प्रमुख राम प्रकाश अग्रवाल के साथ दिवाकर जावा, पदम जैन, कैलाश नंदावत और ज्ञानचंद जैन भी ज्ञापन देने वाली टीम में शामिल थे। परिषद ने ज्ञापन में इस बात पर जोर दिया कि स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समाज का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, और मानगढ़ की घटना उस योगदान का सबसे बड़ा प्रतीक है। बांसवाड़ा, उदयपुर, कुशलगढ़ और बारां समेत राजस्थान के कई जिलों में इसी तरह प्रशासनिक माध्यमों से ज्ञापन दिए गए।
आयोजकों का कहना है कि अभियान में सामाजिक और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधि, संत-महात्मा और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल हैं। उनका आह्वान सीधा है — समाज के सभी वर्ग और जनप्रतिनिधि इस मांग के समर्थन में एकजुट हों।
17 नवंबर 1913: वह दिन जब पहाड़ी लहूलुहान हुई
मानगढ़ धाम की कहानी समझने के लिए 110 साल से भी ज्यादा पीछे जाना पड़ता है। 17 नवंबर 1913 को मानगढ़ पहाड़ी पर अंग्रेजी शासन की गोलियों का सामना करते हुए बड़ी संख्या में जनजातीय महिला, पुरुष और बच्चों ने प्राणों की आहुति दी थी। अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक करीब 1500 भील आंदोलनकारी उस गोलीबारी में शहीद हुए — संख्या इतनी बड़ी कि इतिहासकार इसे आदिवासी समाज का जलियांवाला बाग कहते हैं, और यह घटना जलियांवाला बाग (1919) से भी पहले की है।
इस बलिदान के पीछे थे संत गोविंद गुरु, जिनके नेतृत्व में भगत आंदोलन चल रहा था। भगत आंदोलन कोई अचानक भड़की भीड़ नहीं था — यह जनजातीय समाज में स्वाभिमान, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना जगाने वाला एक संगठित आंदोलन था। गोविंद गुरु ने शराबबंदी, स्वच्छता, शिक्षा और एकता का संदेश दिया था। अंग्रेजी हुकूमत और स्थानीय सामंती व्यवस्था, दोनों को इस जागृति से खतरा महसूस हुआ, और उसी का नतीजा 17 नवंबर 1913 की वह त्रासदी थी।
ज्ञापन में भी इसी बात को दर्ज किया गया है — भगत आंदोलन जनजातीय समाज की अस्मिता की रक्षा, सामंती शोषण और अन्यायपूर्ण औपनिवेशिक व्यवस्था के विरोध में संचालित हुआ था। यह बलिदान सिर्फ राजस्थान का नहीं, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के जनजातीय समाज की साझा विरासत है।
मानगढ़ धाम राष्ट्रीय स्मारक की मांग के पीछे 3 बड़े तर्क
वनवासी कल्याण परिषद और समर्थक संगठनों की दलील के तीन आधार हैं। पहला, ऐतिहासिक न्याय: इतने बड़े बलिदान को राष्ट्रीय स्तर पर वह पहचान नहीं मिली जो मिलनी चाहिए थी। दूसरा, संरक्षण: राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मिलने से धाम का वैज्ञानिक संरक्षण, दस्तावेजीकरण और विकास संभव होगा — शोध-आधारित रिपोर्टों और जनजाति आयोग की सिफारिशों को ठोस नीति में बदला जा सकेगा। तीसरा, प्रेरणा: आयोजकों के मुताबिक यह स्थल आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति और राष्ट्रनिष्ठा की प्रेरणा देगा।
समर्थक प्रधानमंत्री की 2022 की यात्रा और राष्ट्रपति की हालिया श्रद्धांजलि का हवाला देते हैं — सरकार इस स्थल के महत्व को पहले ही रेखांकित कर चुकी है, अब औपचारिक दर्जा बाकी है।
अब तक का सफर: मांग से आंदोलन तक
लेकिन इस बार का अभियान सिर्फ एक ज्ञापन नहीं, देश के 400 जिलों में एक साथ उठी आवाज है — और यही इसे पहले की मांगों से अलग बनाता है।
आयोजकों की रणनीति स्पष्ट है: जिला प्रशासन के माध्यम से संवैधानिक पदों तक मांग पहुंचाई जाए, ताकि इसे टाला न जा सके।
