कुचामनसिटी/डीडवाना। कल्पना कीजिए उस मेले की, जहां कभी लाखों मवेशियों की रौंके लगती थीं, जहां हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश से व्यापारी बैल खरीदने आते थे — आज वही मैदान सूना पड़ा है। डीडवाना के मशहूर इंडोलाव पशु मेले की इस बार की तस्वीर देखकर पशुपालकों के चेहरों पर चिंता की लकीरें साफ नजर आ रही हैं। गौवंश में फैली लम्पी बीमारी के बाद पशुपालन विभाग ने मेले में गायों और बैलों को लाने और उनकी खरीद-बिक्री पर रोक लगा दी है, और इसका असर इतना गहरा है कि मेले में मवेशियों की संख्या 60 प्रतिशत तक घट गई है।
जो पशुपालक अपने गौवंश के साथ मेला आ रहे हैं, उन्हें मेला प्रबंधन सख्ती से वापस लौटा रहा है। नतीजा — गौवंश की संख्या लगभग शून्य। दूर-दूर से आए व्यापारी खाली हाथ निराश लौटने को मजबूर हैं। यह कोई एक दिन की खबर नहीं है; राजस्थान के पशु मेलों पर पिछले एक दशक से संकट के बादल मंडरा रहे हैं, और लम्पी ने रही-सही कसर पूरी कर दी है।
लम्पी बीमारी: आखिर क्यों लगाई गई रोक?
पशु मेला प्रभारी खुमाराम सारण के अनुसार, राजस्थान में गौवंश में लम्पी बीमारी पनपने के बाद पशुपालन विभाग ने स्पष्ट आदेश जारी किए — पशु मेले में गौवंश को न लाया जाए और उनकी खरीद-फरोख्त न हो। उद्देश्य साफ है: संक्रमित जानवरों के संपर्क से बीमारी के फैलने का खतरा न बढ़े।
लेकिन इस एहतियाती कदम की कीमत व्यापारी और पशुपालक दोनों चुका रहे हैं। बैल, गायें और अन्य गौवंश मेले में पहुंच ही नहीं पा रहे, तो खरीद-फरोख्त होगी कैसे? बैलों व गायों की बिक्री न होने से दोनों पक्षों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। मेला प्रबंधन के मुताबिक, जो मेले नागौरी बैलों के नाम से देशभर में पहचाने जाते थे, उन्हीं मेलों में अब नागौरी बैलों और गौवंश की बिक्री पर रोक है।
नागौरी बैल: जिनके नाम पर था मेले की धाक
डीडवाना-कुचामन जिले के पशु मेले राष्ट्रीय पहचान रखते हैं। परबतसर का वीर तेजा पशु मेला, लाडनूं का पाबोलाव मेला और डीडवाना का इंडोलाव पशु मेला वर्षों से अपनी अलग छाप छोड़ते आए हैं। इन मेलों की सबसे बड़ी पहचान रही है — नागौरी नस्ल के बैल।
नागौरी नस्ल के बछड़े देशभर में खेती-बाड़ी के लिए उत्तम माने जाते हैं। दलदली जमीन पर फसलों के बीच हल चलाने में नागौरी बैल विशेष रूप से लाभकारी माने जाते हैं। साथ ही देश के अलग-अलग हिस्सों में नस्ल सुधार के लिए भी नागौरी बैलों की भारी खरीद होती आई है। यही कारण था कि हर साल हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश समेत कई राज्यों से पशुपालक इन्हें खरीदने डीडवाना पहुंचते थे।
एक दशक में कैसे सिमटा लाखों का मेला?
यह गिरावट रातों-रात नहीं आई। कुछ साल पहले तक डीडवाना पशु मेले में 70 हजार से एक लाख तक मवेशी पहुंचते थे। आज यह संख्या सिमटकर डेढ़ से 2 हजार ही रह गई है। इस पतन के पीछे कई परतें हैं:
| समय | मेले में मवेशियों की स्थिति | बड़ा कारण |
|---|---|---|
| एक दशक पहले | 70 हजार से 1 लाख तक मवेशी | मेले का स्वर्णिम दौर |
| कुछ साल पहले | गिरावट शुरू | नागौरी बछड़ों के राज्य से बाहर जाने पर रोक |
| पिछले वर्षों में | खरीदारों की हिचक | कथित गौरक्षा दलों की हिंसा का डर |
| 2026 (इस बार) | डेढ़–2 हजार; 60% और गिरावट | लम्पी बीमारी के चलते गौवंश की बिक्री पर रोक |
पहला झटका लगा जब नागौरी नस्ल के बछड़ों को राजस्थान से बाहर ले जाने पर रोक लगी। बाहरी पशुपालक बैलों को राजस्थान से बाहर नहीं ले जा सकते, तो खरीदने आएं क्यों?
