पाली एक बार फिर उसी मोड़ पर है, जहां पानी की हर बूंद का हिसाब रखना पड़ता है। शहर की जीवनरेखा कहे जाने वाले जवाई बांध में पानी का स्तर घटकर सिर्फ 24 फीट रह गया है, जबकि बांध की कुल भराव क्षमता 61.25 फीट है। जलदाय विभाग के आंकड़ों और मौजूदा खपत के हिसाब से यह पानी पाली शहर और जुड़े ग्रामीण इलाकों में मुश्किल से अगले तीन महीने यानी करीब 90 दिन तक ही काम आएगा। हालात देखते हुए प्रशासन जोधपुर से वॉटर ट्रेन चलाने के प्रस्ताव की तैयारी में जुट गया है, जो जल्द ही राज्य सरकार को भेजा जाएगा।
सिर्फ 24 फीट पानी: 90 दिन का स्टॉक कैसे गिना गया
जवाई बांध मारवाड़ का सबसे बड़ा बांध है — कुल भराव क्षमता करीब 7300 मिलियन घन फीट (61.25 फीट)। इस साल मानसून की बेरुखी से जलग्रहण क्षेत्र में पर्याप्त बारिश नहीं हुई और स्तर गिरकर अब 24 फीट पर आ ठहरा है। जलदाय विभाग की रोजाना खपत दर से गणना करें तो मौजूदा भंडार लगभग 90 दिन में खत्म हो जाएगा, यानी जनवरी के आसपास पाली के सामने पेयजल का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। इसीलिए प्रशासन वॉटर ट्रेन जैसे आपात विकल्प पर पहले से काम शुरू करना चाहता है।
वॉटर ट्रेन का खर्च-खाता: एक फेरे में 21 लाख लीटर, रोज का खर्च 22 लाख तक
एक वॉटर ट्रेन में आमतौर पर 40 बोगियां (टैंकर) जोड़ी जाती हैं और एक फेरे में यह करीब 20 से 21 लाख लीटर पानी पाली पहुंचाती है। रेलवे इस परिवहन के लिए जलदाय विभाग से माल भाड़ा वसूलता है — एक राउंड ट्रिप का खर्च 4 लाख से 4.5 लाख रुपये आता है। संकट के समय रोजाना 4 से 5 फेरे लगते हैं, जिससे एक दिन का कुल खर्च 18 से 22 लाख रुपये तक पहुंच जाता है।
इतने बड़े ऑपरेशन में तीन विभागों का तालमेल जरूरी होता है — जलदाय विभाग पानी की व्यवस्था और वितरण संभालता है, डिस्कॉम पंपिंग व बिजली आपूर्ति देखता है, और उत्तर पश्चिम रेलवे ट्रेन के संचालन व समय-सारणी का प्रबंधन करता है। तीनों के बीच समन्वय बैठे बिना वॉटर ट्रेन नियमित नहीं चल सकती, इसीलिए प्रशासन चाहता है कि प्रस्ताव जल्दी भेजा जाए ताकि औपचारिक सहमति और बजट की व्यवस्था समय पर हो सके।
2002 से 2022: जब-जब प्यास बढ़ी, पटरी पर उतरी ट्रेन
पाली के लिए वॉटर ट्रेन नई बात नहीं है। पहली बार 25 जुलाई 2002 को भीषण पेयजल संकट में जोधपुर के भगत की कोठी स्टेशन से पाली के लिए वॉटर ट्रेन चली थी। उसके बाद 2009, 2016, 2019 और 2022 में भी जब-जब जवाई का जलस्तर खतरनाक स्तर पर पहुंचा, यही ट्रेन पाली की प्यास बुझाने आई। अनुभव यही बताता है कि वॉटर ट्रेन अस्थायी राहत तो देती है, लेकिन रोज के लाखों रुपये का खर्च सरकारी खजाने पर भारी पड़ता है — फिर भी शहर की प्यास के आगे प्रशासन के पास इससे बेहतर तात्कालिक विकल्प नहीं होता।
80 साल पुराना जवाई: कभी जोधपुर तक पहुंचाता था पानी
जवाई बांध की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं। जोधपुर रियासत में बार-बार पड़ने वाले भीषण अकाल और सूखे से जनता और मवेशियों को बचाने के लिए इसका निर्माण कराया गया था। तत्कालीन महाराजा उम्मेद सिंह ने 12 मई 1946 को इसकी नींव रखी और प्रसिद्ध इंजीनियर एडगर तथा मोती सिंह की देखरेख में निर्माण पूरा हुआ। शुरुआत में इसका उद्देश्य जोधपुर शहर और आसपास के इलाकों को पेयजल और सिंचाई का पानी देना था — दशकों तक इसने जोधपुर की प्यास बुझाई। बाद में जोधपुर को इंदिरा गांधी नहर से जोड़ दिया गया और जवाई का पानी पाली जिले के लिए आरक्षित हो गया। आज वही बांध इतना सूख गया है कि पाली बूंद-बूंद पानी के लिए मोहताज हो रहा है।
