राजस्थान में बाल विवाह की कुप्रथा पर नकेल कसने के लिए शिक्षा विभाग ने ऐसा आदेश जारी किया है, जिसके बाद अब गांव के स्कूल का प्रधानाचार्य और पटवारी भी बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी कहलाएगा। यानी अब बाल विवाह की सूचना मिलने पर पुलिस के पहुंचने का इंतजार करने की जरूरत नहीं होगी — नजदीकी सरकारी स्कूल के प्रधानाध्यापक, ग्राम विकास अधिकारी या पटवारी खुद मौके पर पहुंचकर जांच और आवश्यक कार्रवाई कर सकेगा। माध्यमिक शिक्षा निदेशक ललित कुमार की ओर से जारी नए दिशा-निर्देशों में ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों के लिए अधिकारियों के कार्यक्षेत्र भी साफ-साफ तय कर दिए गए हैं। इस फैसले का सीधा असर प्रदेश के उन लाखों परिवारों पर पड़ेगा, जहां आज भी नाबालिग बच्चों की शादी की कुप्रथा किसी न किसी रूप में जारी है।
बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी बनेंगे ये चारों — जानिए किसे क्या जिम्मा मिला
नए आदेश के तहत चार तरह के अधिकारियों को आधिकारिक तौर पर बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ये अधिकारी अपने-अपने निर्धारित क्षेत्र में बाल विवाह से जुड़ी शिकायतों और सूचनाओं पर कार्रवाई कर सकेंगे। इसका मकसद साफ है — किसी मामले में देरी न हो और सूचना मिलते ही समय रहते बाल विवाह को रोका जा सके।
| अधिकारी | कार्यक्षेत्र | निगरानी की सीमा |
|---|---|---|
| स्कूल के प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक (ग्रामीण) | ग्राम पंचायत | अपने विद्यालय की ग्राम पंचायत सीमा में |
| स्कूल के प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक (शहरी) | नगरपालिका वार्ड | अपने संबंधित वार्ड में |
| ग्राम विकास अधिकारी | पूरी ग्राम पंचायत | पंचायत के सभी गांवों में |
| पटवारी | पटवार मंडल | अपने मंडल क्षेत्र के अंतर्गत |
इस व्यवस्था से ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में निगरानी का एक जाल बुनने की कोशिश की गई है। अब तक बाल विवाह की सूचना पर कार्रवाई ज्यादातर पुलिस के जरिए होती थी, जिसमें अक्सर देरी हो जाती थी। नए आदेश के बाद स्थानीय स्तर पर ही तत्काल हस्तक्षेप संभव होगा।
बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी: अब पुलिस का इंतजार नहीं होगा
इस आदेश का सबसे अहम असर यह है कि अब कार्रवाई का दरवाजा गांव-मोहल्ले तक पहुंच जाएगा। मान लीजिए किसी गांव में नाबालिग लड़की की शादी की तैयारी चल रही है — पहले ऐसी सूचना पर पुलिस थाने तक पहुंचने और कार्रवाई में समय लगता था। अब उसी गांव के स्कूल का प्रधानाचार्य या पटवारी सूचना मिलते ही जांच शुरू कर सकेगा। आदेश में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए संबंधित अधिकारियों को जांच और आवश्यक कार्रवाई की जिम्मेदारी दी गई है।
अभिभावकों के लिए इसका सीधा मतलब है — सूचना अब ज्यादा करीब और सुलभ अधिकारी को दी जा सकती है, क्योंकि बाल विवाह रोकने में हर घंटे की देरी खतरनाक हो सकती है।
आदेश के पीछे की वजह — सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और मुख्य सचिवों का राष्ट्रीय सम्मेलन
यह बदलाव अचानक नहीं आया है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और मुख्य सचिवों के राष्ट्रीय सम्मेलन के निर्देशों के बाद जमीनी स्तर पर जिम्मेदारी तय करना जरूरी हो गया था।
राजस्थान में बाल विवाह की कुप्रथा लंबे समय से चिंता का विषय रही है। नई व्यवस्था इसी चुनौती से निपटने की कोशिश है, ताकि सूचना से कार्रवाई तक की दूरी खत्म हो सके।
आदेश को मिलेगी कानूनी ताकत — BNSS 2023 के प्रावधानों का सहारा
