जोधपुर केमिकल फैक्ट्री अग्निकांड: 3 दमकलकर्मियों की मौत, 7000 रुपये वेतन पर जान जोखिम में डाल रहे फायर फाइटर्स

23 सितंबर की रात जोधपुर के बासनी इलाके में एक केमिकल गोदाम और फैक्ट्री में लगी आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों में से 13 आग की चपेट में आ गए। इनमें से तीन युवा फायर फाइटर्स — प्रीतेश, सुरेंद्र और प्रदीप — इलाज के दौरान दम तोड़ चुके हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि ये तीनों ठेके पर काम करने वाले कर्मी थे, जिन्हें महज 7000 रुपये मासिक वेतन मिलता था और जिनके पास बुनियादी सुरक्षा उपकरण भी पूरे नहीं थे। यह सिर्फ एक हादसे की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की कहानी है जिसमें जान बचाने वाले खुद सबसे असुरक्षित हैं।

हादसे के तथ्य: क्या-क्या सामने आया

23 सितंबर की रात बासनी थाना क्षेत्र के गणेश नगर श्रमिक कॉलोनी स्थित एक हैंडीक्राफ्ट फैक्ट्री और केमिकल गोदाम में आग लग गई। आग बुझाने के दौरान केमिकल में विस्फोट हुआ और 13 दमकलकर्मी चपेट में आ गए। सबसे पहले 26 सितंबर को फायर फाइटर प्रीतेश की इलाज के दौरान मौत हुई। फिर सुरेंद्र (उम्र 22 वर्ष) ने दम तोड़ा — वे करीब 60 प्रतिशत तक झुलस गए थे और वेंटिलेटर पर थे। इसके बाद प्रदीप की मौत हुई, जो 70 प्रतिशत से अधिक झुलसे थे। घायलों में से 6 का इलाज जयपुर के एसएमएस अस्पताल में चल रहा है, जबकि जोधपुर के महात्मा गांधी अस्पताल में प्रवीण, कुणाल, दुर्गेश और विनय भर्ती हैं।

जांच में ये भी सामने आया कि जिन रसायनों का भंडारण फैक्ट्री में किया गया था, उनके लिए कोई लाइसेंस नहीं था और सुरक्षा उपकरण भी नहीं लगाए गए थे। फैक्ट्री मालिक राजेंद्र अग्रवाल घटना के बाद से गायब था — पुलिस ने पहले उसके बेटे को और फिर उसे गिरफ्तार किया। उस पर गंभीर धाराओं में मामला दर्ज है।

7000 रुपये की नौकरी: ठेके का पूरा गणित

जोधपुर नगर निगम में करीब 120 दमकल कर्मी वर्तमान में ठेके पर काम कर रहे हैं, जिनमें से कई 5-6 साल से यह काम कर रहे हैं, लेकिन आज तक नियमित नहीं हो पाए। दस्तावेजों में इनका दर्जा “कुशल श्रमिक” का है — 309 रुपये प्रतिदिन, यानी पीएफ कटने के बाद हाथ में करीब 7000 रुपये मासिक। ठेका फायर ब्रिगेड गाड़ियों के हिसाब से होता है, दमकल कर्मियों के हिसाब से नहीं: एक गाड़ी पर तीन फायरमैन और एक ड्राइवर की टीम तय है, और ठेकेदार उसी हिसाब से मानव संसाधन देता है। कर्मियों की मांग है कि फायर मैन के लिए ट्रेनिंग अनिवार्य होनी चाहिए, क्योंकि अभी दस्तावेजों में इन्हें सिर्फ सामान्य श्रमिक दिखाया जाता है।

तंबू में चल रहा फायर स्टेशन

जोधपुर शहर में नगर निगम के पांच फायर स्टेशन हैं — मुख्य फायर स्टेशन शास्त्री नगर में है, बाकी नागोरी गेट, मंडोर, बासनी और चौपासनी हाउसिंग बोर्ड में हैं। चौपासनी हाउसिंग बोर्ड का फायर स्टेशन तो एक तंबू में चल रहा है। वहां तैनात फायर फाइटर्स दिन-रात उसी तंबू में रहते हैं। आसपास खाली इलाका होने से सांप के आने का डर भी लगा रहता है। सुविधा के नाम पर तंबू में पलंग और एक कूलर है, और भोजन बनाने की जगह की हालत भी ठीक नहीं है। जो लोग शहर की आग बुझाते हैं, उनका अपना “स्टेशन” ही तंबू है।

नियमित क्यों नहीं हो पा रहे ठेका कर्मी?

