शारदीय नवरात्र के अवसर पर बहरोड़ के दहमी-हमजापुर गांव में स्थित प्राचीन मनसा माता मंदिर में मनसा माता मेला बहरोड़ का तीन दिवसीय वार्षिक आयोजन शनिवार से शुरू हो गया है। मेले के पहले ही दिन मंदिर परिसर ‘जय माता दी’ के जयकारों से गूंज उठा और दूर-दराज के इलाकों से श्रद्धालु यहां पहुंचने लगे। इस बार के आयोजन की सबसे खास बात यह है कि राजस्थान के विभिन्न जिलों के साथ-साथ दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, मुंबई, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल तक से बड़ी संख्या में भक्त माता के दरबार में मत्था टेकने आए हैं। नवरात्र का मौका, प्राचीन सिद्धपीठ की आस्था और तीन दिन का भक्तिमय माहौल — इन सबने मिलकर मेले को इस साल और भी बड़ा रूप दे दिया है।
मनसा माता मेला बहरोड़: तीन दिन की भक्ति, जानें पूरा कार्यक्रम
यह वार्षिक मेला शारदीय नवरात्र में हर साल आयोजित होता है और इस बार यह 17 से 19 अक्टूबर तक चलेगा। दहमी-हमजापुर का यह प्राचीन मंदिर मनसा माता के सिद्धपीठ के रूप में जाना जाता है, जहां मनोकामना पूर्ण होने की आस्था से लोग पीढ़ियों से आते रहे हैं।
मेले के पहले दिन से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं। भक्त माता के दरबार में मत्था टेककर अपने परिवार की सुख-समृद्धि की मनोकामनाएं मांग रहे हैं। शारदीय नवरात्र का आठवां दिन यानी महाष्टमी 19 अक्टूबर को पड़ेगा, और मनसा माता मेला बहरोड़ का समापन भी उसी दिन होगा — इसलिए आखिरी दिन और ज्यादा भीड़ उमड़ने की उम्मीद है।
मनसा माता मेला बहरोड़ की परंपराएं जो इसे खास बनाती हैं
इस मेले की पहचान सिर्फ भीड़ या बाजार नहीं है, बल्कि वे धार्मिक परंपराएं हैं जिनके लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। सबसे भावुक दृश्य उन परिवारों का होता है जो अपने नवजात शिशुओं के मुंडन (जड़ूला) संस्कार के लिए यहां पहुंचते हैं। आस्था है कि बच्चे का पहला मुंडन माता के दरबार में कराने से उसे सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य का आशीर्वाद मिलता है। इसी तरह नवविवाहित जोड़े गठजोड़े की जात लगाने भी भारी संख्या में आते हैं — यह वह परंपरा है जिसमें दूल्हा-दुल्हन माता के सामने अपने वैवाहिक जीवन की सुख-शांति की कामना करते हैं।
इन संस्कारों के अलावा मेले में जगह-जगह विशाल भंडारों का आयोजन किया गया है। विभिन्न सामाजिक संगठन और श्रद्धालु मिलकर आने वाले दर्शनार्थियों को प्रसाद और भोजन वितरित कर रहे हैं।
श्रद्धालुओं के लिए की गई व्यवस्थाएं
मेले में बड़ी संख्या में भीड़ को देखते हुए प्रशासन, मेला कमेटी और स्वयंसेवी संगठनों ने मिलकर व्यापक प्रबंध किए हैं। पुलिस प्रशासन, श्रीकृष्ण नवयुवक मंडल और स्काउट-गाइड के स्वयंसेवकों ने मेले की कमान संभाल रखी है।
| व्यवस्था | विवरण |
|---|---|
| पेयजल | मंदिर परिसर और मेला क्षेत्र में पेयजल की विशेष व्यवस्था |
| विद्युत आपूर्ति | निर्बाध बिजली की व्यवस्था, रात में रोशनी का प्रबंध |
| प्राथमिक चिकित्सा | आपात स्थिति के लिए प्राथमिक चिकित्सा सुविधा |
| पार्किंग | वाहनों के लिए सुव्यवस्थित पार्किंग की अलग व्यवस्था |
| सुरक्षा | भीड़ नियंत्रण और कानून-व्यवस्था के लिए पुलिस बल तैनात |
| स्वयंसेवक | श्रीकृष्ण नवयुवक मंडल और स्काउट-गाइड के कैडेट सक्रिय |
| भंडारे | सामाजिक संगठनों द्वारा जगह-जगह विशाल भंडारे |
श्रीकृष्ण नवयुवक मंडल और स्काउट-गाइड के कैडेट्स कतारबद्ध दर्शन कराने में मदद कर रहे हैं और बुजुर्ग व महिला श्रद्धालुओं की सहायता के लिए मंदिर परिसर में निरंतर सक्रिय हैं।
मेले में जाने से पहले काम की बातें
