कल्पना कीजिए — आप सरकारी अस्पताल में इलाज कराने गए, डॉक्टर ने दवा लिखी और खिड़की से वो दवा मुफ्त में मिल भी गई। लेकिन बाद में पता चले कि वो दवा गुणवत्ता जांच में पहले ही फेल हो चुकी थी। राजस्थान में ठीक ऐसा ही हुआ है। यहां के सरकारी अस्पतालों में बंटी 131 दवा बैचों को क्वालिटी कंट्रोल विंग पहले ही अमानक घोषित कर चुका था, फिर भी वो दवाएं मरीजों तक पहुंच गईं। इसी के साथ आरएमएससीएल दवा संकट प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
राजस्थान में आरएमएससीएल दवा संकट: अमानक दवाएं, टेंडर में देरी और ऑडिट के बड़े खुलासे
टेस्ट में फेल 131 दवा बैच मरीजों को कैसे बांट दिए गए
इस पूरे मामले का सबसे डराने वाला पहलू यही है। जांच के दौरान दवाओं के 131 ऐसे बैच सामने आए, जिन्हें क्वालिटी कंट्रोल विंग ने पहले ही नॉन-स्टैंडर्ड यानी अमानक करार दिया था। नियमों के मुताबिक ऐसी दवाओं को तुरंत सिस्टम से बाहर कर देना चाहिए था। लेकिन हुआ इसके उलट — सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों ने इन्हीं अमानक दवाओं को मरीजों में बांट दिया।
सबसे गंभीर बात ये है कि कॉरपोरेशन और स्वास्थ्य विभाग ने टेस्ट में फेल दवाओं के इस्तेमाल पर कोई असरदार रोक नहीं लगाई। यानी वो दवाएं, जो मरीज की जान को सीधे जोखिम में डाल सकती थीं, बिना रुकावट वितरण श्रृंखला में घूमती रहीं। एक गरीब मरीज को ये अंदाजा भी नहीं होता कि उसके हाथ आई गोली गुणवत्ता जांच में पहले ही खारिज हो चुकी है।
आरएमएससीएल दवा संकट की असली जड़: टेंडर प्रक्रिया में सालों की देरी
अब सवाल उठता है कि ये संकट पैदा कैसे हुआ। जवाब है — टेंडर और रेट कॉन्ट्रैक्ट में भारी देरी। राजस्थान मेडिकल सर्विस कॉरपोरेशन लिमिटेड (आरएमएससीएल) में पिछले डेढ़ से दो साल के दौरान दवा खरीद के टेंडर और गुणवत्ता जांच में बड़े पैमाने पर लापरवाही बरती गई।
स्थानीय निधि अंकेक्षण विभाग की ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, टेंडर की समय-सीमा खत्म होने के बाद भी एजेंसी ने एक-एक साल तक नए रेट कॉन्ट्रैक्ट नहीं किए। नतीजा? सरकारी अस्पतालों तक दवाओं की आपूर्ति बाधित हो गई। जब केंद्रीय आपूर्ति रुकी, तो अस्पतालों ने अपने स्तर पर औने-पौने दामों में दवाओं की जमकर खरीद शुरू कर दी — और इससे राज्य को बड़ा वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा।
ध्यान देने वाली बात ये भी है कि अधिकारियों ने स्थानीय स्तर पर खरीदी गई इन दवाओं की गुणवत्ता जांच तक नहीं करवाई — यानी दोहरा नुकसान: एक तरफ महंगी खरीद, दूसरी तरफ बिना जांच की दवा।
नियम क्या कहते हैं और कहां टूटी प्रक्रिया
राजस्थान पारदर्शिता लोक उपापन (आरटीपीपी) नियमों में इस स्थिति से निपटने का साफ प्रावधान है। नियम कहते हैं कि मौजूदा रेट कॉन्ट्रैक्ट खत्म होते ही नया रेट कॉन्ट्रैक्ट तुरंत प्रभावी होना चाहिए, ताकि बीच में कोई खाली अवधि न रहे। अगर किसी वजह से नया कॉन्ट्रैक्ट समय पर तैयार नहीं हो पाता, तो कॉरपोरेशन पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को उन्हीं कीमतों, नियमों और शर्तों पर अधिकतम तीन महीने तक बढ़ा सकता है — बशर्ते पहले ये पक्का कर लिया जाए कि बाजार में कीमतें गिरी नहीं हैं।
ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक एजेंसी ने इन प्रावधानों की खुलेआम अनदेखी की। न समय पर नया कॉन्ट्रैक्ट हुआ, न तीन महीने के विस्तार का विकल्प अपनाया गया। बस देरी होती रही — महीनों नहीं, साल भर तक। इसी लापरवाही ने मुफ्त दवा योजना की आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ दिया और अस्पतालों को मनमाने दामों पर स्थानीय खरीद के लिए मजबूर कर दिया।
