जयपुर सिग्नल फ्री योजना: JDA के 600 करोड़ के मास्टर प्लान पर एक्सपर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

जयपुर सिग्नल फ्री योजना को लेकर राजधानी में नई बहस छिड़ गई है। जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) जवाहरलाल नेहरू (JLN) मार्ग को पूरी तरह सिग्नल-फ्री बनाने के लिए 500 से 600 करोड़ रुपये की महात्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है। लेकिन शहरी नियोजन और ट्रैफिक प्रबंधन के विशेषज्ञों ने इस भारी-भरकम बजट वाली परियोजना पर कड़ा ऐतराज जताया है। उनका कहना है कि जयपुर को महंगे कंक्रीट ढांचों के बजाय बेहतर ट्रैफिक प्रबंधन और मजबूत सार्वजनिक परिवहन की जरूरत है। यह टकराव अब इस सवाल में बदल गया है कि शहरों का विकास ड्राइंग बोर्ड से होगा या लोगों की असल जरूरतों से।

जयपुर सिग्नल फ्री योजना के 600 करोड़ के मास्टर प्लान में क्या है

JDA के प्रस्ताव के मुताबिक JLN मार्ग को सिग्नल-फ्री करने के लिए कई बड़े ढांचागत बदलाव एक साथ किए जाएंगे। सबसे बड़ा हिस्सा एक एलिवेटेड रोड का है, जो एसएमएस मेडिकल कॉलेज से राजस्थान यूनिवर्सिटी के बीच बनेगा। इसके अलावा गांधी सर्किल पर अंडरपास और बजाज नगर तिराहे पर क्लोवरलीफ फ्लाईओवर का निर्माण प्रस्तावित है। जगह-जगह यू-टर्न और डायवर्जन की व्यवस्था करके यातायात को बिना रुके निकालने का लक्ष्य है।

प्राधिकरण की योजना है कि स्वीकृति मिलने के बाद जयपुर सिग्नल फ्री योजना को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा। कोटा की तर्ज पर राजधानी के सबसे व्यस्त कॉरिडोर में से एक को बदलने का दावा करने वाली इस योजना के सार्वजनिक होते ही अर्बन प्लानर्स और ट्रैफिक विशेषज्ञों ने सवालों की बौछार कर दी है। JDA ने हाल ही में 575 करोड़ रुपये के विकास कार्यों को भी मंजूरी दी थी — ऐसे में 600 करोड़ का यह नया प्रस्ताव शहर के बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च को लेकर बहस और तेज कर रहा है।

जयपुर सिग्नल फ्री योजना पर एक्सपर्ट क्यों कह रहे हैं — प्रयोग फेल होगा

जयपुर के पूर्व नगर नियोजक एच.एस. संचेती ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहा कि शहर की भीड़भाड़ की समस्या भारी-भरकम निर्माण की घोषणा के बजाय बेहतर ट्रैफिक मैनेजमेंट से सुलझाई जा सकती थी। उनका तर्क है कि महल रोड पर यू-टर्न बनने के बावजूद लोग बैरिकेडिंग हटाकर गलत दिशा में वाहन ले जाते हैं — यानी जमीनी हकीकत और जनता के व्यवहार को समझे बिना बनाई गई योजनाएं बेकार साबित हो रही हैं।

पूर्व JDA इंजीनियर एन.सी. माथुर ने इस फैसले को राष्ट्रीय शहरी परिवहन नीति के मूल सिद्धांतों के विपरीत बताया। इस नीति का उद्देश्य वाहनों की आवाजाही के बजाय लोगों की गतिशीलता को प्राथमिकता देना है। माथुर के मुताबिक सड़कों पर पहला अधिकार पैदल चलने वालों का, फिर साइकिल चालकों और गैर-मोटराइज्ड यातायात का, उसके बाद बसों का और सबसे अंत में निजी वाहनों का होना चाहिए।

माथुर ने सवाल उठाया — JLN मार्ग पहले से चौड़ा है और वहां गाड़ियां 60 किमी प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार से चलती हैं, तो इतने महंगे इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत ही क्या है? उनकी मांग है कि ऐसे फैसलों में इंजीनियरों के साथ अर्बन प्लानर्स को भी शामिल किया जाए।

टोंक रोड और महल रोड की नाकामी क्या सिखाती है

विशेषज्ञों के विरोध के पीछे सिर्फ सिद्धांत नहीं, जयपुर का अपना ताजा अनुभव भी है। इससे पहले टोंक रोड और महल रोड पर ट्रैफिक सुचारू करने के नाम पर इसी तरह के प्रयोग किए गए थे, लेकिन वे पूरी तरह विफल रहे — वहां आज भी जाम की स्थिति बनी रहती है। संचेती का कहना है कि इन सड़कों पर करोड़ों खर्च के बाद भी नतीजा शून्य रहा, तो JLN मार्ग पर 600 करोड़ खर्च करके अलग नतीजे की उम्मीद क्यों की जाए?

