सोचिए, आपके कस्बे का इकलौता बड़ा सरकारी अस्पताल — जिस पर डेढ़ लाख लोग इलाज के लिए निर्भर हैं — वहां डॉक्टरों के 28 पद तो स्वीकृत हैं, लेकिन काम कर रहे हैं सिर्फ 5 डॉक्टर। बाकी 23 पद खाली पड़े हैं। छोटीसादड़ी अस्पताल डॉक्टर कमी का ये मामला प्रतापगढ़ जिले के छोटीसादड़ी स्थित जयचंद मोहिल उप जिला चिकित्सालय की आज की हकीकत है। सोमवार को जब भाजपा नगर अध्यक्ष प्रकाश कुमावत ने अस्पताल का जायजा लिया, तो डॉक्टरों की ये भारी कमी सामने आई — और अब ये मुद्दा विधायक के सामने उठाया जाएगा।
छोटीसादड़ी अस्पताल डॉक्टर कमी: निरीक्षण में क्या सामने आया
सोमवार को भाजपा नगर अध्यक्ष प्रकाश कुमावत छोटीसादड़ी के जयचंद मोहिल उप जिला चिकित्सालय पहुंचे। मकसद था — अस्पताल में डॉक्टरों की कमी और चिकित्सा सुविधाओं की असली स्थिति जानना। वहां उन्होंने प्रमुख चिकित्सा अधिकारी (पीएमओ) डॉ. विजय कुमार गर्ग से मुलाकात की और सीधे सवाल पूछे — कितनी सुविधाएं उपलब्ध हैं, कितने चिकित्सक काम कर रहे हैं, कितने पद खाली हैं।
बातचीत में डॉक्टरों की कमी से मरीजों को हो रही परेशानियों पर भी चर्चा हुई। निरीक्षण के बाद प्रकाश कुमावत ने कहा कि ये मुद्दा विधायक के सामने उठाया जाएगा, ताकि पर्याप्त चिकित्सकों की नियुक्ति हो और मरीजों को इलाज के लिए परेशान न होना पड़े।
ये तस्वीर नई नहीं: कई बार लिखे गए पत्र, फिर भी 23 पद खाली
इस मामले को गंभीर बनाने वाली बात ये है कि छोटीसादड़ी अस्पताल में डॉक्टरों की कमी कोई आज की समस्या नहीं है। पीएमओ डॉ. विजय कुमार गर्ग के मुताबिक, चिकित्सकों की कमी को लेकर कई बार उच्च अधिकारियों को पत्र लिखकर अवगत कराया जा चुका है — लेकिन रिक्त पदों को भरने की दिशा में अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया।
यानी अस्पताल प्रशासन अपनी ओर से आवाज उठाता रहा, फाइलें ऊपर भेजी जाती रहीं, फिर भी 23 पद आज भी खाली हैं। पांच डॉक्टरों के कंधों पर डेढ़ लाख लोगों की सेहत का बोझ है, और मरीजों की संख्या के मुकाबले ये कमी चिकित्सा सेवाओं के संचालन में लगातार चुनौती बनी हुई है।
गौरतलब है कि करीब नौ महीने पहले छोटी सादड़ी में डॉक्टरों की इसी कमी को लेकर एक सामाजिक कार्यकर्ता आमरण अनशन पर भी बैठे थे। तब मांग थी कि अस्पताल को सर्जन और हड्डी रोग विशेषज्ञ जैसे विशेषज्ञ डॉक्टर चाहिए, न कि खानापूर्ति। वो आंदोलन भी इसी जड़ की ओर इशारा करता था — उप जिला चिकित्सालय होते हुए भी यहां विशेषज्ञ चिकित्सकों का टोटा लंबे समय से चला आ रहा है।
जब 5 डॉक्टरों पर डेढ़ लाख का बोझ पड़े
आंकड़ों को करीब से देखिए — डेढ़ लाख की आबादी पर सिर्फ 5 डॉक्टर, यानी औसतन एक डॉक्टर पर करीब 30 हजार लोगों की जिम्मेदारी। ऐसी स्थिति में सबसे पहली मार ओपीडी पर पड़ती है: मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता है, और गंभीर मरीजों को भी समय पर विशेषज्ञ सलाह नहीं मिल पाती।
दूसरी बड़ी परेशानी रेफरल की है। जब अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टर ही नहीं होंगे, तो जटिल मामलों को बड़े शहरों के अस्पतालों में भेजना मजबूरी बन जाता है। छोटीसादड़ी जैसे कस्बे के गरीब मरीज के लिए ये सफर सिर्फ दूरी नहीं, खर्च भी है — और बीमारी में देरी कई बार जान का जोखिम बन जाती है।
तीसरी चिंता खुद डॉक्टरों की है। पांच चिकित्सकों पर 28 पदों का काम — यानी डबल ड्यूटी, थकान और बर्नआउट, जिसका असर लंबे समय में चिकित्सा की गुणवत्ता पर पड़ता है। यही वजह है कि बूंदी के जिला अस्पताल में दिल के डॉक्टर की कमी जैसी खबरें राजस्थान में बार-बार सामने आती हैं — ये किसी एक अस्पताल की कहानी नहीं है।
ग्रामीण राजस्थान में डॉक्टरों की कमी की जड़ कहां है
