आपका शहर किस दिशा में बढ़ेगा, कहां नई सड़क बनेगी, बच्चों के लिए पार्क और अस्पताल के लिए जमीन कहां रहेगी — ये सवाल हर उस परिवार से जुड़े हैं जो शहर में रहता है या नया घर बनाने की सोच रहा है। राजस्थान में इन सवालों के जवाब का सबसे बड़ा खाका मास्टर प्लान कहलाता है, और उसी मास्टर प्लान को जमीन पर उतारने का असली औजार है जोनल डेवलपमेंट प्लान।
लेकिन एक ताजा रिपोर्ट में जो आंकड़ा सामने आया है, वह चौंकाने वाला है। प्रदेश के 309 शहरी निकायों में से महज 33 शहरों में ही जोनल प्लान लागू हो पाया है। यानी करीब 276 शहर ऐसे हैं जहां शहर के इलाकावार विकास का खाका अब भी कागज पर ही अटका है। आइए समझते हैं कि जोनल प्लान क्या होता है, यह क्यों जरूरी है, और आपके शहर में इसके न होने का असर क्या पड़ता है।
जोनल डेवलपमेंट प्लान आखिर है क्या?
सरल भाषा में कहें तो जोनल डेवलपमेंट प्लान शहर के मास्टर प्लान और मोहल्ले के ले-आउट प्लान के बीच की कड़ी है। मास्टर प्लान बताता है कि अगले 20 से 25 साल में शहर किस दिशा में बढ़ेगा। लेकिन यह बड़ा सवाल कि आपके इलाके में सड़क कहां होगी, पार्क के लिए जमीन कहां रिजर्व रहेगी, स्कूल और अस्पताल कहां बनेंगे, बाजार की सीमा कहां होगी — इसका जवाब जोनल प्लान में मिलता है।
जोनल प्लान में पूरे शहर को अलग-अलग जोन में बांटा जाता है और हर जोन की अलग से डेवलपमेंट योजना बनाई जाती है। इसमें आवास, सार्वजनिक भवन, जनसुविधा केन्द्र, सड़क, मनोरंजन केन्द्र, पार्क, उद्योग, व्यवसाय, बाजार और स्कूल के लिए जगह पहले से चिह्नित की जाती है। बिजली, पानी और अंदरूनी सड़कों जैसी मूलभूत सुविधाओं की प्लानिंग भी इसी का हिस्सा होती है। इतना ही नहीं, विकास के लिए पैसा कहां से आएगा और कैसे खर्च होगा, इसका होमवर्क भी जोनल प्लान में ही किया जाता है।
आंकड़ों में देखिए तस्वीर: 309 में से सिर्फ 33
राजस्थान में कुल शहरी निकाय 309 हैं, जिनमें से करीब 33 शहरों में ही जोनल प्लान लागू हो पाया है, जबकि 276 शहर जोनल प्लान से वंचित हैं। इसकी वजह नगर पालिका संशोधन विधेयक, 2020 का वह प्रावधान है जिसके तहत केवल एक लाख से अधिक आबादी वाले निकायों के लिए जोनल प्लान अनिवार्य किया गया था।
2020 का वह संशोधन, जिसने अटका दी प्लानिंग
इसकी सबसे बड़ी वजह 2020 में किया गया एक कानूनी बदलाव है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने नगर पालिका संशोधन विधेयक, 2020 के जरिए प्रावधान किया था कि केवल उन्हीं निकायों के लिए जोनल प्लान तैयार करना अनिवार्य होगा, जिनकी आबादी एक लाख से अधिक है।
नतीजा यह हुआ कि एक लाख से कम आबादी वाले सैकड़ों शहरों में जोनल प्लान की बाध्यता ही खत्म हो गई। छोटे और मझोले शहरों में नियोजित विकास की नींव ही नहीं रखी गई। अफसरों का तर्क है कि जरूरत पड़ने पर स्थानीय निकाय या यूआइटी स्तर पर जोनल प्लान तैयार किए जा सकते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बिना बाध्यता के यह काम प्राथमिकता में नहीं आता।
नगरीय विकास एवं स्वायत्त शासन विभाग के स्तर पर इस समय नवगठित शहरों के मास्टर प्लान तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन चिंता की बात यह है कि इनमें भी फिलहाल जोनल प्लान की व्यवस्था शामिल नहीं की गई है। परेशानी यहीं तक सीमित नहीं है — कई बड़े शहरों के मास्टर प्लान तो तैयार हो चुके हैं, लेकिन वहां भी अब तक जोनल प्लान लागू नहीं हो सके हैं।
आपके शहर में इसका सीधा असर क्या पड़ता है?
