मेवाड़ के सीताफल किसानों की सबसे बड़ी दिक्कत अब खत्म होने की राह पर है। चित्तौड़गढ़ में प्रदेश की पहली चित्तौड़गढ़ सीताफल प्रोसेसिंग यूनिट बनने जा रही है, जिस पर कुल 2.30 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। सीजन में सस्ते दाम पर फल बेचने की मजबूरी, पकने के बाद दो-तीन दिन में खराब हो जाने का डर और बिचौलियों पर निर्भरता — इन तीनों पुरानी समस्याओं का इलाज एक साथ इस एक यूनिट से मिलने की उम्मीद है। सरकार ने निर्माण मार्च 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है, और जिम्मेदारी राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड के भीलवाड़ा खंड को दी गई है।
पहले समझिए: सीताफल किसान आज कहां अटकते हैं
सीताफल, जिसे शरीफा या कस्टर्ड एप्पल भी कहते हैं, स्वाद में जितना शानदार है, संभालने में उतना ही नाजुक है। पेड़ से टूटने के बाद यह महज दो से तीन दिन में नरम पड़कर खराब होने लगता है। नतीजा यह कि सीजन के चरम पर जब एक साथ बड़ी आवक मंडियों में पहुंचती है, तो भाव धड़ाम से गिर जाते हैं। किसान के पास न तो फल रोककर रखने का साधन होता है, न ही उससे कोई दूसरा उत्पाद बनाने की सुविधा। मजबूरी में वह जो भाव मिले, उसी पर बेच देता है — और असली मुनाफा बिचौलियों की जेब में चला जाता है।
कृषि अर्थशास्त्री मानते हैं कि फल के प्रसंस्करण की सुविधा किसान की आय बढ़ाने का सबसे सीधा रास्ता है। कच्चा फल सस्ता बिकता है, लेकिन उसी का पल्प या गूदा बन जाए तो कीमत कई गुना बढ़ जाती है — और वह सालभर बिक सकता है। चित्तौड़गढ़ की यह नई यूनिट ठीक इसी कमी को पूरा करेगी।
चित्तौड़गढ़ सीताफल प्रोसेसिंग यूनिट: 2.30 करोड़ का पूरा हिसाब
परियोजना पर खर्च होने वाले 2.30 करोड़ रुपये का ब्योरा भी सामने आ गया है:
| खर्च का मद | राशि |
| यूनिट का निर्माण कार्य | 1.25 करोड़ रुपये |
| अत्याधुनिक प्रसंस्करण मशीनरी | 75 लाख रुपये |
| किसान प्रशिक्षण व 1008 वर्ग मीटर शेडनेट हाउस | 30 लाख रुपये |
| कुल लागत | 2.30 करोड़ रुपये |
पूरी यूनिट पांच हजार वर्ग मीटर परिसर में बनेगी। सबसे बड़ा हिस्सा — 1.25 करोड़ — स्थायी ढांचे पर लगेगा, यानी यह कोई अस्थायी जुगाड़ नहीं, बल्कि लंबे समय चलने वाली औद्योगिक सुविधा है। मशीनरी पर 75 लाख का खर्च बताता है कि प्रसंस्करण आधुनिक तकनीक से होगा। और 30 लाख रुपये प्रशिक्षण पर लगाना इस बात का संकेत है कि सरकार किसानों को इस नई व्यवस्था से जोड़ने की भी तैयारी कर रही है।
राज्य में औद्योगिक निवेश की रफ्तार वैसे भी तेज है — हाल ही में रीको की प्रत्यक्ष आवंटन योजना के 14वें चरण में 94 औद्योगिक क्षेत्रों में 4,700 से ज्यादा भूखंड खोले गए थे। चित्तौड़गढ़ सीताफल प्रोसेसिंग यूनिट उसी कड़ी में कृषि-आधारित उद्योग का एक अहम उदाहरण है।
फल से पल्प तक: यूनिट के अंदर चार चरणों में होगा काम
यूनिट के मुख्य हॉल को चार हिस्सों में बांटा जाएगा, और फल एक तय क्रम से इनसे गुजरेगा। पहले चरण में किसानों से खरीदे गए फल का सुरक्षित भंडारण होगा। दूसरे चरण में फलों की सफाई, धुलाई और सुखाने की प्रक्रिया होगी। तीसरे चरण में मशीनों से सीताफल का पल्प यानी गूदा निकाला जाएगा — यही वह चरण है जहां कच्चे फल का असली मूल्य संवर्धन होता है। चौथे और आखिरी चरण में तैयार पल्प की पैकिंग होगी, जिसके बाद वह बाजार या बड़ी कंपनियों तक भेजने के लिए तैयार होगा।
