डीग में एनीमिया के खिलाफ बड़ा अभियान: श्रेणीवार जांच का प्रस्ताव, कलेक्टर ने दिए सख्त निर्देश

खून की कमी यानी एनीमिया — यह वह बीमारी है जो दिखती नहीं, लेकिन चुपचाप लाखों महिलाओं और बच्चों की सेहत खोखली कर रही है। अब डीग जिले में इसके खिलाफ सबसे बड़ी लड़ाई की तैयारी हो रही है। डीग एनीमिया जांच अभियान के तहत जिला प्रशासन श्रेणीवार सामूहिक जांच का प्रस्ताव तैयार कर रहा है, यानी अलग-अलग उम्र और वर्ग के लोगों की अलग-अलग रणनीति से जांच होगी और जिसके खून में कमी पाई जाएगी, उसे उसी श्रेणी के हिसाब से इलाज मिलेगा।

गुरुवार को कलेक्ट्रेट सभागार में जिला कलेक्टर मयंक मनीष ने जिला स्वास्थ्य समिति की बैठक लेकर स्वास्थ्य सेवाओं की पूरी समीक्षा की। बैठक में सीएमएचओ डॉ. विजय सिंघल समेत चिकित्सा विभाग के अधिकारी मौजूद रहे। एनीमिया के अलावा अस्पतालों के निर्माण, प्रसव सेवाओं के विस्तार, टीकाकरण और दीवाली पर खाद्य सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर भी फैसले लिए गए।

डीग एनीमिया जांच अभियान: बैठक में क्या-क्या तय हुआ?

डीग एनीमिया जांच अभियान को लेकर कलेक्टर ने सबसे पहले तीनों संबंधित विभागों — महिला एवं बाल विकास, चिकित्सा और शिक्षा — के बीच तालमेल पर जोर दिया। निर्देश दिए गए कि एनीमिया नियंत्रण के लिए तीनों विभागों की संयुक्त बैठक आयोजित की जाए, ताकि आंगनबाड़ी, स्कूल और अस्पताल — तीनों मोर्चों पर एक साथ काम हो।

दूसरा बड़ा निर्देश जयपुर मुख्यालय को पत्र लिखकर आवश्यक कार्यवाही करने का है, ताकि डीग एनीमिया जांच अभियान को राज्य मुख्यालय के साथ जोड़कर अमल में लाया जा सके।

तीसरा, जिले में एनीमिया की सामूहिक जांच के लिए श्रेणीवार प्रस्ताव तैयार करने को कहा गया है। जांच में जिसके भीतर एनीमिया पाया जाएगा, उसकी श्रेणी के अनुसार उपचार और जरूरी हस्तक्षेप की कार्ययोजना बनेगी — बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और आम महिलाओं के लिए अलग-अलग प्रोटोकॉल लागू होगा।

एनीमिया कितनी बड़ी समस्या है? आंकड़े चौंकाने वाले

एनीमिया को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के मुताबिक राजस्थान में करीब आधी महिलाएं और दो-तिहाई से ज्यादा छोटे बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं। गर्भवती महिलाओं में यह दर और भी चिंताजनक मानी जाती है, क्योंकि खून की कमी से प्रसव के समय जटिलताओं का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

वर्ग अनुमानित स्थिति (NFHS-5)
15-49 वर्ष की महिलाएं करीब आधी एनीमिया से पीड़ित
6-59 माह के बच्चे दो-तिहाई से ज्यादा प्रभावित
गर्भवती महिलाएं चिंताजनक स्तर पर खून की कमी

एनीमिया के लक्षण अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं — लगातार थकान, चक्कर आना, सांस फूलना, नाखूनों का सफेद पड़ना और ध्यान केंद्रित न कर पाना। बच्चों में यह शारीरिक और मानसिक विकास को धीमा कर देता है। इसीलिए समय पर जांच और आयरन-फोलिक एसिड की खुराक इतनी अहम है। केंद्र सरकार का एनीमिया मुक्त भारत अभियान इसी लक्ष्य पर काम कर रहा है — 6 माह से 19 वर्ष तक के बच्चों-किशोरों और प्रजनन आयु की महिलाओं में एनीमिया कम करना।

डीग एनीमिया जांच अभियान: श्रेणीवार जांच का मतलब क्या?