नए दिशा-निर्देश सिर्फ सलाह नहीं हैं — इन्हें कानूनी जमीन भी दी गई है। आदेश में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के प्रावधानों का उल्लेख किया गया है, जिसके तहत संबंधित अधिकारियों को बाल विवाह के मामलों में जांच और आवश्यक कार्रवाई की जिम्मेदारी दी गई है। इससे प्रधानाचार्य, ग्राम विकास अधिकारी और पटवारी जैसे अधिकारियों को अपने निर्धारित क्षेत्र में औपचारिक रूप से दखल देने का आधार मिलेगा।
शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों ने प्रदेश के सभी संभागीय संयुक्त निदेशकों और जिला शिक्षा अधिकारियों को आदेश का सख्ती से और लगातार पालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए हैं। यानी यह व्यवस्था सिर्फ कागज पर नहीं रहेगी — इसके क्रियान्वयन की निगरानी भी जिला स्तर तक तय कर दी गई है।
शिक्षक संगठन नाराज — “पढ़ाई पर पड़ेगा असर”
सरकार के इस फैसले को लेकर कई शिक्षक संगठनों ने नाराजगी जताई है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि शिक्षण कर्मचारियों को बाल विवाह की निगरानी और जांच की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपने से स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। उनका तर्क है कि शिक्षकों पर पहले से ही शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ है — चुनाव ड्यूटी, जनगणना, सर्वे जैसे काम पहले से ही पढ़ाई का समय खा रहे हैं। ऐसे में एक और बड़ी जिम्मेदारी मिलने से पठन-पाठन पर असर पड़ने की आशंका है।
शिक्षा विभाग से जुड़ी ऐसी ही व्यवस्थाओं में पहले भी माध्यमिक शिक्षा विभाग को दस्तावेज सत्यापन जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी जाती रही हैं। वहीं, स्कूल शिक्षा से जुड़े अभियानों में भी प्रधानाचार्यों की भूमिका अहम रही है। शिक्षक संगठनों की आपत्ति पर विभाग का क्या रुख होगा, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। (स्रोत: अमर उजाला — https://www.amarujala.com/rajasthan/jaipur/rajasthan-child-marriage-prevention-school-principals-patwaris-new-government-order-2026-10-15)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न: बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी कौन-कौन बनेंगे?
उत्तर: सरकारी स्कूलों के प्रधानाचार्य, प्रधानाध्यापक, ग्राम विकास अधिकारी और पटवारी — इन चारों को आधिकारिक तौर पर यह जिम्मेदारी सौंपी गई है।
प्रश्न: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कार्यक्षेत्र कैसे तय किया गया है?
उत्तर: ग्रामीण क्षेत्रों में प्रधानाचार्य अपने विद्यालय की ग्राम पंचायत सीमा में, शहरी क्षेत्रों में संबंधित नगरपालिका वार्ड में निगरानी करेंगे। ग्राम विकास अधिकारी पूरी ग्राम पंचायत और पटवारी अपने पटवार मंडल क्षेत्र में कार्रवाई करेंगे।
प्रश्न: क्या इन अधिकारियों को जांच की कानूनी शक्ति भी मिलेगी?
उत्तर: हां। आदेश में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए अधिकारियों को बाल विवाह के मामलों में जांच और आवश्यक कार्रवाई की जिम्मेदारी दी गई है।
प्रश्न: अगर मुझे बाल विवाह की सूचना देनी हो तो किससे संपर्क करूं?
उत्तर: अपने नजदीकी सरकारी स्कूल के प्रधानाचार्य/प्रधानाध्यापक, ग्राम विकास अधिकारी या पटवारी को सूचना दें। इसके अलावा चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 और पुलिस हेल्पलाइन 112 पर भी सूचना दी जा सकती है।
निष्कर्ष के तौर पर कहें तो राजस्थान सरकार का यह आदेश बाल विवाह रोकथाम को थाने से निकालकर गांव-मोहल्ले तक ले जाने की कोशिश है। जिम्मेदारी तय हो गई है, कार्यक्षेत्र बंट गए हैं और कानूनी आधार भी दे दिया गया है। अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि जमीनी स्तर पर यह व्यवस्था कितनी तेजी से सक्रिय होती है — और शिक्षक संगठनों की नाराजगी के बीच पढ़ाई और निगरानी का संतुलन कैसे बनता है.