छोटीसादड़ी का मामला अकेला नहीं है। राजस्थान के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों के अस्पतालों में डॉक्टरों के खाली पद एक पुरानी और गहरी समस्या है, जिसके पीछे कई कारण एक साथ काम करते हैं।
पहला, डॉक्टर ग्रामीण पोस्टिंग से कतराते हैं — शहरों में प्राइवेट प्रैक्टिस और बेहतर सुविधाएं उन्हें महानगरों की ओर खींचती हैं। दूसरा, विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी सबसे ज्यादा खलती है — सर्जन और हड्डी रोग विशेषज्ञ जैसे पद सबसे ज्यादा खाली रहते हैं। तीसरा, भर्ती की धीमी रफ्तार: पद स्वीकृत होने और नियुक्ति होने के बीच का फासला कई बार सालों का होता है।
राज्य सरकार ने चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार पर जोर दिया है — नए मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों की निगरानी जैसे कदम उठाए गए हैं। लेकिन छोटीसादड़ी का मामला बताता है कि इमारतें और योजनाएं तभी काम करेंगी, जब उनमें डॉक्टर होंगे।
छोटीसादड़ी अस्पताल डॉक्टर कमी: अब विधायक के दरबार में उठेगा मामला
प्रकाश कुमावत के निरीक्षण के बाद अब गेंद विधायक के पाले में है। स्थानीय लोगों की मांग सीधी है — 23 खाली पद जल्द भरे जाएं, और सिर्फ सामान्य चिकित्सक ही नहीं, सर्जन और हड्डी रोग विशेषज्ञ जैसे विशेषज्ञ डॉक्टर भी तैनात हों। अस्पताल प्रशासन की ओर से उच्च अधिकारियों को पत्र पहले ही लिखे जा चुके हैं; अब राजनीतिक स्तर पर दबाव बनने से उम्मीद है कि भर्ती प्रक्रिया में तेजी आएगी।
सवाल ये भी है कि क्या ये मुद्दा सिर्फ आश्वासन तक सीमित रहेगा, या इस बार वाकई नियुक्ति होगी। बीकानेर के पीबीएम अस्पताल की खस्ताहालत जैसी खबरों के बीच ये मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि राजस्थान में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती इमारतें नहीं, उनमें काम करने वाले डॉक्टर हैं।
एक नजर में: छोटीसादड़ी अस्पताल के आंकड़े
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| अस्पताल | जयचंद मोहिल उप जिला चिकित्सालय, छोटीसादड़ी (प्रतापगढ़) |
| सेवा क्षेत्र की आबादी | करीब डेढ़ लाख |
| चिकित्सकों के स्वीकृत पद | 28 |
| वर्तमान में कार्यरत चिकित्सक | 5 |
| खाली पद | 23 |
| प्रमुख चिकित्सा अधिकारी | डॉ. विजय कुमार गर्ग |
| निरीक्षण | भाजपा नगर अध्यक्ष प्रकाश कुमावत (सोमवार) |
| अगला कदम | मुद्दा विधायक के सामने उठाया जाएगा |
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सवाल: छोटीसादड़ी का ये अस्पताल कहां स्थित है?
जवाब: ये प्रतापगढ़ जिले के छोटीसादड़ी कस्बे का प्रमुख सरकारी अस्पताल है, जिस पर करीब डेढ़ लाख की आबादी इलाज के लिए निर्भर है।
सवाल: अस्पताल में कितने डॉक्टर के पद खाली हैं?
जवाब: कुल 28 स्वीकृत पदों में से सिर्फ 5 पर डॉक्टर कार्यरत हैं — यानी 23 पद खाली हैं, जो स्वीकृत पदों के 80 फीसदी से ज्यादा है।
सवाल: डॉक्टरों की कमी का मुद्दा अब कहां उठेगा?
जवाब: भाजपा नगर अध्यक्ष प्रकाश कुमावत ने निरीक्षण के बाद कहा है कि ये मुद्दा विधायक के सामने उठाया जाएगा, ताकि खाली पदों पर जल्द नियुक्ति हो सके।
सवाल: क्या ये समस्या नई है?
जवाब: नहीं। अस्पताल प्रशासन कई बार उच्च अधिकारियों को पत्र लिख चुका है, और करीब नौ महीने पहले यहां डॉक्टरों की कमी पर एक सामाजिक कार्यकर्ता आमरण अनशन पर भी बैठे थे।
निष्कर्ष
छोटीसादड़ी के अस्पताल की कहानी एक असहज सवाल खड़ा करती है — जब कागज पर 28 डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं, तो जमीन पर सिर्फ 5 डॉक्टर क्यों हैं? डेढ़ लाख लोगों की सेहत के लिए खाली पदों पर ठोस नियुक्ति चाहिए, वो भी जल्द।
स्रोत: न्यूज18 राजस्थान – प्रतापगढ़ (13 अक्टूबर 2026)