दूसरा झटका कथित गौरक्षा दलों की हिंसा से जुड़ा है। पशुपालकों का कहना है कि जब वे नागौरी नस्ल के बैल खरीदकर अपने राज्यों में ले जाते हैं, तो रास्ते में पुलिस और कथित गौरक्षा दल उन्हें रोक लेते हैं। मेले में खरीद के वैध दस्तावेज दिखाने के बावजूद उन पर आरोप लगाया जाता है कि वे बैलों को काटने के लिए ले जा रहे हैं — जबकि सच्चाई यह है कि नागौरी बैल कृषि कार्य के लिए उत्तम माने जाते हैं। इस डर से मवेशियों के खरीदार मेले में आने से हिचकने लगे हैं।
तीसरा और ताजा झटका लम्पी बीमारी ने दिया, जिसने गौवंश की मौजूदगी ही शून्य कर दी।
निराश लौट रहे व्यापारी, टूट रहा पशुपालक
इस बार मेले की सबसे दुखद तस्वीर है — देश के अलग-अलग राज्यों से आए व्यापारियों का खाली हाथ लौटना। मवेशियों की संख्या में 60 प्रतिशत तक की कमी के चलते जो रौनक पशु मेले की होती थी, वह खत्म सी हो गई है। मेले में मवेशियों की संख्या में इतनी कमी आई है कि इसे लेकर मेला प्रबंधन भी चिंतित है।
पशुपालकों के लिए दोहरी मार है — एक तरफ उनके गौवंश को मेले में लाने की इजाजत नहीं, दूसरी तरफ खरीददार भी नहीं मिल रहे। पहले से ही संकट से जूझ रहा पशु मेला अब और अधिक चिंताजनक स्थिति में पहुंच गया है।
राजस्थान के पशु मेले: सांस्कृतिक धरोहर भी, आजीविका भी
पशु मेले राजस्थान की ग्रामीण संस्कृति और अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा रहे हैं। ये सिर्फ खरीद-बिक्री की जगह नहीं, बल्कि नस्ल संरक्षण, पशुपालन ज्ञान के आदान-प्रदान और ग्रामीण जीवन की पहचान के केंद्र हैं। डीडवाना का इंडोलाव मेला, परबतसर का वीर तेजा मेला और लाडनूं का पाबोलाव मेला — इन तीनों ने नागौरी बैलों की ख्याति देशभर में फैलाई।
जब ये मेले सिमटते हैं, तो नुकसान सिर्फ व्यापार का नहीं होता — एक पूरी परंपरा कमजोर होती है। पशुपालक, व्यापारी, परिवहन से जुड़े लोग और मेले के आसपास की दुकानदारी — सब पर असर पड़ता है।
आगे क्या? पशुपालकों के लिए जरूरी सलाह
- बीमारी से बचाव: लम्पी बीमारी के लक्षण (त्वचा पर गांठें, बुखार) दिखें तो तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें और बीमार जानवर को स्वस्थ पशुओं से अलग रखें।
- टीकाकरण: पशुपालन विभाग के टीकाकरण कार्यक्रम में अपने पशुओं को जरूर शामिल कराएं।
- वैध दस्तावेज: पशुओं की खरीद-बिक्री या परिवहन के समय वैध दस्तावेज हमेशा साथ रखें।
- विभागीय जानकारी: मेले और पाबंदियों से जुड़ी ताजा जानकारी के लिए स्थानीय पशुपालन विभाग के कार्यालय से संपर्क में रहें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: डीडवाना पशु मेले में इस बार मवेशियों की संख्या क्यों घटी?
उत्तर: गौवंश में लम्पी बीमारी फैलने के बाद पशुपालन विभाग ने मेले में गायों और बैलों को लाने व उनकी खरीद-बिक्री पर रोक लगा दी है। इसके चलते मवेशियों की संख्या में 60 प्रतिशत तक की कमी आई है।
प्रश्न 2: नागौरी बैल इतने प्रसिद्ध क्यों हैं?
उत्तर: नागौरी नस्ल के बैल खेती-बाड़ी के लिए उत्तम माने जाते हैं। दलदली जमीन पर फसलों के बीच हल चलाने में ये विशेष रूप से उपयोगी हैं, और देशभर में नस्ल सुधार के लिए भी इनकी भारी मांग रही है।
प्रश्न 3: डीडवाना के पशु मेले में पहले कितने मवेशी आते थे?
उत्तर: कुछ साल पहले तक मेले में 70 हजार से एक लाख तक मवेशी पहुंचते थे, जो अब सिमटकर डेढ़ से 2 हजार ही रह गए हैं।
प्रश्न 4: मेले के पतन के मुख्य कारण क्या हैं?
उत्तर: तीन बड़े कारण हैं — नागौरी नस्ल के बछड़ों के राजस्थान से बाहर ले जाने पर रोक, कथित गौरक्षा दलों की हिंसा से खरीदारों में डर, और अब लम्पी बीमारी के चलते गौवंश की बिक्री पर रोक।
स्रोत: ईटीवी भारत राजस्थान (5 अक्टूबर 2026), पशु मेला प्रभारी खुमाराम सारण।