एक सिंचाई प्रोजेक्ट को लेकर गांवों में बैचैनी कितनी गहरी हो सकती है, इसका ताजा उदाहरण पूर्वी राजस्थान से आया है. ईसरदा से बंध बारेठा तक प्रस्तावित 189 किलोमीटर लंबी खुली नहर के खिलाफ अब किसान सड़क पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं. शुक्रवार को किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा को पत्र लिखकर साफ कह दिया — या तो यह खुली नहर वाला प्रस्ताव रद्द करो, या आंदोलन के लिए तैयार रहो. संगठन ने 4 अक्टूबर को चौथ का बरवाड़ा के सारसोप गांव में होने वाली महापंचायत में आंदोलन शुरू करने की घोषणा की चेतावनी दी है. इसका मतलब साफ है: सरकार के पास फैसले के लिए बस दो दिन बचे हैं.
सबसे पहले समझिए — जद में कितनी जमीन, कितने गांव, कितने परिवार
विवाद का केंद्र एक अंक है: 11,404 बीघा. किसान महापंचायत के मुताबिक प्रस्तावित नहर 189 किलोमीटर लंबी और 150 मीटर चौड़ी होगी, जिसके लिए इन 11,404 बीघा खेती की जमीन का अधिग्रहण होगा. प्रभावित क्षेत्र सिर्फ एक-दो गांव नहीं — टोंक, सवाई माधोपुर, करौली, दौसा और भरतपुर, इन 5 जिलों की 13 तहसीलों के 100 गांव इस दायरे में आ रहे हैं.
संगठन का तर्क है कि जिन परिवारों के खेत जाएंगे, उनके साथ आवासीय मकान, बाड़ा, नोहरा, कुएं और ट्यूबवेल जैसी अचल संपत्तियां भी छिनेंगी. यानी जिनकी पूरी जिंदगी की कमाई इस जमीन पर खड़ी है, वे एक झटके में बेघर और बेरोजगार हो जाएंगे. शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन और सामुदायिक भवनों के नाम पर मिलने वाले आश्वासनों को संगठन ने “मीठे सपने” कहकर खारिज कर दिया है.
शुक्रवार को सीएम को पत्र, दो दिन का अल्टीमेटम
रामपाल जाट ने 2 अक्टूबर को मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में दो ठोस मांगें रखीं. पहली — खुली नहर का प्रोजेक्ट रद्द किया जाए और पानी ले जाने के लिए भूमिगत पाइपलाइन का प्रस्ताव मंजूर किया जाए. दूसरी — प्रभावित और पीड़ित किसानों से सार्थक संवाद के लिए सरकार वार्ता शुरू करे. पत्र में यह भी जोड़ा गया कि नहर के रास्ते में पड़ने वाले गांवों को पानी से वंचित रखा जा रहा है, जिसे संगठन ने “जनभावनाओं को कुचलने” जैसा और अलोकतांत्रिक व्यवहार बताया है.
अब सवाल यह है कि सरकार इस पत्र पर क्या रुख अपनाती है. 27 सितंबर की महापंचायत में भी इस मुद्दे को उठाया जा चुका था, लेकिन कोई ठोस फैसला सामने नहीं आया. यही वजह है कि संगठन ने अब 4 अक्टूबर की महापंचायत में आंदोलन की घोषणा की चेतावनी दी है — और साफ कह दिया है कि फैसले में देरी होती है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी.
खुली नहर बनाम भूमिगत पाइपलाइन: किसान क्यों पाइप चाहते हैं
इस विवाद का तकनीकी पक्ष भी समझना जरूरी है, क्योंकि किसानों की मांग सिर्फ विरोध के लिए विरोध नहीं है. उनका कहना है कि खुली नहर के बजाय जमीन के नीचे पाइप बिछाकर पानी ले जाया जाए तो दोनों काम हो जाएंगे — पानी भी पहुंचेगा और हजारों बीघा उपजाऊ जमीन भी बच जाएगी.
| पहलू | खुली नहर (150 मीटर चौड़ी) | भूमिगत पाइपलाइन |
|---|---|---|
| लंबाई | 189 किलोमीटर | परियोजना के अनुसार |
| जमीन की जरूरत | 11,404 बीघा अधिग्रहण | नाममात्र, जमीन बचती है |
| प्रभावित गांव | 100 गांव, 13 तहसीलें | न्यूनतम असर |
| खेत तक पहुंच | गांव दो हिस्सों में बंटेंगे, आना-जाना मुश्किल | खेत का कटा-फटा चेहरा नहीं बदलेगा |
| पशुपालन पर असर | चारा-घास लाना असुरक्षित | कोई बड़ा असर नहीं |
संगठन की सबसे कड़वी शिकायत यह है कि पाइपलाइन के स्थानीय सुझाव पर गंभीरता से विचार ही नहीं हो रहा. आरोप है कि भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 में “न्यूनतम भूमि अधिग्रहण” का सिद्धांत है, लेकिन यहां तैयारी “अधिकतम भूमि अधिग्रहण” की हो रही है. यानी कानून की मंशा के ठीक उलट काम हो रहा है.
एक और गंभीर आरोप यह है कि टेंडर और कार्यादेश जारी होने के बाद भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की गई. संगठन का कहना है कि अधिनियम की पालना के बजाय “रिक्त स्थानों की पूर्ति” जैसा काम हो रहा है — कंपनियां पैसा कमाने में व्यस्त हैं और सरकार लोक प्रयोजन के नाम पर दिखावे की कार्रवाई कर रही है.