ऑडिट रिपोर्ट के बड़े खुलासे — एक नजर में
| खुलासा | विवरण |
| अमानक दवा बैच | 131 बैच क्वालिटी टेस्ट में फेल होने के बावजूद मरीजों को बांटे गए |
| टेंडर में देरी | पुराने टेंडर की मियाद खत्म होने के बाद 1-1.5 साल तक नए रेट कॉन्ट्रैक्ट नहीं हुए |
| नियमों का उल्लंघन | आरटीपीपी नियमों के तहत 3 महीने के विस्तार का विकल्प भी नहीं अपनाया गया |
| वित्तीय नुकसान | अस्पतालों ने स्थानीय स्तर पर महंगे दामों में दवाएं खरीदीं, राज्य को बड़ा नुकसान |
| गुणवत्ता जांच की कमी | स्थानीय खरीद की दवाओं की क्वालिटी जांच तक नहीं करवाई गई |
| स्टोरेज व्यवस्था | दवाओं के भंडारण और गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली पर भी गंभीर सवाल |
आरएमएससीएल दवा संकट से मरीजों पर असर और आगे की राह
इस संकट का सीधा असर प्रदेश के उन लाखों मरीजों पर पड़ा है जो सरकारी अस्पतालों की मुफ्त दवा योजना पर निर्भर हैं। जब अस्पतालों में दवाओं की किल्लत होती है, तो मरीज को या तो बाहर से महंगी दवा खरीदनी पड़ती है या इलाज अधूरा छोड़ना पड़ता है। और जब अमानक दवा मिलती है, तो इलाज का नतीजा ही संदिग्ध हो जाता है।
ये पहला मौका नहीं है जब प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था में दवाओं को लेकर सवाल उठे हैं। हाल ही में टोंक के सआदत अस्पताल में दवा चोरी का मामला सामने आया था, जहां सरकारी दवाएं निजी क्लिनिक तक पहुंच रही थीं। वहीं पार्क ग्रुप के अस्पतालों पर आयकर छापे ने भी स्वास्थ्य क्षेत्र की वित्तीय अनियमितताओं की परतें खोली थीं।
आगे की राह साफ है — दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई, अमानक दवाओं की पूरी श्रृंखला की पहचान और उन्हें सिस्टम से बाहर करना, और रेट कॉन्ट्रैक्ट प्रक्रिया को नियमों के दायरे में लाना। जब तक ऐसा नहीं होता, मरीजों का भरोसा डगमगाता रहेगा। इस पूरे मामले पर अमर उजाला की विस्तृत रिपोर्ट में ऑडिट के तथ्यों को विस्तार से रखा गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
आरएमएससीएल क्या है?
राजस्थान मेडिकल सर्विस कॉरपोरेशन लिमिटेड (आरएमएससीएल) राज्य सरकार की वो एजेंसी है जो सरकारी अस्पतालों के लिए दवाओं की खरीद, गुणवत्ता जांच और आपूर्ति का काम करती है। प्रदेश की मुफ्त दवा योजना इसी के जरिए चलती है।
ऑडिट रिपोर्ट में सबसे बड़ा खुलासा क्या है?
रिपोर्ट के मुताबिक दवाओं के 131 ऐसे बैच मरीजों को बांट दिए गए, जिन्हें क्वालिटी कंट्रोल विंग पहले ही अमानक घोषित कर चुका था। साथ ही टेंडर प्रक्रिया में 1-1.5 साल की देरी और आरटीपीपी नियमों के उल्लंघन का भी खुलासा हुआ है।
टेंडर में देरी से मरीजों को क्या नुकसान हुआ?
रेट कॉन्ट्रैक्ट समय पर न होने से अस्पतालों में दवाओं की किल्लत पैदा हुई। अस्पतालों को स्थानीय स्तर पर महंगे दामों में दवाएं खरीदनी पड़ीं, जिनकी गुणवत्ता जांच भी नहीं हुई — इससे राज्य को वित्तीय नुकसान हुआ और मरीजों को जोखिम उठाना पड़ा।
क्या इस मामले में कार्रवाई होगी?
ऑडिट रिपोर्ट में अनियमितताएं दर्ज होने के बाद अब जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग उठ रही है। अमानक दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला की पूरी जांच और दोषियों पर सख्त कदम ही मरीजों का भरोसा लौटा सकते हैं।