माइनस 40 डिग्री का फायदा: सीजन खत्म, कमाई जारी
चित्तौड़गढ़ सीताफल प्रोसेसिंग यूनिट की सबसे खास बात इसका प्रशीतन तंत्र है — तैयार पल्प को माइनस 40 डिग्री सेल्सियस पर रखा जाएगा। इतने कम तापमान पर गूदा महीनों तक ताजगी और स्वाद बनाए रखता है। यानी सीताफल का सीजन चाहे दो महीने का हो, उसका पल्प पूरे साल बेचा जा सकेगा।
इससे दो बड़े बदलाव आएंगे। पहला, सीजन में मंडियों में अचानक आई आवक से भाव नहीं गिरेंगे, क्योंकि किसान फल सीधे यूनिट को बेच सकेंगे। दूसरा, ऑफ-सीजन में भी पल्प की आपूर्ति बनी रहेगी, जिससे दाम स्थिर रहेंगे। आइसक्रीम और मिठाई बनाने वाली बड़ी कंपनियां सालभर पल्प खरीदती हैं — पहले भी ऐसी कंपनियों से बातचीत की खबरें आती रही हैं। फसल के बाद मूल्य संवर्धन का ऐसा ही उदाहरण झालावाड़ की सोलर ड्रायर अनुदान योजना में भी दिखा था।
चित्तौड़गढ़ सीताफल प्रोसेसिंग यूनिट: किसानों और युवाओं को क्या मिलेगा
यूनिट के संचालन, मशीनों के रखरखाव, पैकिंग, कोल्ड स्टोरेज प्रबंधन और परिवहन में स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा। किसानों के लिए 1008 वर्ग मीटर का शेडनेट हाउस बनेगा, जहां पौध संरक्षण के साथ उन्नत खेती का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा — किसान सिर्फ फल बेचने वाला नहीं, इस पूरी मूल्य-श्रृंखला का जानकार भागीदार बनेगा।
इस परियोजना की नींव एक दशक पुरानी मेहनत पर टिकी है। केंद्र की राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत चित्तौड़गढ़ के उत्कृष्टता केंद्र में 2016-17 से सीताफल पर शोध चल रहा है — छह राज्यों से मंगवाकर 31 उन्नत किस्में तैयार की गईं और पांच हेक्टेयर में 1221 पौधे लगाए गए। सोलापुर की “गोल्डन” (NMK-3) किस्म का एक फल 900 ग्राम तक का होता है। रिसर्च से प्रोसेसिंग तक का यह सफर अब मुकाम पर पहुंच रहा है। किसानों को व्यवस्था के केंद्र में रखने की इसी सोच का हिस्सा राजस्थान की किसान आईडी योजना भी है।
टाइमलाइन: यूनिट कब तक तैयार होगी
सरकार ने मार्च 2027 तक निर्माण पूरा करने का लक्ष्य रखा है; काम राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड का भीलवाड़ा खंड कराएगा। यानी अगले डेढ़ साल में मेवाड़ के किसान इस सुविधा का इस्तेमाल शुरू कर सकेंगे। जो किसान अभी से तैयारी करना चाहते हैं, वे उन्नत किस्मों के पौधे लगाएं और उद्यान विभाग के प्रशिक्षण से जुड़ें — गुणवत्ता वाला फल देने वाला किसान ही सबसे ज्यादा फायदा उठाएगा। विभागीय जानकारियों के लिए राजस्थान कृषि विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर भी नजर रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1: चित्तौड़गढ़ सीताफल प्रोसेसिंग यूनिट कहां बन रही है?
उत्तर: चित्तौड़गढ़ में — यह प्रदेश की पहली सीताफल प्रोसेसिंग यूनिट होगी, जो पांच हजार वर्ग मीटर परिसर में बनेगी।
प्रश्न 2: कुल लागत कितनी है?
उत्तर: 2.30 करोड़ रुपये — 1.25 करोड़ निर्माण, 75 लाख मशीनरी और 30 लाख प्रशिक्षण व शेडनेट हाउस पर।
प्रश्न 3: यूनिट कब तक तैयार होगी?
उत्तर: मार्च 2027 तक निर्माण पूरा करने का लक्ष्य है; काम कृषि विपणन बोर्ड का भीलवाड़ा खंड कराएगा।
प्रश्न 4: किसानों को सीधा क्या फायदा मिलेगा?
उत्तर: सीजन में सस्ते भाव की मजबूरी खत्म होगी, माइनस 40 डिग्री स्टोरेज से पल्प सालभर बिकेगा जिससे दाम स्थिर रहेंगे, और उन्नत खेती का प्रशिक्षण भी मिलेगा।