अगर आप मनसा माता मेला बहरोड़ में दर्शन के लिए जाने का मन बना रहे हैं, तो कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है ताकि यात्रा सुखद रहे:
- तारीख याद रखें: मनसा माता मेला बहरोड़ 17 से 19 अक्टूबर तक है। 19 अक्टूबर महाष्टमी का दिन है — उसकी तिथि-मुहूर्त की पूरी जानकारी यहां पढ़ें। आखिरी दिन सबसे ज्यादा भीड़ रहेगी, इसलिए सुबह जल्दी पहुंचने की कोशिश करें।
- बच्चों और बुजुर्गों का ख्याल: भीड़ में बच्चों को हमेशा साथ रखकर चलें। जड़ूला संस्कार के लिए आने वाले परिवार सुबह जल्दी आ जाएं — दोपहर में धूप और भीड़ दोनों बढ़ जाती है।
- पानी और भोजन: मंदिर परिसर में पेयजल की व्यवस्था है, फिर भी अपनी पानी की बोतल साथ रखें। भंडारों में प्रसाद मिलेगा, लेकिन छोटे बच्चों के लिए अपना नाश्ता साथ रखना बेहतर है।
- पार्किंग: वाहनों के लिए अलग पार्किंग की व्यवस्था की गई है। मंदिर के बहुत पास वाहन ले जाने की कोशिश न करें — प्रशासन के निर्देशों का पालन करें।
- सुरक्षा: भीड़भाड़ वाले स्थानों पर अपनी कीमती वस्तुओं का ध्यान रखें। मनसा माता मेला बहरोड़ में पुलिस बल तैनात है, किसी भी असुविधा पर तुरंत पुलिस या स्वयंसेवकों से संपर्क करें।
नवरात्रि के दौरान प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिल रही है। उदयपुर में नवरात्रि के पहले दिन से ही देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा था, जहां अंबामाता, नीमज माता और आवरी माता जैसे प्रसिद्ध मंदिरों में विशेष तैयारियां की गई थीं।
शारदीय नवरात्र में राजस्थान के मेलों का सांस्कृतिक महत्व
राजस्थान में नवरात्रि सिर्फ पूजा-अर्चना का पर्व नहीं, बल्कि ग्रामीण संस्कृति और लोक आस्था का उत्सव भी है। बहरोड़ जैसा ही दृश्य इस समय प्रदेश के कई शक्तिपीठों पर देखने को मिल रहा है। ये मेले स्थानीय कारीगरों, मिठाई विक्रेताओं और छोटे व्यापारियों को भी रोजगार देते हैं। पहले दिन के उत्साह से साफ है कि महाष्टमी यानी मेले के समापन पर दहमी-हमजापुर में आस्था का सबसे बड़ा जमावड़ा होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: मनसा माता मेला बहरोड़ कब से कब तक चलेगा?
उत्तर: यह तीन दिवसीय वार्षिक मेला 17 अक्टूबर से शुरू हुआ है और 19 अक्टूबर तक चलेगा। शारदीय नवरात्र के अवसर पर यह हर साल दहमी-हमजापुर स्थित प्राचीन मनसा माता मंदिर में आयोजित होता है।
प्रश्न 2: मेले में कौन-कौन सी धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं?
उत्तर: श्रद्धालु माता के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि की मनोकामनाएं मांगते हैं। विशेष रूप से नवजात शिशुओं के मुंडन (जड़ूला) संस्कार और नवविवाहित जोड़ों के गठजोड़े की जात लगाने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है।
प्रश्न 3: मेले में श्रद्धालुओं के लिए क्या-क्या व्यवस्थाएं की गई हैं?
उत्तर: पेयजल, निर्बाध विद्युत आपूर्ति, प्राथमिक चिकित्सा, सुव्यवस्थित पार्किंग, पुलिस बल की तैनाती और जगह-जगह भंडारों की व्यवस्था की गई है। श्रीकृष्ण नवयुवक मंडल और स्काउट-गाइड के स्वयंसेवक भी सक्रिय हैं।
प्रश्न 4: बहरोड़ का मनसा माता मंदिर कहां स्थित है और कितने राज्यों से श्रद्धालु आते हैं?
उत्तर: यह मंदिर बहरोड़ नगर परिषद क्षेत्र के दहमी-हमजापुर गांव में स्थित प्राचीन सिद्धपीठ है। मेले में राजस्थान के विभिन्न जिलों के साथ दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, मुंबई, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।
स्रोत: इस खबर के तथ्य khaskhabar.com की प्रकाशित रिपोर्ट (17 अक्टूबर 2026) से सत्यापित किए गए हैं।