जोनल प्लान न होने के साइड इफेक्ट आम आदमी की जिंदगी में सीधे दिखते हैं। जिन 276 शहरों में जोनल प्लान लागू नहीं है, वहां पहले कॉलोनियां बस जाती हैं और बाद में सुविधाओं की जरूरत सामने आती है। तब सड़क चौड़ी करने के लिए जमीन नहीं मिलती, पार्क के लिए जगह तलाशनी पड़ती है, और स्कूल-अस्पताल के लिए जमीन उपलब्ध कराने में भारी मुश्किल होती है।
मुख्य नुकसान:
- नई कॉलोनियों में पहले प्लॉट कट जाते हैं, बाद में पता चलता है कि पार्क और खेल के मैदान के लिए जगह ही नहीं बची।
- सड़क चौड़ीकरण की जरूरत पड़ने पर मकान तोड़ने तक की नौबत आ जाती है और मुआवजे के विवाद खड़े हो जाते हैं।
- स्कूल, अस्पताल और बाजार की जगह पहले से तय न होने से ये सुविधाएं शहर से दूर या अव्यवस्थित जगहों पर बनती हैं।
- बिजली, पानी और सीवर लाइनों की प्लानिंग न होने से बाद में खुदाई और दोबारा निर्माण पर जनता का पैसा बर्बाद होता है।
राजस्थान के पूर्व अतिरिक्त मुख्य नगर नियोजक सी.एस. पाराशर का कहना है कि मास्टर प्लान बनने के बाद यह भी तय होना जरूरी है कि जमीन का इस्तेमाल किस तरह और किस इलाके में होगा। जोनल प्लान नहीं होंगे तो सवाल उठता है कि नई कॉलोनियों में सड़क, पार्क, स्कूल और अस्पताल के लिए जमीन कहां से आएगी?
आगे क्या? सरकार की क्या योजना है?
शहरी नियोजन के विशेषज्ञों का मानना है कि एक लाख से कम आबादी वाले शहरों में भी जोनल प्लान की अनिवार्यता होनी चाहिए, क्योंकि छोटे शहर ही आने वाले दशकों में सबसे तेजी से बढ़ने वाले हैं। अगर आज प्लानिंग नहीं हुई, तो कल सुविधाओं की कमी का खामियाजा आम नागरिक भुगतेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1: जोनल डेवलपमेंट प्लान और मास्टर प्लान में क्या अंतर है?
उत्तर: मास्टर प्लान शहर के 20-25 साल के विकास की बड़ी दिशा तय करता है, जबकि जोनल प्लान शहर को जोन में बांटकर हर इलाके की विस्तृत योजना बनाता है — कहां सड़क, पार्क, स्कूल, अस्पताल और बाजार होंगे। जोनल प्लान मास्टर प्लान और मोहल्ले के ले-आउट प्लान के बीच की कड़ी है।
प्रश्न 2: राजस्थान के कितने शहरों में जोनल प्लान लागू है?
उत्तर: कुल 309 शहरी निकायों में से करीब 33 शहरों में ही जोनल प्लान लागू हो पाया है। बाकी 276 शहरों में यह अब तक लागू नहीं हुआ है।
प्रश्न 3: जोनल प्लान न होने से आम नागरिक को क्या नुकसान होता है?
उत्तर: पहले कॉलोनियां बस जाती हैं और बाद में सड़क चौड़ीकरण, पार्क, स्कूल व अस्पताल के लिए जमीन नहीं मिलती। इससे मकान तोड़ने की नौबत आती है, सुविधाएं दूर बनती हैं और विकास की लागत बढ़ जाती है।
प्रश्न 4: एक लाख से कम आबादी वाले शहरों में जोनल प्लान क्यों नहीं बनता?
उत्तर: नगर पालिका संशोधन विधेयक, 2020 में प्रावधान किया गया था कि केवल एक लाख से अधिक आबादी वाले निकायों के लिए जोनल प्लान अनिवार्य होगा। इस कारण छोटे शहरों में यह बाध्यता ही खत्म हो गई।
निष्कर्ष
शहर सिर्फ इमारतों का समूह नहीं होता, वह लोगों के सपनों का घर होता है। और सपनों के घर के लिए प्लानिंग सबसे पहली ईंट है। 309 में से 33 का आंकड़ा बताता है कि राजस्थान के अधिकांश शहरों में विकास की यह पहली ईंट ही नहीं रखी गई है। अगर आपके शहर में भी जोनल प्लान नहीं है, तो यह सवाल अपने जनप्रतिनिधि से जरूर पूछिए — क्योंकि आज की प्लानिंग ही कल की सुविधाओं की गारंटी है।