निगम के रिटायर्ड फायरमैन हेमराज शर्मा बताते हैं कि ठेके पर काम करने वालों को अनुभव के दम पर नियमित नहीं हो पाता, क्योंकि भर्ती में लिखित परीक्षा और मेडिकल फिटनेस अनिवार्य है। प्रीतेश और सुरेंद्र ने महज दो माह पहले ही डिप्लोमा किया था, और प्रदीप करीब छह माह से काम कर रहा था। तीनों की उम्र 21 से 25 साल के बीच थी — एक तरह से ये सभी अभी प्रशिक्षण चरण में थे।

निगम के चीफ फायर ऑफिसर जलज घसिया का पक्ष भी जानना जरूरी है। उनके मुताबिक सुरक्षा के सभी उपकरण निगम के पास उपलब्ध हैं, हालांकि फायर शूट (आग-रोधी सूट) कम हैं, लेकिन वो भी उपलब्ध हो रहे हैं। उनका कहना है कि विस्फोट होने पर किसी भी तरह के सुरक्षा उपकरण से बचाव संभव नहीं होता।

प्रशासन की प्रतिक्रिया और मांगें

चीफ फायर ऑफिसर ने सरकार से मांग की है कि मृतकों को शहीद का दर्जा दिया जाए, परिवार को एक-एक करोड़ रुपये की सहायता मिले और परिवार के एक सदस्य को संविदा पर नौकरी मिले। दमकल कर्मियों को भी होम गार्ड और सिविल डिफेंस वर्कर की तरह लगाने की मांग की गई है, ताकि इन्हें सम्मानजनक वेतन मिल सके।

आंकड़ों में जोधपुर दमकल व्यवस्था की स्थिति

बिंदु आंकड़ा
नगर निगम के फायर स्टेशन 5
ठेके पर काम करने वाले दमकल कर्मी करीब 120
मासिक वेतन (पीएफ कटने के बाद) करीब 7000 रुपये
रोज़ का वेतन (दस्तावेजों में) 309 रुपये
23 सितंबर के हादसे में झुलसे कर्मी 13
हादसे में हुई मौतें 3 (प्रीतेश, सुरेंद्र, प्रदीप)
मृतकों के परिवार को घोषित सहायता 20 लाख + संविदा नौकरी
घायलों को घोषित सहायता 5-5 लाख रुपये

सुरक्षा उपकरण: नियम क्या कहते हैं

नेशनल बिल्डिंग कोड (NBC 2016) और ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) के मुताबिक फायर फाइटर्स के लिए फायर टर्नआउट सूट (तीन परतों वाला अग्निरोधी कपड़ा), SCBA (धुएं में सांस लेने का उपकरण), फायर हेलमेट, हीट रेसिस्टेंट दस्ताने और स्टील-टो वाले गमबूट अनिवार्य हैं। सवाल ये है कि जब नियम इतने स्पष्ट हैं, तो 7000 रुपये के वेतन पर काम करने वाले कर्मियों तक ये उपकरण क्यों नहीं पहुंचते?

दीपावली से पहले आग से बचाव: आम नागरिक क्या करें

दीपावली नजदीक है और इसी दौरान आग की घटनाएं सबसे ज्यादा होती हैं। पटाखे हमेशा खुली जगह में और बड़ों की निगरानी में जलाएं। दीये-मोमबत्तियां पर्दों से दूर रखें। एक ही स्विच बोर्ड में कई उपकरण न लगाएं। गैस की गंध आए तो बिजली का स्विच न दबाएं। आग लगने पर तुरंत 101 (फायर ब्रिगेड) या 112 (आपातकालीन) नंबर पर कॉल करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न 1: जोधपुर अग्निकांड में किन दमकलकर्मियों की मौत हुई?

उत्तर: 23 सितंबर 2026 को बासनी स्थित फैक्ट्री में आग बुझाते समय विस्फोट में 13 दमकलकर्मी झुलसे थे। प्रीतेश, सुरेंद्र (22 वर्ष) और प्रदीप की इलाज के दौरान मौत हो गई।

प्रश्न 2: मृतकों के परिवार को क्या सहायता मिलेगी?

उत्तर: कलेक्टर की घोषणा के मुताबिक 20 लाख रुपये और परिवार के एक सदस्य को संविदा नौकरी मिलेगी। घायलों को पांच-पांच लाख रुपये मिलेंगे।

प्रश्न 3: दमकल कर्मी ठेके पर क्यों हैं?

उत्तर: नगर निगम के करीब 120 दमकल कर्मी ठेके पर हैं। भर्ती में लिखित परीक्षा और मेडिकल फिटनेस अनिवार्य होने से अनुभवी ठेका कर्मी नियमित नहीं हो पा रहे। दस्तावेजों में इन्हें “कुशल श्रमिक” दिखाया जाता है और करीब 7000 रुपये मासिक वेतन मिलता है।

प्रश्न 4: फैक्ट्री मालिक पर क्या कार्रवाई हुई?

उत्तर: बिना लाइसेंस केमिकल भंडारण और सुरक्षा उपकरणों की कमी सामने आई। पुलिस ने फैक्ट्री मालिक राजेंद्र अग्रवाल और उसके बेटे को गिरफ्तार कर गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया है।

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