एम्बुलेंस की लॉगबुक में लिखा था — “नर्सिंग अधीक्षक को घर छोड़ा गया।” बस इतनी सी एक लाइन ने अलवर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में भूचाल ला दिया है। अलवर एम्बुलेंस विवाद की यह कहानी तब सुर्खियों में आई जब एम्बुलेंस की लॉगबुक के पन्ने और दो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए, और मामला सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) तक पहुंच गया। आरोप है कि अलवर के राजकीय राजीव गांधी सामान्य चिकित्सालय की नर्सिंग अधीक्षक सुशीला वर्मा मरीजों के लिए आवंटित सरकारी एम्बुलेंस का इस्तेमाल अपने घर आने-जाने के लिए कर रही थीं।
सरकारी एम्बुलेंस किसी अफसर की गाड़ी नहीं होती। यह वो वाहन है जिसे हर सुबह किसी गंभीर मरीज के इंतजार में अस्पताल के गेट पर खड़ा रहना चाहिए। यही सवाल अब अलवर से लेकर जयपुर तक चिकित्सा विभाग के गलियारों में गूंज रहा है।
लॉगबुक के पन्नों ने कैसे खोला राज
इस पूरे प्रकरण का खुलासा तब हुआ जब एम्बुलेंस की लॉगबुक के वे पन्ने बाहर आ गए जिनमें स्पष्ट रूप से दर्ज था कि नर्सिंग अधीक्षक को घर छोड़ा गया (पत्रिका की रिपोर्ट)। लॉगबुक के एक नहीं, अलग-अलग पन्नों पर ऐसी एंट्री दर्ज मिली। मतलब यह एक बार की चूक नहीं थी — ये एंट्री कई मौकों पर हुई थीं।
इसके साथ ही नर्सिंग अधीक्षक के एम्बुलेंस से जाते हुए दो वीडियो भी सामने आए, जो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। लॉगबुक की एंट्री और वीडियो — ये दो सबूत एक-दूसरे की पुष्टि करते दिखे, और मामला सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंच गया।
शिकायत सीएमओ तक पहुंची, जांच की मशीनरी चली
मुख्यमंत्री कार्यालय ने मामले को गंभीरता से लिया। सीएमओ ने यह शिकायत स्वास्थ्य विभाग के निदेशक को जांच के लिए भेजी, जिन्होंने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) से रिपोर्ट तलब की। यानी अब यह मामला नीचे से ऊपर तक तीन स्तरों पर दर्ज हो चुका है — शिकायत, निर्देश और रिपोर्ट।
अस्पताल स्तर पर भी हलचल तेज हुई। अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधिकारी (पीएमओ) डॉ. प्रेम सैनी ने फिजिशियन डॉ. सुरेश मीणा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच टीम गठित कर दी। इस टीम में डॉ. कुश कुंदनानी और डॉ. हितेंद्र शेखावत शामिल हैं। टीम अब लॉगबुक की एंट्री, वीडियो की सत्यता और संबंधित स्टाफ के बयान के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी।
पीएमओ डॉ. प्रेम सैनी का कहना है — “इस प्रकरण में तीन सदस्यीय जांच टीम गठित कर दी गई है। जैसे ही कमेटी की रिपोर्ट आएगी, उसी आधार पर एक्शन लेंगे और सीएमओ को भी रिपोर्ट भेजेंगे।”
नर्सिंग अधीक्षक का पक्ष: “रेगुलर कभी नहीं किया”
किसी भी मामले में दोनों पक्ष सुनना जरूरी है, और इस मामले में आरोपी अधिकारी ने भी अपनी बात रखी है। नर्सिंग अधीक्षक सुशीला वर्मा का कहना है कि उन्होंने “कभी-कभार ड्यूटी के दौरान ओवरटाइम होने के कारण ही एम्बुलेंस का प्रयोग किया है, रेगुलर कभी नहीं किया।” उनका दावा है कि इसका जवाब उन्होंने उच्चाधिकारियों को दे दिया है।
उनका यह भी कहना है — “जांच करवाएंगे, तो सब साफ हो जाएगा। कुछ लोग अपने हित साधने के लिए शिकायत करते हैं।” यानी उनके मुताबिक यह शिकायत किसी निजी हित से प्रेरित हो सकती है। अब सवाल यह है कि लॉगबुक की कई एंट्री और वायरल वीडियो के सामने यह सफाई जांच टीम को कितनी संतुष्ट कर पाती है।
नियम क्या कहते हैं? सरकारी एम्बुलेंस का इस्तेमाल कहां तक
यहां असली सवाल नियमों का है। सरकारी एम्बुलेंस मरीजों को लाने-ले जाने और चिकित्सा संबंधी आपात जरूरतों के लिए उपलब्ध कराई जाती है। इसका निजी आवागमन — जैसे घर आना-जाना — नियमों के अनुरूप नहीं है। अस्पताल के वाहनों के उपयोग के लिए तय प्रोटोकॉल होता है: हर यात्रा लॉगबुक में दर्ज होती है, और हर एंट्री के पीछे आधिकारिक मकसद होना चाहिए।