JDA और ट्रैफिक पुलिस यातायात व्यवस्था को लेकर पहले भी सक्रिय रही है — हाल की ई-रिक्शा कार्रवाई इसका उदाहरण है। विशेषज्ञों के मुताबिक इन्हीं छोटे प्रबंधन उपायों को व्यवस्थित किया जाए तो बड़े निर्माण की जरूरत ही न पड़े।

प्रस्तावित निर्माण बनाम वैकल्पिक उपाय

प्रस्तावित निर्माण स्थान उद्देश्य
एलिवेटेड रोड एसएमएस मेडिकल कॉलेज से राजस्थान यूनिवर्सिटी JLN मार्ग पर निरंतर यातायात प्रवाह
अंडरपास गांधी सर्किल चौराहे पर जाम खत्म करना
क्लोवरलीफ फ्लाईओवर बजाज नगर तिराहा तीनों दिशाओं से सुगम आवागमन
यू-टर्न व डायवर्जन जगह-जगह सिग्नल हटाकर बिना रुके निकासी

विशेषज्ञों के विकल्प अलग हैं — सड़कों की मरम्मत और अतिक्रमण हटाना, सिग्नल का वैज्ञानिक प्रबंधन, सिटी बसों के रूट-सुधार और पैदल यात्रियों के लिए फुटपाथ। इनका खर्च निर्माण बजट के छोटे हिस्से में आएगा और असर जल्दी दिखेगा।

जयपुर सिग्नल फ्री योजना से आम नागरिक को क्या मिलेगा

अगर योजना स्वीकृत होती है तो JLN मार्ग पर सालों तक निर्माण चलेगा — यानी short-term में धूल, डायवर्जन और जाम बढ़ेगा, long-term में सिग्नल-फ्री आवागमन का वादा। टोंक रोड और महल रोड का अनुभव बताता है कि बिना जमीनी अध्ययन के बना ढांचा जाम खत्म नहीं करता, सिर्फ उसकी जगह बदल देता है।

JDA सीमा विस्तार के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों के अटके होने की खबरों के बीच यह सवाल और वाजिब हो जाता है कि सीमित संसाधन कहां लगाए जाएं — नए कंक्रीट ढांचों में या मौजूदा व्यवस्था को दुरुस्त करने में।

आगे क्या होगा

फिलहाल जयपुर सिग्नल फ्री योजना प्रस्ताव के स्तर पर है। स्वीकृति के बाद इसे चरणबद्ध लागू करने की बात कही गई है। लेकिन विशेषज्ञों के विरोध के बाद अब फैसला सिर्फ इंजीनियरिंग का नहीं, शहरी नीति का भी होगा। देखना यह है कि JDA अर्बन प्लानर्स को इस प्रक्रिया में शामिल करता है या नहीं — क्योंकि माथुर की मांग का सार यही है कि शहर लोगों के लिए बनता है, वाहनों के लिए नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न 1: जयपुर सिग्नल फ्री योजना की अनुमानित लागत कितनी है?

उत्तर: JDA के प्रस्ताव के अनुसार JLN मार्ग को सिग्नल-फ्री बनाने की अनुमानित लागत 500 से 600 करोड़ रुपये है।

प्रश्न 2: JLN मार्ग पर कौन-कौन से निर्माण प्रस्तावित हैं?

उत्तर: एसएमएस मेडिकल कॉलेज से राजस्थान यूनिवर्सिटी तक एलिवेटेड रोड, गांधी सर्किल पर अंडरपास, बजाज नगर तिराहे पर क्लोवरलीफ फ्लाईओवर और जगह-जगह यू-टर्न व डायवर्जन प्रस्तावित हैं।

प्रश्न 3: क्या इस योजना को मंजूरी मिल गई है?

उत्तर: नहीं। फिलहाल यह प्रस्ताव के स्तर पर है। स्वीकृति मिलने के बाद इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की योजना है।

प्रश्न 4: विशेषज्ञ इस योजना का विरोध क्यों कर रहे हैं?

उत्तर: एच.एस. संचेती और एन.सी. माथुर के मुताबिक टोंक रोड और महल रोड पर ऐसे प्रयोग पहले विफल हो चुके हैं। बेहतर ट्रैफिक मैनेजमेंट और सार्वजनिक परिवहन सस्ता व असरदार विकल्प है, और यह फैसला नेशनल अर्बन ट्रांसपोर्ट पॉलिसी के खिलाफ है।

स्रोत: नवभारत टाइम्स (21 अक्टूबर 2026)

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