श्रेणीवार जांच का सीधा मतलब है — सबके लिए एक जैसा फॉर्मूला नहीं। इस अभियान में प्रस्तावित व्यवस्था के तहत:

– स्कूली बच्चे और किशोरियां: शिक्षा विभाग और स्कूलों के जरिए जांच, साप्ताहिक आयरन-फोलिक एसिड (WIFS) कार्यक्रम से जोड़ा जाएगा।
– गर्भवती महिलाएं: आंगनबाड़ी और एएनएम के माध्यम से एएनसी पंजीकरण के समय ही हीमोग्लोबिन जांच।
– धात्री और प्रजनन आयु की महिलाएं: स्वास्थ्य केंद्रों पर नियमित स्क्रीनिंग।

जिस श्रेणी में एनीमिया मिलेगा, उसी के अनुसार दवा, खुराक और फॉलो-अप तय होगा। गंभीर मामलों में रेफरल की व्यवस्था भी कार्ययोजना का हिस्सा होगी।

गौरतलब है कि मातृ स्वास्थ्य को लेकर प्रदेश में पहले से सख्ती बढ़ रही है — हाल ही में मुख्य सचिव ने 104 जननी एक्सप्रेस सेवा की समीक्षा में गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाने के निर्देश दिए थे। (पढ़ें: 104 जननी एक्सप्रेस: हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी पर सख्ती)

अस्पताल निर्माण और प्रसव सेवाओं पर भी बड़े फैसले

बैठक सिर्फ एनीमिया तक सीमित नहीं रही। चिकित्सा विभाग की बजट घोषणाओं की समीक्षा में बताया गया कि कामां अस्पताल के निर्माण के लिए निविदा आमंत्रण सूचना (NIT) जारी हो चुकी है, जबकि खोह और पूंछरी का लौठा में अस्पताल निर्माण का काम प्रगति पर है। कलेक्टर ने सभी निर्माण कार्यों को समयबद्ध ढंग से पूरा करने पर जोर दिया।

प्रसव सेवाओं की समीक्षा में निर्देश दिए गए कि जिन चिकित्सा संस्थानों में प्रसव नहीं हो रहे हैं, वहां सेवाएं शुरू कराने के प्रयास किए जाएं। इसके लिए अक्टूबर और नवंबर माह के संभावित प्रसव लक्ष्य तय किए जाएंगे और एएनएम सहित अन्य कार्मिकों को जरूरी प्रशिक्षण दिया जाएगा। संस्थानवार लक्ष्य तय करके मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाई जाएगी।

इसके अलावा टीबी नोटिफिकेशन शत-प्रतिशत करने, कुम्हेर ब्लॉक में एएनसी पंजीकरण बढ़ाने और डीग-कुम्हेर में टीकाकरण कार्यक्रम की प्रगति सुधारने के निर्देश भी दिए गए।

दीवाली पर खाद्य सुरक्षा: मिलावटखोरों पर रहेगी नजर

बैठक में दीवाली के मद्देनजर खाद्य सुरक्षा अधिकारियों को सक्रिय रहने के निर्देश दिए गए। त्योहारी सीजन में मिठाइयों और खाद्य पदार्थों में मिलावट की आशंका बढ़ जाती है, इसलिए नमूनों की जांच की संख्या बढ़ाने को कहा गया है। आम उपभोक्ताओं के लिए यह राहत की खबर है — लेकिन सतर्कता भी जरूरी है। मिठाई खरीदते समय प्रतिष्ठित दुकान से ही खरीदें, पैकेजिंग पर निर्माण तिथि जरूर देखें और किसी भी संदिग्ध खाद्य पदार्थ की शिकायत खाद्य सुरक्षा अधिकारी से करें।

स्वास्थ्य योजनाओं में पारदर्शिता को लेकर प्रदेश में वैसे भी सख्ती का दौर चल रहा है — हाल ही में मां योजना के तहत अस्पतालों के भुगतान संकट की खबरें सामने आई थीं। (पढ़ें: मां योजना: 25 लाख का कवर, फिर भी अस्पतालों में ‘नो एंट्री’)

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न 1: डीग में एनीमिया को लेकर क्या फैसला लिया गया है?

उत्तर: डीग एनीमिया जांच अभियान के तहत जिला कलेक्टर ने श्रेणीवार सामूहिक जांच का प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए हैं। जांच में एनीमिया पाए जाने पर संबंधित श्रेणी के अनुसार उपचार की कार्ययोजना बनेगी।

प्रश्न 2: बैठक में कौन-कौन से विभाग शामिल होंगे?

उत्तर: महिला एवं बाल विकास, चिकित्सा और शिक्षा — तीनों विभागों की संयुक्त बैठक होगी ताकि आंगनबाड़ी, स्कूल और अस्पताल स्तर पर समन्वित काम हो सके।

प्रश्न 3: डीग में कौन-से अस्पतालों का निर्माण चल रहा है?

उत्तर: कामां अस्पताल के लिए निविदा सूचना जारी हो चुकी है, जबकि खोह और पूंछरी का लौठा में अस्पताल निर्माण कार्य प्रगति पर है।

प्रश्न 4: एनीमिया के लक्षण क्या हैं और जांच कहां कराएं?

उत्तर: लगातार थकान, चक्कर, सांस फूलना और नाखूनों का सफेद पड़ना प्रमुख लक्षण हैं। नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र, आंगनबाड़ी या एएनएम के माध्यम से निःशुल्क हीमोग्लोबिन जांच कराई जा सकती है।

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