इस मामले में लॉगबुक में जो दर्ज है, वह आधिकारिक मकसद की बजाय निजी यात्रा की ओर इशारा करता है। अगर जांच में यह सिद्ध हो जाता है, तो यह सिर्फ एक नियम का उल्लंघन नहीं होगा — यह उस भरोसे का उल्लंघन होगा जो एक मरीज अस्पताल की व्यवस्था पर करता है। सोचिए, जिस समय एम्बुलेंस किसी को घर छोड़ रही थी, उसी समय हो सकता है कोई मरीज इंतजार कर रहा हो।
राजस्थान में स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही पर बड़ा सवाल
अलवर एम्बुलेंस विवाद सिर्फ एक अधिकारी की कहानी नहीं — यह जवाबदेही की कहानी है। अच्छी बात यह रही कि शिकायत दबने की बजाय सीएमओ तक पहुंची और अब जांच चल रही है। प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर ऐसे सवाल पहले भी उठे हैं — जैसे भीलवाड़ा में नर्सों का आंदोलन और आभानेरी CHC में डॉक्टरों की कमी। अगर लॉगबुक जैसी दस्तावेजी सबूत व्यवस्था में मौजूद हैं, तो गलत काम ज्यादा देर छिप नहीं सकता।
पूरा घटनाक्रम: एक नजर में
| तारीख/समय | घटनाक्रम |
| अक्टूबर 2026 | एम्बुलेंस की लॉगबुक के पन्ने और 2 वीडियो वायरल हुए |
| अक्टूबर 2026 | शिकायत मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) तक पहुंची |
| अक्टूबर 2026 | सीएमओ ने शिकायत स्वास्थ्य विभाग के निदेशक को भेजी |
| अक्टूबर 2026 | सीएमएचओ से रिपोर्ट तलब की गई |
| अक्टूबर 2026 | पीएमओ ने डॉ. सुरेश मीणा की अध्यक्षता में 3 सदस्यीय जांच टीम बनाई |
| आगे | जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई और सीएमओ को रिपोर्ट |
आगे क्या होगा?
अब सबकी नजरें तीन सदस्यीय जांच टीम की रिपोर्ट पर हैं। रिपोर्ट आने के बाद ही तय होगा कि नर्सिंग अधीक्षक के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है — चेतावनी, स्थानांतरण, निलंबन या कुछ और। पीएमओ ने स्पष्ट किया है कि रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई होगी और सीएमओ को भी सूचित किया जाएगा।
इस बीच नर्सिंग अधीक्षक सुशीला वर्मा का कहना है कि जांच में सब साफ हो जाएगा। वहीं शिकायतकर्ता पक्ष की उम्मीद है कि सच सामने आएगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सवाल: अलवर एम्बुलेंस विवाद क्या है?
जवाब: अलवर के राजकीय राजीव गांधी सामान्य चिकित्सालय की नर्सिंग अधीक्षक सुशीला वर्मा पर आरोप है कि उन्होंने मरीजों के लिए आवंटित सरकारी एम्बुलेंस का इस्तेमाल अपने घर आने-जाने के लिए किया। एम्बुलेंस की लॉगबुक के पन्नों में “नर्सिंग अधीक्षक को घर छोड़ा गया” दर्ज मिला है और दो वीडियो भी वायरल हुए हैं।
सवाल: मामले की शिकायत कहां तक पहुंची है?
जवाब: शिकायत मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) तक पहुंची है। सीएमओ ने इसे स्वास्थ्य विभाग के निदेशक को भेजा, जिन्होंने सीएमएचओ से रिपोर्ट मांगी है। अस्पताल के पीएमओ ने तीन सदस्यीय जांच टीम गठित की है।
सवाल: जांच टीम में कौन-कौन हैं?
जवाब: फिजिशियन डॉ. सुरेश मीणा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय टीम बनाई गई है, जिसमें डॉ. कुश कुंदनानी और डॉ. हितेंद्र शेखावत शामिल हैं।
सवाल: नर्सिंग अधीक्षक का इस पर क्या कहना है?
जवाब: सुशीला वर्मा का कहना है कि कभी-कभार ड्यूटी में ओवरटाइम होने पर ही एम्बुलेंस का इस्तेमाल किया, नियमित रूप से नहीं। उनका दावा है कि जांच में सब साफ हो जाएगा।
सवाल: सरकारी एम्बुलेंस के नियम क्या कहते हैं?
जवाब: सरकारी एम्बुलेंस मरीजों को लाने-ले जाने और चिकित्सा संबंधी आपात जरूरतों के लिए होती है। निजी आवागमन जैसे घर आने-जाने के लिए इसका इस्तेमाल नियमों के अनुरूप नहीं है। हर यात्रा लॉगबुक में दर्ज होनी चाहिए।