सिर्फ पाली नहीं: 11 जिलों पर अकाल की छाया
इस साल कमजोर मानसून ने राजस्थान को पिछले 10 साल के सबसे बड़े अकाल की ओर धकेल दिया है — 11 से ज्यादा जिले भयंकर सूखे की मार झेल रहे हैं, जिनमें पाली, जैसलमेर और जालोर में बारिश सामान्य से 50 प्रतिशत तक कम हुई है। पिछले साल मानसून के बाद प्रदेश के बांध 90.5 प्रतिशत तक भरे थे, इस बार यह आंकड़ा मुश्किल से 62 प्रतिशत तक पहुंचा है; जोधपुर जोन में तो बांधों में क्षमता का केवल 16 प्रतिशत पानी ही आया है। बाजरा, मूंग, ग्वार, मोठ और सोयाबीन जैसी खरीफ फसलें नष्ट हो गई हैं, जिससे महंगाई और चारे के संकट का खतरा है। 15 अक्टूबर के बाद सरकार सूखा-पीड़ित जिलों की आधिकारिक सूची जारी करेगी।
सरकार के राहत कदम और आगे की राह
गंभीर हालात देखते हुए राज्य सरकार ने राहत कार्य शुरू कर दिए हैं — पेयजल के लिए टैंकरों की व्यवस्था 31 दिसंबर 2026 तक बढ़ा दी गई है, और सूखा प्रभावित जिलों के कलेक्टरों को तुरंत राहत कार्यों के लिए एक-एक करोड़ रुपये तक स्वीकृत करने के विशेष अधिकार दिए गए हैं। पशुधन बचाने के लिए बाड़मेर, बालोतरा और जैसलमेर सहित कई जिलों में नए चारा डिपो खोलने के निर्देश भी जारी हुए हैं। पाली के मामले में अब सबकी नजर इस पर है कि वॉटर ट्रेन का प्रस्ताव कब राज्य सरकार तक पहुंचता है और उस पर कितनी जल्दी फैसला होता है।
वॉटर ट्रेन: एक नजर में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| एक ट्रेन में बोगियां | 40 टैंकर बोगियां |
| एक फेरे में पानी | 20-21 लाख लीटर (2.1 MLD) |
| एक राउंड ट्रिप का खर्च | 4 से 4.5 लाख रुपये |
| रोजाना फेरे | 4 से 5 |
| रोजाना कुल खर्च | 18 से 22 लाख रुपये |
| पहली बार चली | 25 जुलाई 2002 (भगत की कोठी से पाली) |
| बाद में चली | 2009, 2016, 2019, 2022 |
| शामिल विभाग | जलदाय विभाग, डिस्कॉम, उत्तर पश्चिम रेलवे |
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सवाल: पाली में वॉटर ट्रेन कब से चलेगी?
जवाब: अभी प्रशासन प्रस्ताव तैयार कर रहा है, जो जल्द राज्य सरकार को भेजा जाएगा। उसके बाद ही ट्रेन के संचालन पर फैसला होगा।
सवाल: जवाई बांध में अभी कितना पानी बचा है?
जवाब: जलस्तर घटकर करीब 24 फीट रह गया है, जबकि कुल भराव क्षमता 61.25 फीट (लगभग 7300 मिलियन घन फीट) है। मौजूदा खपत से यह पानी करीब 90 दिन की आपूर्ति के लिए पर्याप्त है।
सवाल: एक वॉटर ट्रेन कितना पानी लाती है और खर्च कितना आता है?
जवाब: 40 बोगियों वाली ट्रेन एक फेरे में 20-21 लाख लीटर पानी पहुंचाती है। एक राउंड ट्रिप पर 4 से 4.5 लाख रुपये खर्च होते हैं; रोजाना 4-5 फेरे चलने पर दैनिक खर्च 18-22 लाख रुपये तक पहुंचता है।
सवाल: पाली के लिए इससे पहले कब-कब वॉटर ट्रेन चली थी?
जवाब: पहली बार 25 जुलाई 2002 को जोधपुर के भगत की कोठी स्टेशन से चली थी। उसके बाद 2009, 2016, 2019 और 2022 में भी पेयजल संकट के दौरान यह ट्रेन चलाई गई।