कमजोर मानसून के बाद रबी की चिंता: राजस्थान के किसानों को कृषि विभाग की सलाह — कम पानी वाली ये किस्में चुनें, जानें पूरी सूची

जयपुर। इस बार मानसून राजस्थान पर मेहरबान नहीं रहा। बारिश उम्मीद से कम हुई और कई जलाशयों का जलस्तर भी नीचे बना हुआ है। खेतों में खरीफ की फसल अब कटाई की ओर है, लेकिन किसानों के मन में अगला सवाल पहले से घूमने लगा है — रबी की बुवाई तो हो जाएगी, मगर सिंचाई का पानी कितना मिलेगा? यही चिंता अब कृषि विभाग तक पहुंची है और विभाग ने समय रहते किसानों के लिए एक अहम सलाह जारी की है। सलाह का सार सीधा है — इस बार किस्म का चुनाव ही कमाई तय करेगा।

कृषि विभाग का कहना है कि सीमित पानी की स्थिति में अगर किसान जमीन, बुवाई के समय और उपलब्ध सिंचाई को देखकर सही किस्म चुने, तो न केवल पानी की बचत होगी, बल्कि खेती की लागत घटेगी और उपज भी सुरक्षित रहेगी। विभाग ने सरसों, चना, जौ और गेहूं — चारों प्रमुख रबी फसलों के लिए किस्म-दर-किस्म सिफारिशें दी हैं, ताकि हर किसान अपने खेत की हालत के हिसाब से फैसला ले सके।

कृषि विभाग ने क्यों दी फसल विविधीकरण की सलाह?

कृषि (विस्तार) संयुक्त निदेशक डॉ. सतीश शर्मा ने किसानों से अपील की है कि वे सीमित सिंचाई संसाधनों को ध्यान में रखते हुए सरसों, चना और जौ की उपयुक्त किस्मों की बुवाई करें। विभाग के मुताबिक कमजोर मानसून और गिरते जलस्तर के कारण इस बार रबी फसलों के लिए सिंचाई के पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में सिर्फ गेहूं पर निर्भर रहने के बजाय कम पानी में तैयार होने वाली फसलों और जलवायु अनुकूल किस्मों की ओर बढ़ना समझदारी होगी।

विभाग की दलील है कि सही किस्म का चयन स्थानीय मिट्टी, बुवाई के समय और उपलब्ध सिंचाई सुविधा के अनुसार किया जाए, तो सिंचाई पर दबाव और उत्पादन लागत — दोनों कम किए जा सकते हैं। यानी यह सलाह डराने के लिए नहीं, बल्कि पहले से तैयारी कराने के लिए है, ताकि बुवाई के बाद पानी की कमी किसान को बीच मझधार में न छोड़ दे।

सरसों: जमीन देखकर चुनें किस्म

सरसों राजस्थान की सबसे भरोसेमंद रबी फसल है और इस बार भी विभाग ने इसके लिए सबसे विस्तृत सूची दी है। समय पर बुवाई और भारी जमीन वाले खेतों के लिए आरएच-1975 और आरएच-1706 किस्मों की सिफारिश की गई है। सेम प्रभावित क्षेत्रों, जहां जमीन में नमी और खारेपन की समस्या रहती है, वहां सीएस-58, सीएस-60 और सीएस-62 किस्में बेहतर विकल्प बताई गई हैं।

रेतीली और टिब्बा भूमि के लिए विभाग ने आरएच-1424, आरएच-725 और आरएच-761 किस्में सुझाई हैं। वहीं अगर किसी कारण बुवाई में देरी हो जाए, तो किसान आरजीएन-236 किस्म का चयन कर सकते हैं। साफ है कि एक ही किस्म हर खेत के लिए नहीं है — जमीन का स्वभाव ही तय करेगा कि कौन-सा बीज सही रहेगा।

चना: सिंचाई की सुविधा के हिसाब से फैसला

चना भी कम पानी में अच्छी आमदनी देने वाली फसल मानी जाती है, लेकिन यहां भी किस्म का चुनाव सिंचाई की सुविधा देखकर करना होगा। विभाग के अनुसार सिंचित क्षेत्रों में समय पर बुवाई के लिए जीएनजी-2171 यानी मीरा किस्म उपयुक्त रहेगी। पछेती बुवाई की स्थिति में जीएनजी-2261 यानी केशव किस्म की सिफारिश की गई है, जबकि असिंचित यानी बारिश के भरोसे वाले क्षेत्रों के लिए जीएनजी-2461 यानी मूमल किस्म बेहतर मानी गई है।

विशेषज्ञों की मानें तो चने में किस्म का गलत चुनाव सबसे ज्यादा नुकसान करता है, क्योंकि सिंचित और असिंचित खेत की जरूरतें बिल्कुल अलग होती हैं। इसलिए बीज खरीदने से पहले किसान अपने खेत में पानी की असली उपलब्धता का आकलन जरूर कर लें।

छिलका रहित जौ डीडब्ल्यूआरबी-223: पानी बचाए, पोषण भी दे

इस बार की सलाह में सबसे ज्यादा चर्चा छिलका रहित जौ की डीडब्ल्यूआरबी-223 किस्म की है। यह किस्म भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल ने विकसित की है। विभाग के अनुसार गेहूं की तुलना में इस किस्म में करीब 30 से 40 प्रतिशत तक कम पानी और उर्वरक की जरूरत पड़ती है। इसे लवणीय और क्षारीय जमीन में भी उगाया जा सकता है और इसकी औसत उपज करीब 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रहती है।

