राजस्थान के कपास किसानों के लिए बड़ी खबर: 5,659 करोड़ के कपास उत्पादकता मिशन में उत्तर भारत की रणनीति तय
श्रीगंगानगर। राजस्थान के कपास उत्पादक किसानों के लिए एक बड़ी राहत वाली खबर है। केंद्र सरकार के 5,659.22 करोड़ रुपये के कपास उत्पादकता मिशन (मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी 2026-27 से 2030-31) में अब उत्तर भारत — जिसमें राजस्थान भी शामिल है — के लिए खास रणनीति बनाई जा रही है। कपास उत्पादकता मिशन के तहत अगले पांच साल में बेहतर बीज, बेहतर तकनीक और सीधे बाजार तक पहुंच — तीनों का फायदा मिलेगा। केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान (सीआईसीआर) के सिरसा स्थित क्षेत्रीय केंद्र में हुई समन्वय बैठक में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के उप-महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. डीके यादव ने कहा कि कपास की उत्पादकता बढ़ाने के लिए नए और प्रतिरोधी बीजों के साथ-साथ जलवायु-अनुकूल खेती और समय पर कीट प्रबंधन पर फोकस किया जाएगा।
कपास उत्पादकता मिशन के बड़े आंकड़े — 2031 तक क्या लक्ष्य
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मई 2026 में ही इस मिशन को मंजूरी दे दी थी। अब आईसीएआर और संबंधित संस्थान इसे जमीन पर उतारने की तैयारी में हैं। मिशन के मुख्य लक्ष्य इस प्रकार हैं:
| तथ्य | विवरण |
| मिशन का बजट | 5,659.22 करोड़ रुपये |
| अवधि | 2026-27 से 2030-31 (5 साल) |
| 2031 तक उत्पादन लक्ष्य | 498 लाख गांठ (प्रति गांठ 170 किलो लिंट) |
| लिंट उत्पादकता लक्ष्य | 440 से बढ़ाकर 755 किलो प्रति हेक्टेयर |
| लाभान्वित किसान | लगभग 32 लाख |
| कार्यान्वयन एजेंसियां | आईसीएआर के 10 संस्थान, 10 समन्वित अनुसंधान केंद्र, राज्य कृषि विश्वविद्यालय |
यह मिशन सरकार के ‘5F विजन’ — खेत से रेशा, रेशे से कारखाने, कारखाने से फैशन और फैशन से विदेश — के अनुरूप है। इसका सीधा मतलब है कि कपास की गुणवत्ता इतनी सुधारी जाए कि उद्योग को साफ-सुथरी कपास मिले और निर्यात बढ़े।
कपास उत्पादकता मिशन में राजस्थान के लिए खास रणनीति: सिरसा बैठक में क्या तय हुआ
ताजा खबर यह है कि सीआईसीआर के सिरसा केंद्र में ‘उत्तर भारत में जलवायु-अनुकूल कपास उत्पादन’ पर समन्वय बैठक बुलाई गई, जिसमें हरियाणा, पंजाब और राजस्थान तीनों राज्यों के लिए कपास उत्पादन बढ़ाने और कीटों के प्रकोप से निपटने की रणनीति पर मंथन हुआ। डॉ. डीके यादव ने पत्रकारों से कहा कि जलवायु-अनुकूल तकनीकों, बेहतर कृषि पद्धतियों और समय पर कीट प्रबंधन से कपास की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
राजस्थान के लिए यह बैठक इसलिए अहम है क्योंकि प्रदेश का कपास क्षेत्र देश के उत्तर भारतीय कपास बेल्ट का हिस्सा है। आईसीएआर के विशेषज्ञों का मानना है कि सही किस्मों का चुनाव, फसल अवशेषों का सही प्रबंधन और वैज्ञानिक सलाह पर कीटनाशकों का प्रयोग — इन तीन बातों से राजस्थान के किसान बिना अतिरिक्त लागत के अपनी उपज बढ़ा सकते हैं।
गुलाबी सुंडी से बचाव: वैज्ञानिक सलाह पर होगा फोकस
उत्तर भारत के कपास किसानों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत गुलाबी सुंडी (पिंक बॉलवर्म) और अन्य कीट रहे हैं। कपास उत्पादकता मिशन में इस समस्या से निपटने के लिए कई मोर्चों पर काम होगा:
प्रतिरोधी किस्मों का विकास: रोग और कीट प्रतिरोधी, अधिक उपज देने वाली बीज किस्में तैयार की जाएंगी।
उन्नत रोपण तकनीक: उच्च घनत्व रोपण प्रणाली और कम अंतराल पर रोपण जैसी तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाया जाएगा।
एकीकृत कपास प्रबंधन: एकीकृत कीट प्रबंधन और फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन से गुलाबी सुंडी के प्रकोप पर नियंत्रण।