एक नजर में: मानगढ़ धाम से जुड़े अहम तथ्य
| विषय | विवरण |
|---|---|
| स्थान | मानगढ़ पहाड़ी, जिला बांसवाड़ा, राजस्थान |
| ऐतिहासिक घटना | 17 नवंबर 1913 को अंग्रेजी शासन की गोलीबारी |
| आंदोलन के नेता | संत गोविंद गुरु (भगत आंदोलन) |
| अनुमानित बलिदान | करीब 1500 जनजातीय आंदोलनकारी |
| वर्तमान मांग | राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा |
| ज्ञापन सौंपने वाले | वनवासी कल्याण परिषद व अन्य संगठन, 400 जिलों में |
| ज्ञापन के प्राप्तकर्ता | राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री |
| आधार | जनजाति आयोग की सिफारिशें, शोध रिपोर्टें |
मानगढ़ धाम घूमने की योजना बना रहे हैं? ये जानना जरूरी है
मानगढ़ धाम बांसवाड़ा शहर से करीब 80 किलोमीटर दूर गुजरात सीमा के पास स्थित है। हर साल नवंबर में यहां शहीदी दिवस के आसपास बड़ा आयोजन होता है — अगर आप उस समय जाएं तो भारी भीड़ और सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने को मिलेंगे। सामान्य दिनों में यहां शांतिपूर्ण दर्शन और पहाड़ी का प्राकृतिक नजारा दोनों मिलते हैं।
राजस्थान पर्यटन विभाग की ओर से इस क्षेत्र के विकास पर लगातार काम हो रहा है, और राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मिलने पर यहां पर्यटन सुविधाओं में भी बड़ा इजाफा होने की उम्मीद है। राजस्थान में धार्मिक पर्यटन वैसे भी लगातार बढ़ रहा है — हाल के आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ 6 महीनों में 14 जैन तीर्थों पर 28.79 लाख घरेलू पर्यटक पहुंचे, जिनमें बांसवाड़ा का आंदेश्वर जैन तीर्थ भी शामिल है। प्रदेश में लोक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए लंबी यात्राएं भी निकलती रहती हैं, जो आदिवासी नृत्य और ढोल-मांदल की थाप को मंच देती हैं। आदिवासी संस्कृति, इतिहास और प्रकृति — तीनों का संगम देखने के लिए मानगढ़ धाम दक्षिणी राजस्थान के सबसे अर्थपूर्ण स्थलों में से एक है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1: मानगढ़ धाम कहां स्थित है? उत्तर: मानगढ़ धाम राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में, गुजरात सीमा के पास एक पहाड़ी पर स्थित है। यह जनजातीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख स्मारक स्थल है।
प्रश्न 2: 17 नवंबर 1913 को क्या हुआ था? उत्तर: संत गोविंद गुरु के भगत आंदोलन से जुड़े हजारों आदिवासी मानगढ़ पहाड़ी पर एकत्र हुए थे, जिन पर अंग्रेजी शासन ने गोलीबारी की। अनुमानतः करीब 1500 जनजातीय लोग शहीद हुए — इसे आदिवासी समाज का जलियांवाला बाग कहा जाता है।
प्रश्न 3: मांग कौन कर रहा है? उत्तर: वनवासी कल्याण परिषद और अन्य संगठनों ने 22 अक्टूबर 2026 को देश के 400 जिलों में जिला प्रशासन के माध्यम से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपे।
प्रश्न 4: क्या सरकार ने पहले भी इस मांग पर कुछ कहा है? उत्तर: हां। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 में मानगढ़ धाम की यात्रा की थी, राष्ट्रपति ने हाल में श्रद्धांजलि दी थी, और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग भी सिफारिशें कर चुका है। लेकिन औपचारिक राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा अब तक नहीं मिला है।
स्रोत: जयपुर टाइम्स, प्रातःकाल, भीलवाड़ा हलचल (22 अक्टूबर 2026)