खास बात यह है कि इसके दानों से रोटी, दलिया और बिस्किट जैसे खाद्य पदार्थ तैयार किए जा सकते हैं। पोषण के लिहाज से भी यह किस्म आगे है — इसमें ग्लूटेन की मात्रा कम, ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम और घुलनशील फाइबर अधिक होता है, साथ ही प्रोटीन, लोहा, जस्ता और कैल्शियम जैसे पोषक तत्व भी मिलते हैं। विभाग इसे उत्पादन, पोषण और संसाधन संरक्षण के बीच संतुलन बनाने वाला विकल्प मानता है।

गेहूं छोड़ना जरूरी नहीं: कम पानी वाली किस्में मौजूद

जो किसान गेहूं से हटना नहीं चाहते, विभाग ने उनके लिए भी रास्ता बताया है। सीमित सिंचाई की परिस्थितियों के लिए डब्ल्यूएच-1402, डब्ल्यूएच-1142 और डीबीडब्ल्यू-296 किस्में उपयोगी मानी गई हैं। डब्ल्यूएच-1402 की फसल मात्र दो सिंचाई में तैयार की जा सकती है — पहली सिंचाई बुवाई के करीब 25 दिन बाद और दूसरी 70 से 80 दिन के बीच। यह किस्म करीब 147 दिन में पकती है और इसकी औसत उपज 12 क्विंटल प्रति बीघा रहती है, जबकि अनुकूल परिस्थितियों में उत्पादन 17 क्विंटल प्रति बीघा तक पहुंच सकता है।

डीबीडब्ल्यू-296 यानी करण ऐश्वर्या भी दो से तीन सिंचाई में तैयार हो जाती है। इसकी औसत उपज करीब 14 क्विंटल प्रति बीघा है और अच्छी परिस्थितियों में 20 क्विंटल प्रति बीघा तक उत्पादन संभव है। यह किस्म सूखे और अधिक तापमान को सहन करने की क्षमता रखती है और इसके आटे से रोटी, बिस्किट, ब्रेड और नान बनाए जा सकते हैं। राहत की बात यह भी है कि डब्ल्यूएच-1402 और डीबीडब्ल्यू-296 दोनों में पीला रतुआ, काला रतुआ, भूरा रतुआ और करनाल बंट जैसे रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता मिलती है, जिससे दवा का खर्च भी घटता है।

एक नजर में: किस परिस्थिति में कौन-सी किस्म?

फसल परिस्थिति सुझाई गई किस्म
सरसों समय पर बुवाई, भारी जमीन आरएच-1975, आरएच-1706
सरसों सेम प्रभावित क्षेत्र सीएस-58, सीएस-60, सीएस-62
सरसों रेतीली/टिब्बा भूमि आरएच-1424, आरएच-725, आरएच-761
सरसों पछेती बुवाई आरजीएन-236
चना सिंचित, समय पर बुवाई जीएनजी-2171 (मीरा)
चना पछेती बुवाई जीएनजी-2261 (केशव)
चना असिंचित क्षेत्र जीएनजी-2461 (मूमल)
जौ कम पानी, लवणीय-क्षारीय जमीन डीडब्ल्यूआरबी-223
गेहूं सीमित सिंचाई (2 पानी) डब्ल्यूएच-1402
गेहूं सीमित सिंचाई (2-3 पानी) डीबीडब्ल्यू-296 (करण ऐश्वर्या)

कुल मिलाकर संदेश साफ है — इस रबी में किस्मदारी ही किस्मत तय करेगी। बुवाई से पहले अपने नजदीकी कृषि कार्यालय या कृषि विशेषज्ञ से खेत की मिट्टी और पानी की स्थिति पर चर्चा करना किसान के लिए सबसे सस्ता और सबसे फायदेमंद कदम साबित हो सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न: इस बार कृषि विभाग ने अलग से सलाह क्यों जारी की है?

उत्तर: कमजोर मानसून और जलाशयों के गिरते जलस्तर के कारण रबी में सिंचाई के पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसलिए विभाग ने किसानों को पहले से कम पानी वाली और जलवायु अनुकूल किस्में चुनने की सलाह दी है।

प्रश्न: रेतीली जमीन के लिए सरसों की कौन-सी किस्म सही रहेगी?

उत्तर: रेतीली और टिब्बा भूमि के लिए विभाग ने आरएच-1424, आरएच-725 और आरएच-761 किस्मों की सिफारिश की है। बुवाई में देरी हो तो आरजीएन-236 किस्म चुनी जा सकती है।

प्रश्न: गेहूं की कौन-सी किस्म सबसे कम पानी में तैयार होती है?

उत्तर: डब्ल्यूएच-1402 किस्म मात्र दो सिंचाई में तैयार हो जाती है और करीब 147 दिन में पकती है। डीबीडब्ल्यू-296 यानी करण ऐश्वर्या दो से तीन सिंचाई में तैयार होती है।

प्रश्न: छिलका रहित जौ डीडब्ल्यूआरबी-223 की खासियत क्या है?

उत्तर: इसमें गेहूं के मुकाबले 30 से 40 प्रतिशत कम पानी और उर्वरक लगता है, यह लवणीय-क्षारीय जमीन में भी उगाई जा सकती है और औसत उपज करीब 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रहती है।

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