कृषि विज्ञान केंद्रों की भूमिका: राज्य सरकारों, कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के माध्यम से नई तकनीकों को खेत-खेत तक पहुंचाया जाएगा।
बीटी कपास से मिला सबक — अब नई चुनौतियों की तैयारी
डॉ. यादव ने बताया कि 2002 में बीटी कपास आने के बाद लिंट की उत्पादकता लगभग 290-300 किलो प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2016-17 में 540-550 किलो प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई थी। लेकिन बदलती जलवायु और कीटों की नई चुनौतियों को देखते हुए अब नई रणनीतियों की जरूरत है। इसके लिए इस वर्ष अपनाई गई कृषि पद्धतियों के प्रभाव का विश्लेषण भी किया जा रहा है।
मिशन 2026-31 के तहत अधिक उपज देने वाली और कीटों-बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी किस्मों को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। साथ ही जिनिंग और प्रसंस्करण कारखानों के आधुनिकीकरण, कपास परीक्षण बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और ‘कस्तूरी कॉटन भारत’ ब्रांडिंग के जरिए भारतीय कपास को वैश्विक बाजार में प्रीमियम उत्पाद के तौर पर स्थापित किया जाएगा।
राजस्थान के किसानों को अब क्या करना चाहिए
कृषि विज्ञान केंद्र से जुड़ें: कपास उत्पादकता मिशन का लाभ पाने के लिए अपने जिले के KVK या कृषि विभाग के कार्यालय से संपर्क करके मिशन के तहत मिलने वाली योजनाओं और प्रशिक्षण की जानकारी लें।
प्रमाणित बीज ही चुनें: अधिकृत स्रोतों से आईसीएआर द्वारा अनुशंसित प्रतिरोधी किस्मों के बीज लें, बिना प्रमाण के बाजार से बीज न खरीदें।
फसल अवशेष न जलाएं: कपास के अवशेषों का सही प्रबंधन गुलाबी सुंडी के जीवनचक्र को तोड़ता है — यही सबसे सस्ती कीट नियंत्रण विधि है।
मंडी भाव पर नजर रखें: बाजार मंडियों के डिजिटल एकीकरण से किसानों को पारदर्शी मूल्य निर्धारण और सीधे बाजार तक पहुंच मिलेगी। ताजा मंडी भाव जानने के लिए हमारी राजस्थान मंडी भाव 12 अक्टूबर की खबर भी पढ़ें।
अन्य किसान आंदोलनों से सीखें: सिंचाई पानी जैसे मुद्दों पर प्रदेश के किसान घड़साना किसान आंदोलन जैसी आवाज उठा चुके हैं — संगठित रहना ही फायदा दिलाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सवाल: कपास उत्पादकता मिशन क्या है?
जवाब: केंद्र सरकार का 5,659.22 करोड़ रुपये का पांच वर्षीय (2026-27 से 2030-31) मिशन है, जिसका लक्ष्य कपास की उत्पादकता बढ़ाकर 2031 तक 498 लाख गांठ उत्पादन हासिल करना है। इसमें प्रतिरोधी बीजों, आधुनिक तकनीकों और कीट प्रबंधन पर काम होगा।
सवाल: इस मिशन से राजस्थान के किसानों को क्या फायदा होगा?
जवाब: राजस्थान उत्तर भारत की कपास बेल्ट का हिस्सा है। मिशन में प्रतिरोधी बीज, जलवायु-अनुकूल तकनीक, कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से प्रशिक्षण और बाजार तक सीधी पहुंच — ये सभी सुविधाएं राजस्थान के कपास उत्पादक किसानों को भी मिलेंगी।
सवाल: गुलाबी सुंडी से बचाव के लिए क्या सलाह दी गई है?
जवाब: आईसीएआर के विशेषज्ञों के अनुसार फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन, समय पर कीट प्रबंधन, प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव और वैज्ञानिक सलाह पर ही कीटनाशकों का प्रयोग — इनसे गुलाबी सुंडी के प्रकोप पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
सवाल: मिशन में किसानों को सीधे कौन-सी सुविधा मिलेगी?
जवाब: राज्य सरकारों, कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के जरिए नई तकनीकों का बड़े पैमाने पर प्रचार और अपनाने पर जोर रहेगा। साथ ही बाजार मंडियों के डिजिटल एकीकरण से किसानों को पारदर्शी दाम और प्रत्यक्ष बाजार पहुंच मिलेगी।
*स्रोत: पीआईबी प्रेस रिलीज (मई 2026) और आईसीएआर अधिकारियों के बयान — पीआईबी की आधिकारिक जानकारी यहां पढ़ें।*