गांवों में माहौल: “जान दे देंगे, जमीन नहीं”
खबर सिर्फ कागजी पत्र तक सीमित नहीं है — जमीन पर भी तपिश बढ़ रही है. सवाई माधोपुर जिले की बौली तहसील के कोडियाई गांव और बरनाला तहसील के सुंदरी गांव में हुई जनसभाओं में किसानों ने खुलेआम संकल्प लिया कि वे खुली नहर के लिए जमीन नहीं देंगे, “चाहे इसके लिए जान ही क्यों न देनी पड़े”. संगठन का कहना है कि बौली और बामनवास जैसे उपखंडों के अधिकारियों के जरिए मुख्यमंत्री कार्यालय को ज्ञापन भी भेजे जा चुके हैं.
यह संकल्प क्यों इतना कड़ा है, इसे समझने के लिए एक और पहलू देखिए. संगठन के मुताबिक कई गांव नहर की वजह से दो भागों में बंट जाएंगे. गांव का मतलब सिर्फ घरों का समूह नहीं होता — वहां पारिवारिक रिश्ते, मेल-जोल की संस्कृति और पीढ़ियों से बनी आबादी का नेटवर्क होता है. नहर के आड़े आ जाने पर खेत तक आना-जाना दुर्गम होगा और पशुओं के लिए रोज चारा-घास लाना असुरक्षित और संकटपूर्ण बन जाएगा. यानी जमीन जाने के बाद जो थोड़ी-बहुत खेती बचेगी, उसे संभालना भी मुश्किल हो जाएगा.
पूर्वी राजस्थान के लिए पानी का सवाल: प्रोजेक्ट का दूसरा चेहरा
इस विवाद को संतुलन में समझने के लिए प्रोजेक्ट का उद्देश्य भी देखना होगा. ईसरदा बांध पूर्वी राजस्थान का बड़ा जल स्रोत है और इस नहर का मकसद पानी को एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुंचाना है — सिंचाई और पेयजल दोनों के लिए. सरकार का पक्ष आम तौर पर यह होता है कि बड़ी परियोजनाओं के लिए जमीन जरूरी है और नियमानुसार मुआवजा भी दिया जाता है. लेकिन किसानों का सवाल यह है कि जब पाइपलाइन से काम चल सकता है, तो 11,404 बीघा उपजाऊ जमीन की बलि क्यों दी जाए?
यही वह बिंदु है जहां यह मामला सिर्फ एक नहर का नहीं, बल्कि विकास मॉडल का सवाल बन जाता है — क्या पानी पहुंचाने की हर परियोजना के लिए हजारों बीघा खेती की जमीन का अधिग्रहण जरूरी है, या तकनीक से इस नुकसान को बचाया जा सकता है?
अब आगे क्या: 4 अक्टूबर की महापंचायत पर सबकी नजर
अब सारी नजरें 4 अक्टूबर 2026 को चौथ का बरवाड़ा तहसील के सारसोप गांव में होने वाली किसान महापंचायत पर हैं. अगर सरकार ने उससे पहले ठोस फैसला नहीं लिया, तो संगठन वहां आंदोलन शुरू करने की घोषणा कर सकता है. किसान संगठनों की यह भी रणनीति दिख रही है कि वे अलग-अलग गांवों में जनसभाएं करके माहौल तैयार कर रहे हैं — कोडियाई और सुंदरी की जनसभाएं उसी कड़ी का हिस्सा हैं.
प्रभावित किसानों के लिए फिलहाल सबसे जरूरी बात यह है कि वे अपनी जमीन के दस्तावेज, खसरा-खतौनी और पट्टे की प्रतियां तैयार रखें, ग्राम सभा और तहसील स्तर पर होने वाली बैठकों में शामिल हों, और अपने क्षेत्र के पटवारी या तहसील कार्यालय से अधिग्रहण संबंधी किसी नोटिस की जानकारी समय पर लेते रहें. आंदोलन की घोषणा हो या न हो, प्रक्रिया से जुड़े हर दस्तावेज पर नजर रखना उनकी ताकत बनेगा. अगर किसी किसान के पास कर्ज, बंधक या संयुक्त खाते से जुड़े कागजात हैं तो उन्हें भी एक जगह इकट्ठा करके रखना बेहतर होगा, ताकि मुआवजे या प्रतिकर की बात आए तो दावा मजबूत रहे.
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न: ईसरदा-बंध बारेठा नहर विवाद क्या है?
उत्तर: ईसरदा से बंध बारेठा तक प्रस्तावित 189 किलोमीटर लंबी और 150 मीटर चौड़ी खुली नहर के लिए 11,404 बीघा खेती की जमीन के अधिग्रहण का किसान विरोध कर रहे हैं. किसान महापंचायत चाहती है कि खुली नहर के बजाय भूमिगत पाइपलाइन बिछाई जाए.
प्रश्न: कितने जिले और गांव प्रभावित होंगे?
उत्तर: टोंक, सवाई माधोपुर, करौली, दौसा और भरतपुर — इन 5 जिलों की 13 तहसीलों के 100 गांव इस नहर के दायरे में आ रहे हैं.
प्रश्न: किसानों की मुख्य मांगें क्या हैं?
उत्तर: दो मांगें — खुली नहर का प्रोजेक्ट रद्द कर भूमिगत पाइपलाइन को मंजूरी दी जाए, और प्रभावित किसानों से सरकार सार्थक वार्ता शुरू करे.
प्रश्न: आंदोलन की चेतावनी कब और कहां से आई है?
उत्तर: 2 अक्टूबर 2026 को किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मांगें पूरी न होने पर आंदोलन की चेतावनी दी है. 4 अक्टूबर को चौथ का बरवाड़ा के सारसोप गांव में महापंचायत में आंदोलन की घोषणा संभव है.